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लोकसभा सीटों में इजाफा, वक्त की मांग ?

संसद भवन को बड़ा आकार क्यों दिया जा रहा है और नए आधुनिक निर्माणाधीन संसद को बनाने में क्यों तेजी दिखाई जा रही है, इसकी सच्चाई अब धीरे-धीरे सामने आ रही है। बताते हैं कि अगले आम चुनाव से पहले लोकसभा सीटें बढ़ाने का खाका तैयार हो चुका है।

By: डॉ. रमेश ठाकुर

संसद भवन को बड़ा आकार क्यों दिया जा रहा है और नए आधुनिक निर्माणाधीन संसद को बनाने में क्यों तेजी दिखाई जा रही है, इसकी सच्चाई अब धीरे-धीरे सामने आ रही है। बताते हैं कि अगले आम चुनाव से पहले लोकसभा सीटें बढ़ाने का खाका तैयार हो चुका है।

वर्तमान की 543 सीटों को बढ़ाकर 1000 तक करने की सुगबुगाहट तेज है। अंदरखाने मसौदा भी तैयार होने की बात कही जा रही है। ये बात पिछले दिनों कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने अपने ट्वीट के जरिए सार्वजनिक भी कर दी। उनका दावा है कि वर्ष 2024 के पहले लोकसभा सीटों की वर्तमान संख्या 543 को बढ़ाकर 1000 या उससे अधिक करने को लेकर मोदी सरकार पूरी तरह से मन बना चुकी है। हालांकि इस मसौदे पर सरकार अभी शांत है।

बहरहाल, सांसदों की संख्या में बढ़ोतरी की वकालत लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला भी कर चुके हैं। उन्होंने बाकायदा पिछले दिनों एक साक्षात्कार में कहा भी था कि भविष्य में सांसदों की संख्या में वृद्धि हो सकती है। सांसदों की बढ़ोतरी की स्थिति निर्माणाधीन संसद भवन की जरूरत पर मोहर लगाने के लिए काफी है। वैसे, देखा जाए तो कई जिले ऐसे हैं जहां एक सांसद 16 लाख से 20 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए संसदीय क्षेत्र को छोटा करना समय की दरकार भी है। सरकार को बढ़ती आबादी के अनुपात के हिसाब से लोकसभा-राज्यसभा की सीटों को बढ़ाना-घटाना चाहिए। शायद इस निर्णय में किसी दल या राजनेता को कोई एतराज भी नहीं होना चाहिए।

सवाल उठता है कि अगर सांसदों की संख्या बढ़ती है तो वह बैठेंगे कहां? मौजूदा संसद में इतना स्पेस है नहीं। इसलिए संसद भवन को बड़े आकार में परिवर्तित किया जा रहा है। नए निर्माणाधीन संसद में करीब तेरह सौ सांसदों की बैठने की व्यवस्था होगी। इस वक्त दोनों सदनों लोकसभा-राज्यसभा में 543 और 245 सदस्य हैं यानी कुल 788 सदस्य, जिन्हें भविष्य में 1300 करने का प्लान है। इजाफा वाले सदस्य भी नवीनतम संसद में आसानी से बैठ सकेंगे। सांसदों की संख्या बढ़ाने को लेकर आवाजें पहले भी उठती रही हैं। अटल बिहारी वाजपेयी भी चाहते थे। जनसंख्या की बढ़ोतरी जिस हिसाब से हो रही है उससे यह मांग कुछ व्यवहारिक लगती है। लेकिन फिर भी सांसदों की संख्या में इजाफा वाला मसला बेहद संजीदा है जिस पर सामूहिक तौर पर सभी राजनीतिक दलों को एक मंच पर आकर गंभीरता से विमर्श करना होगा।

