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आजादी के दिवाने: स्वतंत्र भारत का सपना लिए “मास्टर दा” ने चूमा था फांसी का फंदा

देश के हर क्षेत्र में अनगिनत ऐसे शहीद हैं, जो नींव की ईंट की तरह आजादी की उस बुनियाद में हंसते-हंसते जमींदोज गए, जिसके सुनहरे कंगूरे लोकतंत्र के रूप में विश्व पटल पर चमक रहे हैं।

कोलकाता: देश में स्वतंत्रता दिवस की आहट होते ही आजादी के दीवानों के तराने फिजां में गूंजने लगे हैं। देश के हर क्षेत्र में अनगिनत ऐसे शहीद हैं, जो नींव की ईंट की तरह आजादी की उस बुनियाद में हंसते-हंसते जमींदोज गए, जिसके सुनहरे कंगूरे लोकतंत्र के रूप में विश्व पटल पर चमक रहे हैं। ऐसे ही एक फौलादी जिगर वाले आजादी के दीवाने की गाथा आज हम आपके सामने रख रहे हैं।

उनका नाम “मास्टर दा सूर्य सेन” है। उनके नाम के साथ “मास्टर” शब्द इसलिए जुड़ा है क्योंकि उन्होंने अनगिनत क्रांतिकारियों में राष्ट्रभक्ति के बीज बोए थे। प्यारे वतन के प्रति उनका समर्पण ऐसा था, कि अंग्रेजों ने उनके शरीर के हर हिस्से को तोड़ दिया, नाखून उखाड़ दिए पर स्वतंत्र भारत के उनके सपने और हौसले को कभी तोड़ नहीं सके। मरते-मरते उनके आखिरी शब्द थे, “मैं केवल एक चीज छोड़ कर जा रहा हूं। यह मेरा एक सुनहरा सपना। स्वतंत्र भारत का सपना।”

वह मास्टर दा सूर्य सेन ही थे, जिन्होंने पूरे देश की आजादी से पहले पश्चिम बंगाल के चटगांव प्रांत को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त करा लिया था और भारत के ध्वज को फहराया था। वैसे तो बंगाल में उन्हें लोग बड़े सम्मान से याद करते हैं, पर राष्ट्रीय पटल पर बहुत कम लोग उनके बारे में जानते हैं।

रिपब्लिकन आर्मी बनाकर चटगांव को कराया था अंग्रेजों से मुक्त

22 मार्च 1894 में चटगांव बांग्लादेश में जन्मे सूर्य सेन भारत ने इंडियन रिपब्लिकन आर्मी की स्थापना की और चटगांव विद्रोह का सफल नेतृत्व किया। आईआरए के गठन से पूरे बंगाल में क्रांति की ज्वाला भड़क उठी और 18 अप्रैल 1930 को सूर्यसेन के नेतृत्व में दर्जनों क्रांतिकारियों ने चटगांव के शस्त्रागार को लूटकर अंग्रेज शासन के खात्मे की घोषणा कर दी। क्रांति की ज्वाला के चलते हुकूमत के नुमाइंदे भाग गए और चटगांव में कुछ दिन के लिए अंग्रेजी शासन का अंत हो गया था। वे नेशनल हाईस्कूल में सीनियर ग्रेजुएट शिक्षक के रूप में कार्यरत थे और लोग प्यार से उन्हें “मास्टर दा” कहकर सम्बोधित करते थे। अंग्रेजों ने उन्हें 12 जनवरी 1934 को मेदिनीपुर जेल में फांसी दे दी थी। सूर्य सेन के पिता का नाम रमानिरंजन था। चटगांव के नोआपाड़ा इलाके के निवासी सूर्य सेन एक अध्यापक थे। साल 1916 में उनके एक अध्यापक ने उनको क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित किया, जब वह इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर रहे थे और वह अनुशीलन समूह से जुड़ गये। बाद में वह बहरामपुर कालेज में बीए की पढ़ाई करने गये और युगान्तर से परिचित हुए और उसके विचारों से काफी प्रभावित रहे।

