
Madhupur (Deoghar) : सनातन संस्कृति और शिक्षा के उत्थान में अपना जीवन समर्पित करने वाले शहर के कालजयी विद्वान, पंडित विद्याधर मिश्र का जीवन और उनकी महासमाधि एक आध्यात्मिक प्रेरणा का विषय है।

वर्ष 1900 की शुरुआत में आरा से मधुपुर आए पंडित विद्याधर मिश्र न केवल एक प्रकांड पंडित थे, अपितु एक ऐसे गुरु थे जिन्होंने ज्ञान की ज्योत से अंचल को आलोकित किया।
पहले हुए पथरौल घटवाली स्टेट के राजपुरोहित,फिर की गुरुकुल की स्थापना

भोजपुर (आरा) जिले के मोहनपुर गाँव से मधुपुर आए पंडित विद्याधर मिश्र न केवल एक प्रकांड पंडित थे, अपितु एक ऐसे सच्चे गुरु थे जिन्होंने ज्ञान की दिव्य ज्योत से सम्पूर्ण अंचल को आलोकित किया।
उन्होंने पथरौल घटवाली स्टेट के राजपुरोहित के पद की गरिमा को बढ़ाया और वर्ष 1909-10 में मधुपुर की पावन धरा पर बड़ी ठाकुरबाड़ी राम मंदिर के समीप एक गुरुकुल की स्थापना की, जो आगे चलकर ज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिकता का प्रमुख केंद्र बना।
इस गुरुकुल में विद्यार्थी गुरु के सान्निध्य में रहकर न केवल संस्कृत, वेद, ज्योतिष और दर्शन की शिक्षा प्राप्त करते थे, बल्कि आत्मानुशासन, विनम्रता और मानवतावाद का पाठ भी सीखते थे। यह शिक्षा उन्हें एक प्रबुद्ध और संस्कारवान व्यक्तित्व प्रदान करती थी।इस पावन संस्था के संचालन में दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह का आर्थिक सहयोग और गुटगुटिया परिवार का भोजन की व्यवस्था करना अविस्मरणीय रहा।
बाद के दिनों में रामजस राय गुटगुटिया के पुत्रों ने रामयश राय संस्कृत विद्यालय की स्थापना की। जिसमें पंडित विद्याधर मिश्र आजीवन प्रधानाध्यापक रहे। उनके शिष्य हृदय नारायण त्रिवेदी, शंभू नाथ पांडेय, श्रीकांत झा, संतु पांडेय समय दर्जनों शिष्य विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों में उच्च मुकाम पर रहे।
पंडित विद्याधर मिश्र की विद्वता की ख्याति इतनी व्यापक थी कि काशी के नामी विद्वान भी उनसे शास्त्रार्थ करने के लिए मधुपुर पहुँचते थे।
वे एक कुशल शिक्षाविद् होने के साथ-साथ एक समर्पित समाजसेवी भी थे और एडवर्ड जॉर्ज हाई स्कूल जो अब श्याम प्रसाद मुखर्जी के नाम से जाना जाता है के प्रबंधन समिति के अध्यक्ष के रूप में भी उन्होंने विद्यालय की प्रगति के लिए वर्षों तक महत्वपूर्ण योगदान दिया। पंडित विद्याधर मिश्र की धर्मपत्नी का नाम राजवंशी देवी था।
महासमाधि का हो गया था पूर्वाभास
उनके जीवन का अंतिम अध्याय भी उनकी विलक्षणता को दर्शाता है।जानकर बताते है कि 13 जुलाई, 1967 को उन्हें अपनी महासमाधि का पूर्वाभास हो गया था। उन्होंने स्वयं मुंडन कराया, नाखून कटाए, स्नान-ध्यान कर नए वस्त्र धारण किए और शांतिपूर्वक शरीर त्याग दिया।
जानकारों के अनुसार, ब्रह्मांड (सिर का ऊपरी भाग) खुलने से ऐसी महासमाधि बिरले ही साधकों को प्राप्त होती है। संथाल परगना गजेटियर के लेखक जोसेफ मौली ने भी अपने ग्रंथ में उनके योगदान का उल्लेख किया है।
पंडित विद्याधर मिश्र ने अपना सारा जीवन धर्म, शिक्षा और समाज की सेवा में अर्पित कर दिया।
वे आज भी उन असंख्य शिष्यों और लोगों के हृदय में निवास करते हैं जिन्होंने उनके ज्ञान और आध्यात्मिकता का सान्निध्य पाया। उनका जीवन आज के युवाओं के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ के समान है।


