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झारखण्ड में औद्योगिक प्रगति और निवेश लाने की ओर सरकार के बढ़े कदम: दावे और जमीनी हकीक़त

फेडरेशन ऑफ झारखंड चैम्बर ने झारखण्ड के मुख्यमंत्री को सलाह दी है कि मुख्यमंत्री जी अगर सच में झारखण्ड में औद्योगिक निवेश और औद्योगिक विकास चाहते हैं तो जमीनी हकीकत को देखें और अधिकारियों को जवाबदेह बनाएं।

देवघर: फेडरेशन ऑफ झारखंड चैम्बर ने झारखण्ड के मुख्यमंत्री को सलाह दी है कि मुख्यमंत्री जी अगर सच में झारखण्ड में औद्योगिक निवेश और औद्योगिक विकास चाहते हैं तो जमीनी हकीकत को देखें और अधिकारियों को जवाबदेह बनाएं। मंगलवार को फेडरेशन ऑफ झारखंड चैम्बर ने प्रेसवार्ता कर ये बातें कही है।

चैम्बर ने कहा कि मुख्यमंत्री जी की औद्योगिक विकास और निवेशीकरण में रूझान देखकर चैम्बर काफी खुश है। झारखण्ड में इसकी अपार संभावनाओं के मद्देनजर मुख्यमंत्री के रूझान से एक आस जगी है।

लेकिन क्या सचमुच झारखण्ड सरकार इसके लिए गंभीर है?चैम्बर ने कहा कि जिस सोच के साथ राज्य का उद्योग विभाग कार्य कर रही है, उससे तो औद्योगिक प्रगति कतई संभव नहीं दिखता। इसके लिए उद्योग विभाग के वरीय अधिकारियों को अपनी सोच बदलनी होगी और जमीनी हकीकत के अनुसार कार्य करने होंगे। पांच साल पहले सबने मोमेंटम झारखण्ड की विफलता देखी है। सरकार को इस विफलता के पीछे के कारणों पर समीक्षा करना चाहिए। सरकार को यह समझना पड़ेगा कि आखिर राज्य में निवेश क्यों नहीं बढ़ रहा। 

झारखण्ड में वर्तमान औद्योगिक स्थिति और दिल्ली में हुए इंवेस्टमेंट समिट पर चैम्बर बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं है। राज्य में निवेश तभी बढ़ेगा, जब धरातल पर स्थिति ठीक होगी। यहां तो यह हाल है कि जमीन, पॉल्यूशन एनओसी, सुचारू बिजली से लेकर अन्य आधारभूत संरचनाएं भी उद्योगों को नहीं मिल रही। 

संताल की बात करें तो एक भी औद्योगिक क्षेत्र में आधारभूत संरचनाओं का विकास नहीं किया गया। जसीडीह औद्योगिक क्षेत्र में आधे-अधूरे सड़क का काम किया गया लेकिन वहां सिवरेज (नाली) नहीं बनाये गये। 2 वर्षों से स्ट्रीट लाइट लगे हुए हैं, लेकिन उसमें विद्युत प्रवाह जियाडा ने नहीं किया।

कहां लगेंगे उद्योग

चैम्बर के क्षेत्रीय उपाध्यक्ष आलोक कुमार मल्लिक ने प्रेसवार्ता में कहा कि उद्योग लगाने के लिए पहली प्राथमिकता जमीन होती है, लेकिन सरकार निवेशक सम्मेलन में जियाडा में जमीन तो दिखाती है, लेकिन हकीकत में उनमें से ज्यादातर जमीनों पर सरकार का कब्जा, डिमार्केशन, एप्रोच रोड भी नहीं है, आधारभूत संरचनाओं की तो बात ही नहीं है। 

क्या सरकार देवीपुर औद्योगिक क्षेत्र के उद्यमियों की तरह निवेशकों को बुलाकर उद्योग लगवाएगी या अपने कार्यालयों का चक्कर लगवाएगी? विदित हो कि बार-बार आवाज उठाने के बावजूद आज 2 वर्ष होने को आए परन्तु 81 प्लॉटों पर 72 उद्यमियों को दखल दिलाने में सरकार गंभीर नहीं हो रही और अपनी ही नीतियों से पीछे हो रही है।

झारखण्ड बने 21 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन जसीडीह औद्योगिक क्षेत्र की जमीन पर सरकार ने बिहार सरकार तथा बीएसएफसी के साथ समझौता कर अपना हक भी नहीं ले पाई है।
मुख्यमंत्री जी ने गोविन्दपुर-साहेबगंज उच्चपथ के किनारे उद्योग, वेयरहाउस, लॉजिस्टिक के लिए जमीन अधिग्रहण की बात तो की है, लेकिन धरातल पर इसके लिए एक कदम भी शायद ही बढ़ा है।