चटगांव आंदोलन में पूरे देश में भड़काई थी क्रांति की ज्वाला

मास्टर दा के नेतृत्व में हुए चटगांव आंदोलन ने आग में घी का काम किया और बंगाल से बाहर देश के अन्य हिस्सों में भी स्वतंत्रता संग्राम उग्र हो उठा। इस घटना का असर कई महीनों तक रहा। पंजाब में हरिकिशन ने वहां के गवर्नर की हत्या की कोशिश की। दिसंबर 1930 में विनय बोस, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता ने कलकत्ता की राइटर्स बिल्डिंग में प्रवेश किया और स्वाधीनता सेनानियों पर जुल्म ढ़हाने वाले पुलिस अधीक्षक को मौत के घाट उतार दिया।

दो महिलाओं ने भी निभाई थी बड़ी भूमिका

आईआरए की इस जंग में दो लड़कियों प्रीतिलता वाडेदार और कल्पना दत्त ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। सत्ता डगमगाते देख अंग्रेज बर्बरता पर उतर आए। महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बख्शा गया। आईआरए के अधिकतर योद्धा गिरफ्तार कर लिए गए और तारकेश्वर दस्तीदार को फांसी पर लटका दिया गया। अंग्रेजों से घिरने पर प्रीतिलता ने जहर खाकर मातृभमि के लिए जान दे दी, जबकि कल्पना दत्त को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

जहां ली शरण उसी ने दिया था धोखा

सूर्य सेन इस विद्रोह के बाद छिपे रहे और एक स्थान से दूसरे स्थान पर चलते रहे। वे एक कार्यकर्ता, एक किसान, एक पुजारी, गृह कार्यकर्ता या धार्मिक मुसलमान के रूप में छिपे रहे। इस तरह उन्होंने ब्रिटिशों के गिरफ्त में आने से बचते रहे। एक बार उन्होंने नेत्र सेन नाम के एक आदमी के घर में शरण ली। लेकिन नेत्र सेन ने उनके साथ छल कर धन के लालच में ब्रिटिशों को उनकी जानकारी दे दी और पुलिस ने फरवरी 1933 में उन्हें पकड़ लिया। इससे पहले कि नेत्र सेन को अंग्रेजों ने पुरस्कृत किया हो, एक क्रांतिकारी उनके घर में आया और “डाह” (एक लंबी चाकू) के साथ उसका सिर काट डाला। नेत्र सेन की पत्नी सूर्य सेन की एक बड़ी समर्थक थी, इसलिए उन्होंने कभी भी उस क्रांतिकारी के नाम का खुलासा नहीं किया जिन्होंने नेत्र सेन की हत्या की थी।

फांसी से पहले तोड़ दिए गए थे दांत, उखाड़ दिए थे सभी नाखून

सेन को फांसी देने से पहले अमानवीय ब्रिटिश शासकों ने उन पर क्रूर अत्याचार किये। बर्बर ब्रिटिश जल्लादों ने हथौड़े से उनके सभी दांतों को तोड़ दिया और सभी नाखूनों को उखाड़ दिए थे। उनके शरीर के सभी जोड़ों को तोड़ दिया गया और उनके अचेतन शरीर को फांसी की रस्सी तक घसीटा गया था। 12 जनवरी 1934 को एक अन्य क्रांतिकारी तारकेश्वर दस्तीदार को भी सेन के साथ फांसी दी गई थी।

आखिरी पत्र में लिखा था आजादी की दीवानगी के बारे में

उन्होंने आखिरी पत्र अपने दोस्तों को लिखा था, “मौत मेरे दरवाजे पर दस्तक दे रही है। मेरा मन अनन्तकाल की ओर उड़ रहा है … ऐसे सुखद समय पर,ऐसे गंभीर क्षण में, मैं तुम सब के पास क्या छोड़ जाऊंगा? केवल मेरा एक ही सपना है, एक सुनहरा सपना- स्वतंत्र भारत का सपना…., कभी भी 18 अप्रैल 1930 चटगांव के विद्रोह के दिन को मत भूलना…, अपने दिल के देशभक्तों के नाम को स्वर्णिम अक्षरों में लिखना, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता की वेदी पर अपना जीवन बलिदान किया है।”

पश्चिम बंगाल सरकार ने इस महान क्रांतिकारी को सम्मान देने के लिए एक मेट्रो स्टेशन का नाम उनके नाम पर रखा है। इसके अलावा महानगर कोलकाता समेत राज्य के कई हिस्सों में मास्टर दा के नाम पर सड़क और अन्य संरचनाएं बनाई गई हैं। कोलकाता में उनकी एक प्रतिमा भी स्थापित है।

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