
Ranchi: आईएएस अधिकारी मंजूनाथ भजंत्री एक बार फिर से चर्चा में हैं। उन्हें 30 सितंबर को झारखंड सरकार की तरफ से रांची का डीसी बनाया गया था। जिसके बाद एक अक्टूबर को मंजूनाथ ने पद भार ग्रहण किया। लेकिन अब एक बार फिर से सरकार और चुनाव आयोग मंजूनाथ भजंत्री को लेकर आमने-सामने है।

चुनाव आयोग ने मंजूनाथ भजंत्री को डीसी बनाए जाने पर नाराजगी जतायी है। आयोग की तरफ से सरकार को एक चिट्ठी लिखी गयी है। चिट्ठी मुख्य सचिव को लिखी गयी है। जिसमें साफ तौर पर आयोग मंजूनाथ को रांची का डीसी बनाए जाने का विरोध कर रहा है। आयोग का कहना है कि ऐसा होना हाईकोर्ट के आदेश का उल्लंघन है।

चिट्ठी में क्या लिखा है आयोग ने
चुनाव आयोग ने मंजूनाथ भजंत्री को रांची डीसी सह जिला निर्वाचन पदाधिकारी के पद पर पदस्थापित करने के आदेश के हाईकोर्ट के फैसले का उल्लंघन बताया है। आयोग ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर 6 दिसंबर 2021 के आदेश का अनुपालन करने को कहा है। साथ ही 15 दिनों में कार्रवाई रिपोर्ट आयोग को भेजने का आदेश दिया। आयोग ने 6 दिसंबर 2021 को आदेश जारी कर देवघर के तत्कालीन डीसी मंजूनाथ भजंत्री को पद से हटाने, विभागीय कार्यवाही करने और आयोग की अनुमति के बिना चुनाव कार्य से जुड़े पद पर पदस्थापित नहीं करने का आदेश दिया था।
क्या था पूरा मामला
चुनाव आयोग की तरफ से देवघर जिले के मधुपुर विधानसभा उपचुनाव में तत्कालीन देवघर डीसी द्वारा आयोग के वोटर टर्न आउट अप और प्रेस कॉन्फ्रेंस में अलग-अलग आंकड़ा पेश किए जाने की वजह से उन्हें 26 अप्रैल 2021 को उपायुक्त के पद से हटा दिया गया था। चुनाव आचार संहिता समाप्त होने के बाद सरकार ने उन्हें फिर से देवघर डीसी के पद पर स्थापित करने का आदेश दिया था। इसके करीब 6 महीने बाद मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने आयोग को रिपोर्ट भेजकर यह जानकारी दी कि डीसी ने चुनाव आचार संहिता खत्म होने के बाद आचार संहिता उल्लंघन के आरोप में सांसद निशिकांत दुबे के खिलाफ प्राथमिक दर्ज की है। आयोग ने इस पर उपायुक्त से स्पष्टीकरण पूछा। जवाब संतोषप्रद नहीं होने की वजह से 6 दिसंबर 2021 को आयोग ने उपयुक्त को हटाने और भविष्य में आयोग की अनुमति के बिना चुनाव से जुड़े काम में पदस्थापित नहीं करने का आदेश दिया। 23 दिसंबर 2021 को कार्मिक विभाग की ओर से आयोग के एक पत्र लिखकर कहा गया कि आयोग अपना आदेश वापस ले क्योंकि आचार संहिता समाप्त होने के बाद इस तरह का आदेश देने का अधिकार आयोग को नहीं है। इस तरह के आदेश से राज्य की संप्रभुता प्रभावित होती है।


