

विपदाएं बेशक इंसान को लाचार बनाती हों, पर मौसम की कुदरती लय अनवरत रहती है। तभी तो हर बार की तरह देवघर में सावन हौले-हौले उतर ही गया! लेकिन, इस बार का सावन कुछ अजीब है। देवघर में एक अलग तरह की खामोशी है।

बाबा का दर आम भक्तों के लिए बंद जो है। ‘कोरोना’ नामक महामारी ने आस्था की डोर से चूती कामना की बूंदों का रास्ता छेक लिया है। इसलिए, साल भर वीरान रहने वाली और कांवर की रुनझुन सुनकर अपने भाग्य पर इतरा उठने वाली पगडंडियां आज सूनी पड़ी हैं। गंगा की मौजें सहमी हैं और केसरिया प्रवाह पर हुकूमत के पहरे हैं। नंगे पांव पथरीली तप्त धरती पर कोई सौ किलोमीटर का फासला तय कर अपनी आस्था का इम्तिहान देने वाले भक्तगण इसलिए भी ज्यादा मायूस हैं कि पिछली बार की निराशा को इस सावन में बिसराने की कोई सूरत उन्हें नजर नहीं आ रही है।

फकत चंद पंडे-पुजारियों की अर्चना से उन्हें कतई करार नहीं मिल रहा है। कवि ‘दिनकर’ ने शायद ऐसे ही किसी ‘सावन में’ अनायास कह दिया था-‘अपनी बात कहूं क्या! मेरी भाग्य -लीक प्रतिकूल हुई। हरियाली को देख आज फिर हरे हुए दिल के फोले सुंदरि! ज्ञात किसे,अंतर का उच्छल-सिंधु विशाल बंधा? कौन जानता तड़प रहे। किस भांति प्राण मेरे भोले!
‘बहरहाल, देवघर में सावन के मौजूदा रुदन का एक जबरदस्त आर्थिक पक्ष भी है। इसे व्यवस्था की नाकामी कहें कि आजतक देवघर में वैसा कोई उद्योग-धंधा सिरजा ही नहीं गया जो बड़े पैमाने पर रोजगार की विकराल समस्या का समाधान कर सकता हो। ऐसी परिस्थिति में एक विशिष्ट मिथकीय मनश्चेतना ने आस्था के तिलस्म में आर्थिक सरोकारों को बड़ी बारीकी से बुन दिया। नतीजतन स्थानीय स्तर पर कुछ चुनिंदा चीजों और सेवाओं का शानदार कारोबार खड़ा हो गया।
हर सावन की आमद इस कारोबार के लिए संजीवनी साबित होती रही और तदनंतर एक विलक्षण प्रकार के अर्थशास्त्र के पन्ने भी फड़फड़ाते रहे। लिहाजा,इस बार की मायूसी में धार्मिक आस्था के साथ आर्थिक क्षति की संभावना से उपजी निराशा की खदबदाहट भी तैर रही है।
लेकिन,’कोरोना’ का वर्तमान परिदृश्य भगवान को किसी खास नदी,रास्ते या फिर चुनिंदा देवालयों में ही बसा मानने की सदियों पुरानी मानसिकता पर पुनर्विचार का संदेश भी दे रहा है। शिव तो घट-घट के वासी हैं। यदि कंकर-कंकर शिव है तो वे सर्वव्यापी हैं। जो किसी खास जगह और खास तरह के दस्तूरों में ही मिलें,वह कोई ईश्वर या शिव नहीं हो सकते। उन्हें तो औपचारिकताओं, बंधनों और वर्जनाओं से इतर मन की आंखों से महसूसने की जरूरत है।
‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ का दर्शन.. इसी शोर-गुल,आपाधापी,भाग-दौड़ और कर्मकांडी आंडबरों का एक सूक्ष्म विकल्प देता है। हालांकि खुद गांधी सेतुबंध रामेश्वर, जगन्नाथपुरी और हरिद्वार जैसे तीर्थस्थानों की दुरूह यात्राओं को एक देश,एक राष्ट्र के नजरिए से जरूरी मानते थे,लेकिन ‘कोरोना’ का हालिया संदर्भ हमें कुछ पल ठहरने का संकेत दे रहा है। लेकिन,इस संकेत के परे जाकर भी इबादत की कोई हंगामेदार शैली बेशक हो सकती है,पर यकीन मानिए उसमें तिजारती चीजों का आग्रह हमेशा ज्यादा होगा।
इसलिए,आस्था का सवाल पेट के प्रश्न से अलग होना चाहिए। पेट का सवाल देवघर क्या सकल देश का बुनियादी सवाल है, इसलिए इसे सावन की अतुल्य नैसर्गिकता से जोड़ना बेमानी है।
(लेखक झारखण्ड शोध संस्थान देवघर के सचिव हैं।)


