

रांची।

झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि निचली अदालत जमानत या अग्रिम जमानत की सुनवाई के समय पीड़ित को मुआवजा देने के लिए राशि तय नहीं कर सकता।

शुक्रवार को जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि सीआरपीसी के सेक्शन 357 में इस तरह का प्रावधान नहीं है और यह अधिकार निचली अदालत को नहीं दिया गया। अदालत सिर्फ मुआवजा देने की सिफारिश कर सकती है। इसके बाद जिला विधिक सेवा प्राधिकार समुचित जांच के बाद निर्णय लेता है। इस कारण रांची के निचली अदालत द्वारा अग्रिम जमानत की सुनवाई के दौरान अभियुक्त पर एक लाख मुआवजा देने का आदेश उचित नहीं है।

एक मामले में दायर हुई थी याचिका
इस संबंध में सुमित कुमार साव और अन्य ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें कहा गया है कि मो. माउम आलम ने एक कार खरीदी थी। इसके लिए राशि का भुगतान किया गया। लेकिन कार बेचने वाले ने एनओसी नहीं दिया था। एनओसी के लिए कई बार मांग की गयी थी। इस बीच कार दुर्घटनाग्रस्त हो गयी। लेकिन एनओसी नहीं रहने के कारण इन्हें बीमा का भुगतान नहीं किया जा सका। इसके बाद सुमित कुमार साव एवं अन्य के खिलाफ लोअर बाजार थाना में प्राथमिकी दर्ज की गयी। इसके बाद सुमित एवं अन्य ने अग्रिम जमानत याचिका दायर की। अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सुमित एवं अन्य पर एक लाख रुपये पीड़ित को देने का निर्देश दिया। इस आदेश के बाद सुमित एवं अन्य ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इसमें प्रार्थियों की ओर से कहा गया कि जमानत के समय मुआवजा निर्धारित करने का अधिकार कोर्ट को नहीं है। इस पर हाई कोर्ट में सभी पक्षों को प्रतिवादी बनाते हुए सुनवाई की गयी।
HC ने दिया ये आदेश
सुनवाई के बाद अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद आदेश दिया कि सीआरपीसी के सेक्शन 357 में इस तरह का प्रावधान और शक्ति निचली अदालत को नहीं है। अदालतें सिर्फ क्षतिपूर्ति देने की अनुशंसा कर सकती है मामले की उचित जांच के बाद डिस्टिक लीगल सर्विसेज अथॉरिटी और झारखंड स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी इस पर अपना फैसला कर सकती हैं। विक्टिम कंपनसेशन के तहत सरकार ने सभी श्रेणियां तय की हैं और मुआवजे की राशि भी निर्धारित है।



