spot_img
spot_img

बैद्यनाथधाम में कांवर यात्रा का इतिहास, सावन माह में ही कांवर यात्रा क्यों?

Deoghar: झारखंड के संताल परगना प्रमंडल में बैद्यनाथधाम नाम से प्रसिद्ध तीर्थ है जिसे देवघर नगर के स्थान के रूप में ख्याति प्राप्त है। सावन के महिने में एक माह तक चलने वाला श्रावणी मेला भी विश्व विख्यात है।  इस एक महिने के दौरान परंपरागत तरीके से भक्त कांवर यात्रा के जरीये बिहार के सुलतानगंज स्थित उत्तर वाहिनी गंगा का जल भरकर 110 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करते हैं।

कांवर की प्रथा रामायण युग से ही

सदियों पुरानी इस परंपरा के बारे में कहा जाता है कि रामायण काल में श्रवण कुमार की कथा आती है जिसमें श्रवण कुमार ने अपने अंधे मां-बाप को कांवर में बिठा तृर्थाठन कराया था। जिस दौरान वह देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ मंदिर भी पहुंचे थे। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह कहा जा सकता है कि कांवर की प्रथा रामायण युग से ही प्रारंभ हुआ है। आंनद रामायण में राम के कांवर लेकर बैद्यनाथधाम और सुल्तानगंज की उत्तर वाहिनी गंगा में स्नान करने तक का वर्णन है। प्राचीन काल से ही शिव के विग्रह पर गंगा जल चढ़ाने की प्रथा कांवर के माध्यम से वर्तमान है। लोक प्रसिद्धी ही इसके प्रचलन का आधार है। आदि काल से धर्म और इतिहास की परंपरा में कुछ ऐसी बातें प्रचलित हैं, जिनका शास्त्रीय उल्लेख हमें कम प्रभावित करता है। और वे धार्मिक मान्यतायें जिन्हें लोक संस्कृति ने सहज ही आदिकाल से आध्यात्मिक उन्नती के लिए अपनाया है,कांवर की प्रथा उसी आध्यात्मिक सोच का मुर्त रूप है।

यही कारण है कि अतित के अनाम तिथी से ही सुल्तानगंज से बैद्यनाथधाम तक पैदल गंगा जल लाने की प्रथा प्रचलित है।

सावन माह में ही कांवर यात्रा क्यों?

सावन माह को शिव की स्तुती के लिए सर्वोत्तम माना गया है। इस माह में देश के सभी शिवालयों में भक्त शिव की अराधना के लिए पहुचते है। सावन माह के सोमवारी का भी विशेष महत्व है। सावन के सोमवार को भगवान शिव का दिन माना जाता है। देवघर का बैद्यनाथधाम देश का ऐसा शिवालय है जहा सावन के महीने में प्रतिदिन लाखों भक्त कांवर यात्रा करते हुए पहुंचते हैं।

बाबा बैद्यनाथधाम का संक्षिप्त इतिहास

धर्मिक साहित्यों में द्वादश ज्योर्तिलिंग के वर्णन के दौरान बैद्यनाथ ज्योर्तिलिंग की चर्चा मिलती है। मत्स्य पुराण और पद्यपुराण में बैद्यनाथ ज्योर्तिलिंग की चर्चा है। बैद्यनाथ ज्योर्तिलिंग की ऐतिहासिकता अत्यन्त ही प्राचीन है। इतिहासकार राजेन्द्र लाल मित्रा ने बैद्यनाथ ज्येर्तिलिंग को भुवनेश्वर के शिवलिंग का समकालीन माना है। 1260 ई0 के आस पास भुवनेश्वर के लिंग की स्थापना का काल माना जाता है। वैसे पालों के शासन में 11वीं शताब्दि के लगभग देवघर की समृद्धि का इतिहास मिलता है। मुगलकालीन शासन परम्परा में देवघर अपने स्वर्णयुग में पहुंच गया था, क्योकी चंदेल राजा महाराजा गिद्वौर के इष्टदेव के रूप में बैद्यनाथ की अराधना होने लगी थी। बैद्यनाथ मंदिर के वर्तमान लेख से यह ज्ञात होता है कि 1596 ई0 में राजा पूरण ने इस मंदिर का निर्माण कराया था।

Leave a Reply

Hot Topics

Related Articles

Don`t copy text!