हिंदुस्तान में बढ़ती आबादी को ध्यान में रखकर लोकसभा सदस्यों की संख्या बढ़ाना अनिवार्य भी होता जा रहा है। देश में कई संसदीय क्षेत्र ऐसे हैं जिनकी आबादी कई लाखों में हो गई। ऐसे विशालकाय क्षेत्रों का विभाजन करना जरूरी है। फिर भी सदस्यों की बढ़ोतरी के संभावित दुष्परिणामों की गंभीरता पर विमर्श करना होगा। इसे लेकर पी. चिदम्बरम ने भी अपनी व्यक्तिगत चिंता जताई है, कहते हैं यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों की संख्या बढ़ती है तो इससे संसद में दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम होगा, जो स्वीकार्य नहीं होगा। हालांकि ऐसा कुछ होगा नहीं, इसमें सबका भला एक जैसा होगा।

गौरतलब है कि ‘सेंट्रल विस्टा परियोजना’ के तहत बनाई जा रही नई संसद अगले साल 15 अगस्त को आजादी की 75 वीं सालगिरह पर बनकर तैयार होने की संभावना है। ऐसा पहली मर्तबा होगा जब इतनी बड़ी परियोजना कम समय में और तय वक्त में तैयार होगी। परियोजना पर प्रधानमंत्री की सीधी नजर है, प्रत्येक सप्ताह वह कार्ययोजना की समीक्षा करते हैं। हर काम उनकी देखरेख में संपन्न हो रहा है। संसद का नया भवन 65 हजार वर्ग मीटर में बन रहा है जिसे गुजरात की एचसीपी डिजाइन, प्लानिंग एंड मैनेजमेंट कंपनी ने डिजाइन किया है। वर्तमान संसद भवन में 788 सदस्य बैठते हैं। लोकसभा की वर्तमान सदस्य संख्या अंतिम बार 1977 में तय हुई थी, तब देश की आबादी करीब 55 करोड़ थी। आपातकाल में संविधान संशोधन विधेयक लाकर लोकसभा सदस्य संख्या 543 पर फ्रीज कर दी गई थी। यानी उस वक्त औसतन प्रति 10 लाख आबादी पर एक सांसद चुना जाता था तो अब प्रति 25 लाख आबादी पर एक सांसद चुना जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने भी सीटों के पुनर्आवंटन को वर्ष 2026 तक के लिए बढ़ा दिया था। उसके बाद सीटों का परिसीमन तो हुआ, लेकिन सीटों की संख्या वही रखी गई। सीटें बढ़ाने का काम पहले ही हो जाना चाहिए था।

बहरहाल, छिटपुट तरीके से समय-समय पर हिंदुस्तान में कई बार लोकसभा-विघानसभाओं का परिसीमन हुआ। जबकि, सभी का परिसीमन एकसाथ किया जाना चाहिए था। नई लोकसभा सीटों का गठन और उनकी सीमाओं का निर्धारण परिसीमन आयोग करता है। देश में अबतक ऐसे चार परिसीमन आयोग गठित हुए हैं। पहला परिसीमन आयोग 1952 में बना था। उसके बाद 1963 व 1973 और अंतिम परिसीमन आयोग 2002 में बना था। इसी आयोग ने 2001 की जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों की सीमाओं का पुनर्निधारण और पुनर्संयोजन किया था। मौजूदा स्थिति कुछ ऐसी है अगर सांसदों का जनसंख्या वार आनुपातिक प्रतिनिधित्व निकाला जाए तो हिंदुस्तान में यह औसतन प्रति 25 लाख पर एक लोकसभा सांसद बैठता है। संविधान के अनुच्छेद 82 में हमारे संविधान निर्माताओं ने वक्त और आबादी के हिसाब से लोकसभा सदस्य संख्या में वृद्धि का प्रावधान किया हुआ है। यकीनन आबादी के अनुपात जनप्रतिनिधियों और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़नी ही चाहिए। लेकिन सीटों की संख्या का निर्धारण बहुत व्यावहारिक, समानुपाती और सर्वसमावेशी होना चाहिए। सीटें बढ़ाने के लिए कानूनी व संवेधानिक सभी बातों का ख्याल रखना होगा।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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