Written By: अमर्त्य एम

मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी ने पत्रकारिता और पत्रकार की क्षमता और शक्ति को दो लाइन के शेर में परिभाषित किया था। उन्होंने साफ लिखा था कि “खींचों न कमानों को, न तलवार निकालो जब तोप हो मुकाबिल तब अखबार निकालो।” अकबर इलाहाबादी का यह ‘शेर’ केवल किताबों के पन्नों पर काली स्याही से लिखी हुई रचना मात्र बनकर रह गयी है। खासकर झारखंड के परिप्रेक्ष्य में यह और भी मौजूं है।

एक तरफ जहां झारखण्ड में अबतक 20 से अधिक पत्रकार कोरोना की वजह से काल के गाल में समा गए हैं, वहीं दूसरी तरफ कई ऐसे हैं जिनके परिवार में किसी न किसी सदस्य की मौत हो गयी हो। कुछ पत्रकारों के परिवार ऐसे दोराहे पर खड़े हैं जिन्हें आगे की डगर नहीं सूझ रही। बावजूद इनके झारखण्ड सरकार इन्हें फ्रंट लाइन वारियर नहीं मान रही है।
युवा पत्रकारों की गई है जान

पिछले एक महीने के आंकड़ों को पलटकर देखें तो झारखण्ड सरकार खुद मानती है कि कोविड संक्रमण की वजह से अबतक 4601 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। युवा पत्रकारों में दो ऐसे नाम हैं जो अब भी सबकी ज़ुबान पर हैं। एक आजतक में काम करने वाले मृत्युंजय श्रीवास्तव, दूसरा नाम हज़ारीबाग की पंखुड़ी सिंह का है। इसके अलावे कई ऐसे पत्रकार हैं जिनके परिवार के किसी न किसी सदस्य को कोरोना ने लील लिया है।
फील्ड में जाना नैतिक जिम्मेदारी
दरअसल, पत्रकारों के साथ सबसे बड़ी बात यह है कि उन्हें हर हाल में फील्ड में जाना ही पड़ता है। साथ ही अलग-अलग मीडिया हाउस में पत्रकार कोविड वार्ड से रिपोर्टिंग कर रहे हैं। ऐसे में संक्रमण में उनके चपेट में आने का पूरा खतरा बना रहता है। साथ ही संक्रमण की चेन उनके परिवार को भी प्रभावित कर सकती है।
झारखण्ड सरकार केंद्र पर फोड़ रही है ठीकरा
पत्रकारों को फ्रंट लाइन वारियर का दर्जा देने के मामले में राज्य सरकार का टाल-मटोल वाला रवैया आश्चर्यजनक है। बकौल राज्य सरकार इस बावत निर्णय केंद्र ले सकता है। हैरत की बात यह है कि कोरोना से मरने वाले पत्रकारों के परिवार के लिए भी राज्य सरकार ने अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया हैं।
आंदोलन कर रहे हैं झारखण्ड के पत्रकार
वहीं, सरकार के इस नकारात्मक रवैये को लेकर झारखण्ड में पत्रकार आंदोलन कर रहे हैं। अपने घर और अस्पताल में इलाज करा रहे पत्रकार भी इस आंदोलन में शामिल हैं। उनकी मांग है कि पत्रकारों को फ्रंट लाइन वारियर घोषित किया जाए।













