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आजादी के दिवाने: तीन गोली लगने के बाद भी 71 वर्षीय बूढ़ी गांधी ने नहीं छोड़ा था तिरंगा

जालिम अंग्रेजों की तड़तड़ाती बंदूकों के सामने खड़ी होकर तीन गोलियां खाने वाली 71 साल की यह ऐसी वीरांगना थी, जो आखिरी सांसे थमने के बाद हाथों से तिरंगा नहीं छोड़ा था।

कोलकाता: आजादी का दिन 15 अगस्त करीब है, लेकिन यह आजादी आसानी से नहीं मिली थी। अनगिनत सेनानियों, जांबाजों ने अपनी कुर्बानी दी थी। इनकी वीरता और साहस के तमाम किस्से आज भी सुने जाते हैं। ऐसे अनगिनत सपूतों को जनने वाली भारत भूमि ने अपनी कोख में ऐसी ऐसी वीरांगनाएं भी जनी हैं, जिनकी गाथाएं सदियों तक पीढ़ियों को हमारे प्यारे वतन की बेहतरी के लिए न्यौछावर होने की प्रेरणा देती रहेंगी। ऐसी ही एक वीरांगना थीं बंगाल की “बूढ़ी गांधी”।

जी हां महात्मा गांधी की अमिट कहानियां तो पूरी दुनिया पढ़ती-सुनती और सुनाती है, पर बूढ़ी गांधी के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। जालिम अंग्रेजों की तड़तड़ाती बंदूकों के सामने खड़ी होकर तीन गोलियां खाने वाली 71 साल की यह ऐसी वीरांगना थी, जो आखिरी सांसे थमने के बाद हाथों से तिरंगा नहीं छोड़ा था।

बूढ़ी गांधी का असली नाम मातंगिनी हाजरा है, जिनका जन्म 19 अक्टूबर 1870 को पूर्वी बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) मिदनापुर जिले के होगला गांव में हुआ था। उन्हें ‘गांधी बूढ़ी’ या फिर ‘ओल्ड लेडी गांधी’ के नाम से जाना जाता है। मातंगिनी उन हज़ारों लोगों में से एक हैं, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए खुद को कुर्बान कर दिया, लेकिन उनकी कुर्बानी आज शायद ही किसी को याद है।

केवल 12 वर्ष में हो गई थी शादी

गरीबी के कारण 12 वर्ष की आयु में ही उनका विवाह 62 वर्षीय विधुर त्रिलोचन हाजरा से कर दिया गया। विवाह के छह साल में ही उनके पति की मौत हो गई और इसके बाद 18 साल की मातंगिनी अपने मायके लौट आईं। उनके घर के आसपास गलियों से आजादी के दीवानों की टोलियां गुजरा करती थीं, जिनके हाथों में तिरंगे होते थे और भारत माता के जयकारे लगते थे। हर बार खिड़कियों पर खड़ी होकर उन्हें देश के लिए कुर्बान होने का जज्बा लहरें मारता था।

हमेशा से ही स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में सुनने-जानने में दिलचस्पी रखने वाली मातंगिनी कब एक सेनानी बन गई, शायद उन्हें खुद भी पता नहीं चला। आखिर आजादी की इस दीवानों को कौन रोक सकता था। साल 1905 से उन्होंने सामने आकर महात्मा गांधीजी के आंदोलनों में भाग लेना शुरू किया। मिदनापुर का नाम यहां से स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाली महिलाओं के चलते इतिहास में दर्ज है और मातंगिनी उनमें से एक हैं।

बापू के आदर्शों को जीवन बना चुकी थी हाजरा

मातंगिनी ने गाँधीजी की सीखों को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया था। वह खुद अपना सूत कातती और खादी के कपड़े पहनती थीं। इसके अलावा, वह हमेशा लोगों की सेवा करने के लिए तत्पर रहती थीं। जनसेवा और भारत की आज़ादी को ही उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था।

