
डॉ. शीलधर सिंह की पुण्यतिथि पर विशेष: डॉ. (प्रो०) शीलधर सिंह का जन्म 21 जुलाई 1932 को ग्राम टाभाघाट पो० जसीडीह जिला देवघर में एक मध्यवित्तीय परिवार में हुआ था। मध्यवित्ततीय परिवार में पैदा होने के कारण शीलघर सिंह के जीवन में आरम्भ से ही संघर्ष रहा। पर संघर्षशील रहने के कारण उनका अध्ययन निरन्तर चलता रहा। जिस युग में शीलधर सिंह का व्यक्तित्व बन रहा था वह हिन्दी साहित्य में छायावाद युग के अन्त और प्रगतिशील कविता के जन्म का दौर रहा पर छायायुगीन कवियों के प्रभाव से यह युग मुक्त नहीं हो सका था। वस्तुतः छायावाद ही वह युग है जिसमें हिन्दी और हिन्दी कविता ने रचनात्मक स्तर पर बहुत समृद्धि प्राप्त की। भाषा सौन्दर्यबोध, भावगौरव और अर्थगौरव इसी युग में हिन्दी भाषा ने प्राप्त किया। उसको आगे बढ़ाने का काम प्रगतिशील लेखकों ने किया। यही काल था जब शीलधर सिंह का रचनात्मक मानस निर्मित हो रहा था। इसका प्रभाव इनकी कविताओं और लेखन की अन्य विधाओं पर देखा जा सकता है। शीलघर सिंह निरन्तर रचनाशील और प्रयोग रहते हुए अपनी कृतियों के माध्यम से एक व्यापक जीवन बोध का परिचय दिया है हिन्दी गद्य एवं पद्य में अपनी प्रयोगधर्मिता से उन्होंने साहित्य की विविध विधाओं का बहुआयामी विस्तार किया है।

डॉ. शीलघर सिंह की कृतियों का विस्तार और वैविध्य इतना अधिक है कि उनके यहां एक साथ कई साहित्य और रचना परम्पराओं का समन्वय मिलता है। अपनी समस्त कृतियों में उन्होंने भाषा और भाव बोध के नये धरातलों का स्पर्श भी किया है। साथ ही साथ उन्होंने हिन्दी में कई नये साहित्य रूपों का भी विकास किया है। इनकी रचनाओं में न केवल निबंधों की रचना की बल्कि साहित्यिक निबंध से लेकर व्यग्यात्मक निबंध वण्यप्राणी के संरक्षण से सम्बन्धित निबंध सम्मिलित है। लोकगीतों के सम्बंध में भी उन्होंने आलोचात्मक निबंध लिखें। कविवर आरसी प्रसाद सिंह जैसे आधुनिक रचनाकार से लेकर हिन्दी साहित्य में रचे गए हास्य-व्यंग्य संबंधी विषयों पर भी उन्होंने अपनी लेखनी चलाई। भारतीय नाटक जैसे विषय पर उन्होंने कई साहित्यिक निबंध लिखकर नाटय रचना के सन्दर्भ में अपनी समझ का परिचय दिया। न केवल उपन्यास और कहानियों के माध्यम से बल्कि निबंधों और साक्षात्कार में भी उनकी बेवाक शैली को परिलक्षित किया जा सकता है।

सामान्यतः जिन विषयों पर रचनाकारों की नजर नहीं के बराबर जाती है उन विषयों पर भी शीलधर सिंह ने कई महत्वपूर्ण निबंध लिख डाले जैसे कटा हुआ पैर, बालू और बालूका, झरना जाग उठा, दो फसली जमीन, जैसे विषयों पर काफी संख्या में निबंधों को देखा जा सकता है। आज जो पुस्तकार के रूप में अभयारण्य’ नामक एक मोटी पुस्तकों में संकलित है। ‘पदलिप्सा, श्रद्धा का श्राघ, चाय चरणामृत, हजार बेटे का बाप, अपना आदमी जैसे विषयों पर भी शीलधर सिंह ने निबंध और टिप्पणियां लिखी।
