

देवघर: यह पूरी दुनिया को मालूम है कि जिस एकीकृत बिहार की धरा पर कभी एक खास प्रकार के शोषण से मुक्ति का अलख भगवान बुद्ध ने जगाया था,उसी धरा पर सन् 1857 की महान् क्रांति (गदर) का पहला शंखनाद रोहिणी (देवघर) में हुआ। उन दिनों रोहिणी जैसे निपट देहात में भी ब्रिटिश सरकार ने अपनी पांचवीं अस्थायी घुड़सवार सेना की छावनी बना रखी थी। यह छावनी भागलपुर मुख्यालय के अधीन थी। यह वह दौर था जब ब्रिटिश हुकूमत को कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एक फौलादी सरहद में बांधने वाले हिंदुस्तानी सैनिकों में एक जबरदस्त आक्रोश खदबदाने लगा था।


सरकार की दोरंगी नीतियों से बगावत का जो बारूद साल-दर-साल इकट्ठा हो चुका था,उसे एक फौजी मंगल पाण्डेय की शहादत ने वह चिंगारी दिखलाई कि सारा हिंदुस्तान ही लहक उठा। 12 जून, 1857 को हाथों में नंगी शमशीरें उठाए रोहिणी छावनी के तीन सैनिकों ने सर नार्मन लेस्ली बार्ट को मौत के घाट उतारकर जंगे-आजादी का ऐलान कर दिया। लेकिन,अन्वेषण और सूचना के स्तर पर हुकूमत का ढांचा ऐसा विलक्षण था कि महज तीन दिन के अंदर बगावत का परचम लहराने वाले सलामत अली, अमानत अली और शेख हारून को पकड़ लिया गया।

हुकूमत ने पहले से ही तय कर लिया था कि इनके साथ कैसा सलूक करना है। इसलिए, बिना किसी विधिक प्रक्रिया का पालन किए दिनांक 16 जून, 1857 को प्रसिद्ध रोहणिया आम के दरख्तों में फंदे डालकर बड़े अमानुषिक ढंग से उन्हें फांसी दे दी गई। स्थानीय स्तर पर इस घटना की तीव्र प्रतिक्रिया हुई और 32वीं पैदल सेना के भारतीय जवानों ने दिनांक 9 अक्टूबर, 1857 को लेफ्टिनेंट कूपर तथा असिस्टेंट कमिश्नर रोलैंड को बेदर्दी से मार कर रोहिणी के अपने सैनिक साथियों की बेमिसाल कुर्बानी का बदला ले लिया।
इन मारे गए फिरंगी साहबों को देवघर एसडीओ साहब के बंगले के पीछे एक छोटी सी कब्रगाह में दफनाया गया था। पुरातत्व की भाषा में कहें तो यह कब्रगाह 1857 की क्रांति में देवघर की भागीदारी का एकमात्र भौतिक साक्ष्य है.अफसोस की बात है कि इतने साल बाद भी हमारी सरकारों ने इस इकलौती निशानी को सहेजने की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। कुछ ने तो अंग्रेजों की कब्रगाह मानकर इसे बिसराने में ही ‘बुद्धिमानी’ समझी। लेकिन, ऐसे लोगों को कौन समझाए कि यह कब्रगाह ‘गदर’ में हिन्दुस्तानी सैनिकों के शौर्य और शहादत की साक्षी भी तो है।

इसे झाड़-झंखाड़ों के बीच में छोड़कर हम अतीत का ऐसा सूत्र खुद नष्ट कर रहे हैं जिसके लिए शायद हमें इतिहास कभी माफ नहीं करे। किसी विशिष्ट नस्लवादी नजरिए से इस कब्रगाह को देखने वालों को यह भी जानने की जरूरत है कि संताल परगना के पाकुड़ के मार्टिलो टावर को भी फिरंगियों ने ‘हूल’ के नायकों से बचने और उनपर गोलियों की बौछार करने के लिए बनाया था। यानी मनोगत रूप से टावर के स्थापत्य का उद्देश्य कहीं से भी सकारात्मक नहीं दिखता।
लेकिन,इसे इसलिए महफूज रखा गया है, क्योंकि यह सन् 1855-56 के ऐतिहासिक ‘संताल हूल’ का एकमात्र भौतक साक्ष्य है। यानी पाकुड़ का शासन-प्रशासन हिंदुस्तानी शहादत के प्रतीकों को ‘चीन्हने-पहचानने’ के संदर्भ में देवघरवालों की तरह भ्रमित नहीं है। यह भी याद रखना चाहिए कि यहां देवघर की जिस ब्रिटिशकालीन कब्रगाह की बात की जा रही है,उसमें कई अंग्रेज महिलाओं और बच्चों की समाधियां भी शामिल हैं। इनका साम्राज्यवादी संघर्ष, औपनिवेशिक कुटिलता और उस दौर के घनघोर पेशेवर एजेंडों से कोई लेना-देना नहीं था।
असमय काल के गाल में समा चुके इन निर्दोष बच्चों के परिजनों ने उनकी समाधियों पर श्रद्धांजलि स्वरूप जो शब्द उकेरे हैं,वे एक युग बाद भी इंसानियत के जज्बातों से हमारा साबका कराते हैं। इनकी उपेक्षा और बदहाली इंसानियत की हमारी समझ पर भी लांछन है। यह सब तब और कचोटता है जब हम पाते हैं कि इस खामोश कब्रगाह से चंद फासलों पर सदरे निजाम डीसी साहब,एसडीओ साहब और ऐन बगल में डिस्ट्रिक इंफोर्मेशन आफिसर के आवास मौजूद हैं। रोड बनाने वाला एक विभाग अपने बेकार चारकोलों की ड्रमें भी यहीं डंप करता है।

अपनी जगह की सुरक्षा के लिए आजकल एक विशेष विभाग यहां इस कदर घेराबंदी करवा रहा है कि किसी को दौर-ए-गदर की इस कब्रगाह के नामो-निशान का भी पता नहीं चलेगा,क्योंकि बेतरतीब दरख्तों और झाड़ियों ने पहले से ही इसकी असली सूरत ढक रखी है।
(लेखक झारखण्ड शोध संस्थान, देवघर के सचिव हैं)