नमक आंदोलन में अंग्रेजों ने किया था गिरफ्तार

1932 में गांधीजी के नेतृत्व में देशभर में स्वाधीनता आन्दोलन चला। वन्दे मातरम् का घोष करते हुए जुलूस प्रतिदिन निकलते थे। जब 26 जनवरी 1932 को ऐसा एक जुलूस मातंगिनी के घर के पास से निकला, तो वे भी उस जुलूस के साथ चल दीं। तामलुक के कृष्णगंज बाजार में पहुंचकर एक सभा हुई। वहां मातंगिनी ने सबके साथ स्वाधीनता संग्राम में तन, मन, धन से संघर्ष करने की शपथ ली। उसी साल, मातंगिनी ने अलीनान नमक केंद्र पर नमक बनाकर, ब्रिटिश सरकार के नमक कानून की अवहेलना की। इसके लिए उन्हें ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार किया और उस समय उनकी उम्र 62 साल थी। जेल से रिहाई के बाद भी मातंगिनी अपने लक्ष्य पर डटी रहीं। उन्होंने एक पल के लिए भी स्वतंत्रता संग्राम को छोड़ने के बारे में नहीं सोचा।

बुढ़ापे में कई बार गईं जेल लेकिन कमजोर नहीं पड़े फौलादी इरादे

इतना ही नहीं, साल 1933 में जब सेरमपुर (इसे श्रीरामपुर भी कहा जाता है) में कांग्रेस के अधिवेशन में ब्रिटिश सरकार ने लाठीचार्ज किया तो उन्हें काफ़ी चोटें भी आयीं। उस उम्र में भी, अपने दर्द को सहते हुए उन्होंने हमेशा भारत के बारे में ही सोचा। जब बंगाल के तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर, जॉन एंडरसन यहाँ दौरे पर आए, तो उन्होंने उनके सामने जाकर उन्हें काले झंडे दिखाएं और अपना विरोध प्रकट किया। इसके बाद भी उन्हें बहरमपुर जेल में छह महीने की कैद मिली। इन कारावास और जेल की यातनाओं ने मातंगिनी के इरादों को और मजबूत किया।

भारत छोड़ो आंदोलन के मुख्य सेनानी बनी थी मातंगिनी

1935 में तामलुक क्षेत्र, भीषण बाढ़ के कारण हैजा और चेचक की चपेट में आ गया। वे अपनी जान की परवाह किये बिना राहत कार्य में जुट गई। फिर साल 1942 में जब गांधीजी ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया तो मातंगिनी इस आंदोलन की मुख्य महिला सेनानियों में से एक बनकर उभरीं। 29 सितंबर 1942 को उन्होंने छह हजार लोगों की एक रैली का नेतृत्व किया और तामलुक पुलिस चौकी को घेरने के लिए निकल पड़ीं। लेकिन जैसे ही वे लोग सरकारी डाक बंगला पहुंचे तो पुलिस ने इन क्रांतिकारियों को रोकने के लिए लाठी डंडे और गोली चलाई।

हाथ में गोली लगने के बाद भी बूढ़ी गांधी ने थामे रखा था तिरंगा

उक्त आंदोलन के दौरान ब्रिटिश पुलिस अफ़सरों ने निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाई। मातंगिनी एक चबूतरे पर खड़े होकर अपने हाथ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का झंडा लेकर नारे लगवा रही थीं, जब उनके बाएं हाथ में गोली लगी। फिर भी वह रुकी नहीं, बल्कि पुलिस स्टेशन की तरफ आगे बढ़ने लगीं। उन्हें बढ़ता देखकर पुलिस ने दो और गोलियां उन पर चलाई, जिनमें से एक उनके दूसरे हाथ में लगी और एक उनके सिर में। अपने आख़िरी पलों में भी देश की इस महान बेटी ने झंडे को गिरने नहीं दिया और उनकी जुबां पर दो ही शब्द थे, ‘वन्दे मातरम’।

बंगाल के हर हिस्से में लगी हैं प्रतिमाएं

आजादी के बाद मातंगिनी की याद में तामलुक में उनके शहीद स्थल पर उनकी प्रतिमा लगाई गई। वे पहली महिला सेनानी थीं, जिनकी प्रतिमा स्वतंत्र भारत में कोलकाता में लगाई गई। उनके नाम पर बहुत से स्कूल, कॉलोनी और मार्गों आदि का नामकरण भी हुआ है। फिर साल 2002 में भारत छोड़ो आंदोलन के 50 साल पूरे होने के अवसर भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट भी जारी की थी। बंगाल में आज भी इस देशभक्त अमर वीरांगना को नमन किया जाता है।

(एजेंसी)

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