बहुत सारे मामलों में मनुष्य जंगलों पर निर्भर है। चूँकि शीलधर सिंह का गांव झारखण्ड जैसे समृद्ध राज्य में हुआ था इसलिए उनका लगाव खास तौर पर नदियों, जंगलों झरणों, प्रपातों, वन्यप्राणियों, पशु-पक्षियों आदि से था। यहीं कारण है कि उन्होंने गिरगिट, बकरी की बच्ची, मंदारगिरि, देवगिरिया, त्रिकुटी पहाड़, कैलाबाछा, शरीफा आता है। वन्यप्राणी संरक्षण, जंगल बचाओं, प्राण बचाओं, कटहल, खाद्यान समस्या और वन, वन का त्राण-देश कल्याण, वन और उद्योग धंधे, वन महोत्सव जैसे विषयों पर सैकड़ों निबंध लिख डाले हैं। वन्य प्राणियों से उनका बेहद लगाव था। प्रकृति से निकटता और वनों का मनुष्य जीवन में महत्व आदि का पता इनकी रचनाओं को पढ़ने से स्पष्ट पता चलता है।
डॉ. शीलधर सिंह ने कुछ स्वतंत्र विषयों पर निबंधों की रचना की। जिसमें देवताओं से सम्बधित निबंध भी सम्मिलित किये जा सकते है। उदाहरण के तौर पर गौत्रीय संताल द्वारा पूजित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग वासुकीनाथ, कणेश्वर महादेव का धाम माँ काली की महिमा पथरौल, जैसे विषयों पर लिखकर अपनी रचनाशीलता का पर्पा है। इसके अतिरिक्त उन्होंने कटहल, पर्यावरण, प्रदूषण, संतोष, चोट, सत्यवादी, पिकनि प्रवचन, पराया प्रकाश जैसे विषयों पर रचना कर साक्ष्य प्रस्तुत किया है।
डॉ. शीलधर सिंह ने कई महत्वपूर्ण रेखांकित करने लायक कई कहानियों की रचना कर अपनी कथात्मक प्रतिमा का परिचय दिया हैं जिसमें कटा हुआ पैर, कहानी को देखा जा सकता है। जिसे स्वपन दर्शन की शैली में प्रस्तुत किया गया है। कैला बाछा’ जैसे एकांकी की रचना कर उन्होंने अपनी रचनात्मकता का क्षेत्र का विस्तार किया है। रचनाकारों में कुछ ऐसे रचनाकार होते हैं जो बहुत लिखते हैं लेकिन अपने बारे में बहुत कम लिखते हैं या बहुत कम बोलते हैं। असल में उनका व्यक्तित्व एक पारदर्शी शीशे की तरह होता है जो संकोच के एक झीने परदे से ढका होता हैं वे आत्म विज्ञापन नहीं करते है। उसे एक परदे की तरह हटाना, एक किताब की तरह खोलना और एक आईने की तरह पढ़ना होता है। ‘अभयारण’ एक ऐसी पुस्तक है जिसे आईने की तरह पढ़ा जा सकता हैं इस आईने में शीलधर सिंह की एक सर्वथा बेलाग और बेलौस छवि देखी जा सकती है। ‘अभयारण्य’ पुस्तक को पढ़ने पर सही माइने में डॉ. शीलधर सिंह की आत्मा की आवाज सुनाई पड़ेगी। इस प्रकार स्पष्ट है कि शीलधर सिंह ने मनुष्य जीवन के विविध पक्षों को रेखांकित करते हुए अपनी साहित्यिक प्रतिभा का परिचय दिया है।
डॉ. शीलधर सिंह की कविताओं के वस्तु संदर्भ से सम्बन्धित है। इनके प्रमुख काव्य संकलन देश की माटी हमें बुलाती का वस्तु सन्दर्भ कई विषयों से सम्बन्धित है। पर उसका मुख्य स्वर उन अमर शहीदों और उन जवानों से जुड़ा हुआ है जो देश की भलाई के लिए, हमारी स्वतंत्रता के लिए, हमारे कल्याण के लिए हर एक कुर्बानी करते है जो संभव है। यहां तक जीवन का भी दांव लगाते हैं। डॉ. शीलघर सिंह की मनोवृति त्याग और बलिदान की है। रक्त