Written By: उमेश कुमार

शायद यह बताने की जरूरत नहीं है कि पूर्व रेलवे के मधुपुर जंक्शन का एक ऐतिहासिक महत्व रहा है। लोहे की पटरियों पर दौड़ती समय की रेलगाड़ियों ने कोयले से लेकर डीजल और बिजली तक का सफर पूरा किया है। इन रेलगाड़ियों ने बांग्ला नवजागरण के पुरोधाओं से लेकर गांधी, सुभाष और लोकनायक तक को मधुपुर की सुखद यात्राएं करवाई हैं। यहां के आर्थिक और सामाजिक विकास को एक नई रफ्तार सौंपी है।


इस क्रम में सन् 2019 में जब पूर्व रेलवे के बड़े अधिकारियों ने मधुपुर की रेलवे कॉलोनी में लाखों रुपये खर्च कर एक ‘विरासत भवन’ का उद्घाटन किया। तो इतिहासप्रेमियों को लगा कि यहां मधुपुर और आसपास की सांस्कृतिक-ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रेलवे के योगदान को आकर्षक ढंग से चित्रित किया जाएगा। नई पीढ़ी रेलवे को महज सफर के साथी के रूप में नहीं,विरासत के मीत के रूप में जान-समझ पाएगी। लेकिन,पूर्व रेलवे ने मधुपुर के टिकट घर के पास एक चित्र-वीथिका लगा कर मानो अपना फर्ज पूरा कर लिया। लेकिन,इस चित्र-वीथिका में मधुपुर के स्थानीय सांस्कृतिक वैभव में रेलवे के योगदान पर कितना कुछ है,यह तो देखने वाले ही बेहतर बता सकते हैं।।


इसलिए,जब यहां ‘विरासत भवन’ बना तो एक आस सी जगी थी।

आज 26 अगस्त,2021 को एकाएक रेलवे कालोनी का रुख किया तो पता चला कि ‘विरासत भवन’ को रेलवे के कुछ कर्मचारियों के रहने का ठिकाना बना दिया गया है। वे कर्मचारी भी वहां व्यवस्थाजन्य समस्याओं से पीड़ित दिखाई पड़े। मुझे रेलवे की परिसंपत्तियों के उपयोग पर कुछ कहने का हक नहीं है। बस यही अनुरोध कर सकता हूं कि यदि विरासत का कोई आंगन सिरजा जाता है तो उसकी मर्यादा (खासकर पहचान) का ख्याल रखा जाए तो वह अधिक प्रयोजनीय लगेगा …
लेखक झारखंड शोध संस्थान देवघर में सचिव हैं।