संताल में औद्योगिक निवेश के लिए जमीन की सबसे बड़ी बाधा एसपीटी एक्ट बनती है। इसलिए अगर सरकार सचमुच राज्य में औद्योगिक प्रगति चाहती है तो उद्योगों और खनन कार्यों के लिए विशेष प्रावधान के तहत एक्ट में आवश्यक संशोधन कर जमीन अधिग्रहण कर उद्योगों को देने के लिए रास्ता निकालना ही होगा।

उद्योग सचिव औद्योगिक क्षेत्रों और जिलों में शायद ही कभी करती दौरा

चैम्बर ने कहा कि उद्योगों के सामने विकट स्थिति है। राज्य के सभी क्षेत्रों में उद्योग रेंग रही है, सिंगल विण्डो सिस्टम निष्प्रभावी बन गई है, इज ऑफ डूईंग बिजनेस का कनसेप्ट फेल है, लेकिन उद्योग सचिव और उनके अधिकारियों को रांची से बाहर निकलकर जमीनी हकीकत और उद्यमियों की परेशानियों को देखने का फुर्सत नहीं है और न ही राज्य के उद्यमियों और चैम्बरों के साथ बैठक कर समस्याओं पर चर्चा और समाधान कराने का वक्त है।

यही हाल जियाडा के क्षेत्रीय निदेशकों का है, उन्हें न तो अपने क्षेत्रों में जरूरी फैसले लेने का अधिकार है और न ही काम करने का पर्याप्त छूट है। ऐसे में वे भी क्षेत्राधीन औद्योगिक क्षेत्रों की स्थिति देखने की कोशिश नहीं करते हैं। उद्यमियों के परेशानियों को हल करने की जगह मात्र डाकिया बन गए हैं। अतः सरकार को क्षेत्रीय निदेशकों को अपने यहां काम करने और निर्णय लेने की छूट देनी चाहिए।

यह कैसी उपेक्षा

इंवेस्टर्स समिट से सरकार इंवेस्टमेंट बढ़ाना चाहती है, जबकि जमीनी हकीकत कुछ और है। उद्योग विभाग दिल्ली में बैठक करती है जबकि अधिकतर राज्य के उद्यमी ही उद्योग और निवेश में रुचि रखते हैं। दिल्ली में भी बैठक हो, लेकिन अपने राज्य के स्टेक होल्डर्स और उद्यमियों की अनदेखी भी न हो। राज्य की औद्योगिक नीति की लॉन्चिंग दिल्ली में होती है, रांची में नहीं – आखिर अपने राज्य की ऐसी अनदेखी क्यों?

सरकार दिल्ली जाकर उद्यमियों को निवेश के लिए आमंत्रित करती है, लेकिन इफको जैसी बड़ी राष्ट्रीय स्तर की कम्पनी खुद आकर 450-500 करोड़ के निवेश के लिए एक वर्ष से देवघर में 10 एकड़ जमीन का आवेदन दे रखा है और लगातार फॉलोअप के बावजूद सरकार जमीन नहीं दे रही।

पूर्व से प्रस्तावित बड़ी योजनाओं पर सरकार ध्यान दे

चैम्बर का कहना है कि देवघर में 4000 मेगावाट का अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट प्रस्तावित है और इसे लम्बे समय से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। दुमका जिले में उरमापहाड़ी टोला कोल ब्लॉक जो झारखण्ड की सबसे बड़ी कोयला खदान होगी और इसका आवंटन हैदराबाद की कंपनी अरविन्दो रियलिटी इन्फ्रास्ट्रक्चर लि0 को मिला है। सरकार आगे बढ़कर उन्हें काम शुरू करने में मदद करे। ऐसी बड़ी योजनाओं से राज्य के औद्योगिकीकरण की रफ्तार जोर पकड़ेगी और रोजगार के बड़े श्रोत एवं अवसर पैदा होंगे।

झारखण्ड में मौजूद सस्ते मानव श्रम संसाधन एवं अनुकूल माहौल का हो सदुपयोग

संताल क्षेत्र में देश के अन्य भागों की तुलना में पर्याप्त सस्ते मानव श्रम उपलब्ध हैं, लेकिन अपने यहां के अदूरदर्शी नीतियों और औद्योगिकीकरण की कमियों के कारण इन्हें बाहर के राज्यों में पलायन करना पड़ रहा है। हमने कोरोना काल में देखा कि कितनी बड़ी संख्या में हमारे भाई-बन्धु बाहर के राज्यों में काम की खोज में पलायन किये हुए थे। क्या हमने इस महामारी काल में दिखे हालातों से कुछ सीखा। सरकार ने उस वक्त बड़ी और प्रभावी बातें की, लेकिन व्यवहारिकता में होना वही था, फिर से लोगों का पलायन शुरू हो गया। कहीं न कहीं सरकार को इसकी समीक्षा करनी होगी कि आखिर वे कहां विफल होते हैं? तभी हम झारखण्ड में उद्योग और निवेश की बातों से उत्साहित हो पाएंगे और धरातल पर औद्योगिक बहार दिख पाएगी।

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