पिपासु हिंसक की नहीं क्योंकि वे जानते हैं कि युद्ध का अंतिम परिणाम केवल ध्वंस और सर्वनाश है इसलिए वे युद्ध का निषेध करते हैं पर अपनी एकता और अखण्डता का कभी सूर्य नहीं डूबने देना चाहते। वे मनुष्यता और वे विश्व बन्धुत्व के पक्षधर है। उन्होंने कई ऐसे उदबोधन गीत लिखे जिसमें मनुष्य को आत्म निर्भर बनने की सलाह दी गई है, और अपनी जड़ता को समाप्त करने की रचनात्मक सलाह भी। मनुष्य के गौरव को, उनके श्रम को, उसके निर्माण शक्ति को, उसके हौसले को, जीत के दिशा में ले जाने की प्रेरणा इन उदबोधन गीतों का वस्तु सन्दर्भ है। उठ उठकर गिरना, सागर में ज्योति, नये साज सजाना और आगे बढ़ना ही नव युवकों का लक्ष्य है। ऐसा ही सन्देश डॉ. शीलघर सिंह की रचनाओं में है। ‘सत्यमेव जयते’ और विश्व बन्धुत्व उनका प्यारा है पर अपनी सीमाओं की रक्षा उनको सौ प्राणों से भी प्यारा है। वे संकल्पित है कि करोड़ों सर कटा देगें, हम अपने इतिहास को पुनः जगा लेगे, भामाशाह और वीर शिवाजी, महाराणाप्रताप और गाँडीव अर्जुन को पुनः खड़ा कर लेगें, शंकर का प्रलय तांडव होगा, पर अपनी स्वतंत्रता की रक्षा हम हर कीमत पर करेंगे।
इस तरह एक तरफ उनकी चिन्ता राष्ट्र की रक्षा की है तो दूसरी तरफ रूढ़ियों को तोड़कर चीर बन्धनों से मुक्त होकर नए समाज का नव निर्माण भी है। वे रचनात्मकता का नया गीत गाना चाहते है, जिससे नये ग्राम राज्य की स्थापना संभव हो सके।
डढ़वा के तीरे-तीरे उनका दूसरा कविता संकलन है। जिसमें मुख्यतः प्रकृति सम्बन्धी रचनाएँ संकलित है। डॉ. शीलघर सिंह की कविताओं में मनुष्य जीवन की जरूरी आवश्यकताओं के लिए गहन चिंता है। अबकी भी अगर वर्षा नहीं हुई। कैसे हम जीयेंगे तुम्ही करो चह चिंता न तो आकस्मिक है ओर न गढ़ी हुई है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में ‘जहां वर्षा पर जनता का जीवन निर्भर है। कवि की यह चिन्ता सहज स्वाभाविक है। एक बड़ा ही सुन्दर चित्र इस प्रकार है। “सखुआ, महुआ के फलों के सुरभि संग दूर-दूर बह गया। डढ़वा के तीरे-तीरे संकलन में गीत से लेकर जंगल, मिट्टी, सूखा, गांग, चिन्ता, अभिनव प्रभात, बाढ़, धन्वतरी की प्रतिज्ञा, हार की जीत जैसे अनेक विषयों पर लिखकर डॉ. शीलधर सिंह ने रचनाकर वैविध्य के विषय क्षेत्र का विस्तार से परिचय दिया हैं डॉ. शीलघर सिंह की रचनाओं के वैविध्य परिचय को इस प्रकार देखा जा सकता है। यह वैविध्य उनकी रचनात्मक शैली से सम्बन्धित है। इसमें कुछ तो सैद्धान्तिक आलोचना के निबंध है और कुछ व्यवहारिक आलोचना से सम्बन्धित निबंध है। जिसमें मुख्यतः दक्षिण बिहार के लोकगीत भवप्रीता नन्द ओझा, आधुनिक हिन्दी के भूले बिसरे कवि आर.सी. प्रसाद सिंह और अर्जुन दास जैसे निबंध है। ‘कर्णेश्वर महादेवधाम’ सुप्रसिद्ध जाग्रत तीर्थ पथरोल, बासुकीनाथ, महिमामयी माँ चंचल, जैसे निबंध धार्मिक विषयों से सम्बन्धित है। भारतीय स्वतंतता के अमर सैनानी बाबू वीर कुंवर सिंह के त्याग और बलिदान से सम्बन्धित है। हड़ताल, गणित, मंदारगिरि, व्यवरथा, वाणप्रस्थ, जैसे निबंध स्वतंत्र विषयों पर आधारित है।
