
Deoghar: देवघर जिला के सारठ प्रखंड स्थित चितरा ईसीएल कोलियरी में कोयले का अकुत भंडार है।इसके बावजूद जलावन के लिए एक अदद कोयला स्थानीय गरीब, मजदूर और किसान को नहीं मिलता है। बड़ी विडम्बना है कि जिस प्रखंड क्षेत्र में अवस्थित चितरा कोलियरी से कोयला निकाल कर झारखंड राज्य समेत अन्य प्रदेशों में भेजा जाता है जिससे करोड़ों रुपए के राजस्व का मुनाफा होता है। उसी प्रखंड क्षेत्र के लोगों को कोलियरी से जलावन के लिए एक ढेला कोयला तक नहीं मिलता है।

गौरतलब है कि स्थानीय लोगों को कोयला खरीदारी करने का भी कोई सरकारी नियम या प्रावधान नहीं है।स्थानीय कहते हैं हमें यहां से कोयला नहीं मिलने का प्रावधान का कारण इस क्षेत्र के राज नेताओं की इच्छा शक्ति की कमी है।

जानकार बताते हैं कि वर्ष 1977 से 1980 तक एक मैट्रिक टन कोयला इस क्षेत्र के किसानों को क्रय शक्ति के रूप में प्राप्त होता था। लेकिन बाद में 1980 से कोल इंडिया द्वारा दस मैट्रिक टन कोयला देने की प्रथा चालू की गयी। कालांतर में ई.सी.एल. के बोर्ड आफ डायरेक्टर्स द्वारा इस बात का निर्णय लिया गया कि सौ टन से कम कोयले का ड्राफ्ट नहीं लगेगा और इसी तरह से यहां ऐसे नियम कानून बनते रहे जिससे व्यवसायियों, पैसे वाले लोगों तथा खुद ई.सी.एल. को लाभ तो पहुंचता रहा लेकिन आम जनता एवं किसानों को बैलगाड़ी में जलावन के लिए कोयला कैसे मिले इस पर कोई नियम कानून आज तक नहीं बन पाया है। जबकि इस क्षेत्र के जनप्रतिनिधि स्पीकर और मंत्री जैसे पदों पर आसीन रहे।

हालांकि, ये भी सच है कि कई स्थानीय लोगों द्वारा सांठ-गांठ कर जलावन हेतु कोयलें की व्यवस्था कर ली जाती है। वहीं कोल माफियाओं को चितरा कोलियरी से प्रतिदिन व्यापक पैमाने पर चार चक्का, मोटरसाइकिल और साइकिलों से अवैध कोयला ले जाते हुए विभिन्न सड़कों पर आसानी से देखा जा सकता है।
इधर, स्थानीय लोग कोयले के आभाव में गोबर को प्रचुर मात्रा में गोयठे के रूप में सुखा कर इन्हें जलावन के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इतना ही नहीं ये लोग कोयले के अभाव में झाड़ी जंगल को साफ कर दे रहे हैं। लकड़ियों के कट जाने के कारण पर्यावरण अंसतुलन के साथ साथ बिषैले लकड़ियों के जलाने के कारण लोग घातक बीमारियों के शिकार भी हो रहे।
स्थानीय लोग इसके लिए सबसे बड़ा दोषी ई.सी.एल. उच्चाधिकारियों, स्थानीय राज नेताओं एवं जिला प्रशासन को ही मानते हैं। वे लोग तर्क देते हुए कहते है कि अगर स्थानीय राज नेताओं एवं जिला प्रशासन स्थानीय लोगों के दुख दर्द को समझ कर ई.सी.एल. प्रबंधक पर दबाव डालती तो बैलगाडियों में जलावन हेतु किसानों को कोयला उपलब्ध जरूर कराया जाता।

वही बुद्धिजीवियों का तो यहां तक कहना है कि राज नेताओं एवं जिला प्रशासन चाहे तो प्रखंड या पंचायत स्तर पर कोयले का डीपो खुलवा कर स्थानीय लोगों को उचित दर पर कोयला मुहैया करा सकती है।