कई ऐसे निबंध भी है जो जंगल जीवन से सम्बन्धित है जैसे हजारीबाग वन विहार, वन की उपयोगिता, भारत के वण्यप्राणी और उनका संरक्षण, जहां वायसन पलामू नेशनाल पार्क, बेतला। खेती के आधार पर, हमारे वन का त्राण, देश कल्याण ये सारे निबंध वन्य जीवन से सम्बन्धित है। कुछ निबंध मिले जुले भी है। हिन्दी दिवस, श्रद्धाजंलि, विषपान, सत्यवादी, पदलिप्सा आदि सम्मिलित किये जा सकते है।
निष्कर्षतः शीलधर सिंह के निबंध जीवन के बहु आयामी क्षेत्रों को अपने में सम्मिलित किए हुए है। उनका स्वतंत्र अध्ययन अपेक्षित है। डॉ. शीलघर सिंह ने उसी समय से कविता लिखना शुरू कर दिया था जिस समय वे स्कूल के छात्र थे। स्कूली शिक्षा से लेकर आखिर समय तक खूब काव्य साधना किया। जीवन की एक लम्बी यात्रा के दौरान लगभग हजारों की संख्या में छोटी-बड़ी कविताएं लिखी है जो दो पुस्तकार प्रकाशित भी हो चुकी है। डढ़वा के तीरे-तीरे, और देश की माटी हमें बुलाती काव्य संकलन है। कविता गीत, गजल, लघु व्यंग्यकला, कहानी, उपन्यास, यात्रावृतांत, संस्मरण, रितोपार्ज जैसे अनेक रचनाएं भी लिखी है। वास्तव में डॉ. शीलधर सिंह की प्रसिद्धि एक कहानीकार के रूप में नहीं बल्कि एक कुशल कवि के रूप में अधिक है और यह कहना अनैयित्यपूर्ण नहीं होगा कि इन्होंने हिन्दी काव्य के क्षेत्र में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त किया हैं डॉ. शीलघर सिंह की काव्य साधना के क्रम विकास का अध्ययन करते समय सबसे पहले जो बात उल्लेखनीय प्रतीत होती हैं वह यह कि इस कवि की प्रतिभा निसर्गजात है। अर्थात स्वभाविक सिद्ध कवि है। काव्य रचना पर अपना धाक जमा चुके थे। शीलधर सिंह की काव्य प्रतिमा इतनी तेज हो चुकी थी कि वह किसी विषय पर अनायास स्वल्प काल में ही कविता कर सकते थे। भाव ओर भाषा पर समान रूप से अधिकार होने के कारण इनकी भाषा भाव की अनुगामिनी बनकर चलती है और उसमें एक स्वभाविकस प्रवाह भी होता है। कवि का हृदय हमेशा समय के साथ हर धड़कन के साथ-साथ चलता है। प्रकृति प्रेम, राष्ट्रीय एवं क्रान्तिकारी भावनाएं, सौन्दर्य विकास और गूढ़, गंभीर दार्शनिक चिन्तन, इन सबका समावेश कवि की रचनाओं में अपने आप मिलेगा। हिन्दी के पूर्वाचल देवाघर, संताल परगना के इस सुकवि की सरस, सुबोध स्वभाविक शैली में स्वरचित कविताएं दशौं से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, आकाशवाणी दूरदर्शन के विभिन्न केन्द्रों से प्रसारित और कवि सम्मेलनों में सस्वर पढित होती रही है। डॉ. शीलधर सिंह की कविता की सबसे बड़ी खासियत है सरल, सुबोध, प्रेषणीय होने के फलस्वरूप इनकी कविता पाठ प्रबुद्ध श्रोताओं द्वारा बड़े चाव से सुना-समझा जाता रहा है।
ग्राम पंचायत और वन विभाग में कुछ दिनों तक बिहार सरकार की सेवा में रहने के बाद डॉ. शीलधर सिंह जामताड़ा महाविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक की सेवा में लगातार 03 जनवरी 1964 से 6 फरवरी 1992 तक रहे। 24 फरवरी 1986 से 31 मार्च 1990 का प्रभारी प्राचार्य के रूप में भी कार्य किये। एक सफल शिक्षक के साथ-साथ एक सफल प्रशासक की भी भूमिका निभायी।
शीलघर सिंह विभिन्न पद को संभालते हुए राजभाषा / राष्ट्रभाषा हिन्दी की सेवा में लगातार संलग्न रहे। शीलघर सिंह ने डढ़वा’ जैसी अश्रुतपूर्व नदी को भी जनमानस का आकर्षण दिया है। सुकवि डॉ. शीलधर सिंह के ग्रामांचल में बहने वाली एक छोटी सी नदी है। जिसके तीरे-तीरे इनका वाल्यावस्था व्यतीत हुआ है। प्रेम, वासना, विरह और वेदना के गीतों में एक और यदि तरूण कवि की भावनारओं में मादकता एवं मिठास है तो दूसरी ओर राष्ट्रीय कविताओं में ऐसे तेजो दीप्त भाव भी है, जिनमें यौवन सुलभ उत्साह, उद्दीपना विक्षोभ एवं विद्रोह है। डॉ. शीलघर सिंह के सम्बंध में कई जगहों पर कविवर आरसी प्रसाद सिंह ने डॉ. शीलधर सिंह जी कवि है, उसी अनुपात में चिन्तक, लेखक, उपन्यासकार और सफल दार्शनिक भी कहा है। इनका मानना है कि कविता को चिन्तक की गहराई में जो तत्व मिलते हैं वे बौद्धिक अधिक, रागात्मक कम होते हैं। डॉ. शीलधर सिंह ने इन दोनों के मध्य समान मूल्यों को लयात्मक ढंग से अपनाया है। एक गीत कार के साथ-साथ एक सफल कलाकार भी है। कला के प्रति गहन रूचि रखना। कला की विशेषता है तीव्रता। यह तीव्रता भाव और विचार दोनों दृष्टियों से सिंह में समान रूप से विद्यमान है। इनकी कविता को पढ़ते समय हमें उनके प्रशांत चिंतक की शिल्पी कारूकर्मी तथा जीवन और जगत के बीच एक संतुलित वस्तुमुखी व्यक्तित्व रखने वाले, एक सुलझे व्यक्ति का दर्शन होता है।
डॉ. शीलधर सिंह जनता के अनुभवों और परम्पराओं, उसकी भाषा कला चेतना में पूर्णतः आस्था रखने वाले कवि है। हाँ इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि समाज और जीवन से उन्होंने उत्पीड़न भी कम नहीं पाया है। किन्तु कभी वे प्रतिक्रियात्मक रूख नहीं अपनाते है। कवि ने सर्वत्र अपनी कविता में अध्यात्म में नीलकाश में सुदूर क्षितिजों तक उडान भरने की कोशिश की हैं कवि हमेशा मौन साधे रहते है उनका संत रूप निखर कर उठता है वही एक संत की वाणी फूट पड़ती है-
डॉ. शीलधर सिंह यश के आकांक्षा नहीं रहे। उसके लिए जो कुछ आजकल किया जाता है वह उन्होंने कभी नहीं किया। डॉ. शीलधर सिंह से कम लिखने वाले, कम प्रतिभावान आज वरेण्य बन चुके हैं। उन्हें इन सबका कोइ गिला शिकवा नहीं है। जिन्हें सम्मान की कोई आकांक्षा नहीं उन्हीं को सम्मान देने पर तो सम्मान का वास्तविक अर्थ चारितार्थ होता है। डॉ. शीलधर सिंह का सम्मान मेरी दृष्टि से अच्छी भारतीय जीवन दृष्टि को सम्मानित करता है।
लेखक: डॉ. जितेन्द्र कुमार सिंह, प्राध्यापक हिन्दी विभाग राँची विश्वविद्यालय, राँची (झारखण्ड)



