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Jharkhand: बजट की तुलना में खजाने की नहीं बढ़ी कमाई, सरकारें कर्ज लेकर करती रहीं भरपाई

वर्ष 2000 में देश के नक्शे पर एक साथ तीन नये राज्यों झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ का उदय हुआ था। उस वक्त उम्मीद बंधी थी कि झारखंड की अर्थव्यवस्था और तरक्की की रफ्तार उत्तराखंड-छत्तीसगढ़ की तुलना में ज्यादा तेज होगी।

शंभु नाथ चौधरी

Ranchi: वर्ष 2000 में देश के नक्शे पर एक साथ तीन नये राज्यों झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ का उदय हुआ था। उस वक्त उम्मीद बंधी थी कि झारखंड की अर्थव्यवस्था और तरक्की की रफ्तार उत्तराखंड-छत्तीसगढ़ की तुलना में ज्यादा तेज होगी।

इस उम्मीद के पीछे ठोस आधार भी था। देश की कुल खनिज संपदा का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा झारखंड में है। वन संपदा, कृषि योग्य भूमि, जलवायु और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विविधता के साथ ऐसे तमाम कारक यहां मौजूद हैं, जो किसी प्रदेश की आर्थिक समृद्धि के लिए जरूरी माने जाते हैं। लेकिन यह विडंबना ही है कि झारखंड देश के उन पांच सबसे पिछड़े राज्यों में है, जहां प्रति व्यक्ति आय सबसे कम है। भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के आंकड़े बोलते हैं कि झारखंड की तुलना में छत्तीसगढ़ में प्रति व्यक्ति आय लगभग 20 प्रतिशत और उत्तराखंड में 110 प्रतिशत ज्यादा है।

साल दर साल कर्ज का बढ़ता बोझ

राज्य पर साल दर साल कर्ज का बढ़ता बोझ भी इसकी खराब आर्थिक सेहत की गवाही देता है। आज की तारीख में झारखंड के ऊपर एक लाख करोड़ से भी ज्यादा का कर्ज है यानी राज्य का हर व्यक्ति 26 हजार रुपये से भी अधिक का कर्जदार है। राजकोषीय घाटे की बढ़ती हुई खाई सरकार को हर साल ज्यादा कर्ज लेने पर मजबूर कर रही है।

हालांकि राज्य के वित्त मंत्री डॉ. रामेश्वर उरांव राज्य पर बढ़ते आर्थिक बोझ के लिए सीधे-सीधे केंद्र सरकार पर जिम्मेदारी मढ़ते हैं। उनका कहना है कि केंद्र सरकार अगर सिर्फ हमारे राज्य के संसाधनों के दोहन के बदले क्षतिपूर्ति की राशि ही दे दे तो राज्य आर्थिक तौर पर मजबूत स्थिति में आ जायेगा। झारखंड की 53 हजार एकड़ भूमि कोल मंत्रालय को दी गई, जबकि इसकी क्षतिपूर्ति नहीं मिली। 65 हजार करोड़ से अधिक की राशि भारत सरकार के पास बकाया है।

स्टैस्टिटिकल प्रोफाइल रिपोर्ट

झारखंड सरकार ने बीती 25 फरवरी को राज्य की स्टैस्टिटिकल प्रोफाइल रिपोर्ट जारी की है। इससे झारखंड की मौजूदा आर्थिक स्थिति का साफ-साफ अंदाजा हो जाता है। इस रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2020-21 में राज्य का अनुमानित सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) माइनस 1.27 है, जबकि वित्त वर्ष 2019-20 में यह 5.6 प्रतिशत और 2018-20 में 13.30 था।

झारखंड की बजटीय स्थिति पर नजर डालें तो राज्य में बजट का आकार हर साल बढ़ता गया है, लेकिन उसकी तुलना में राजस्व के स्रोत नहीं विकसित किये गये। वर्ष 2001-02 के लिए झारखंड में पहली बार जब बजट पास किया गया था, तो उसका आकार 4800.12 करोड़ था। पहले बजट में सरकार की तरफ से 70 करोड़ से अधिक का मुनाफा दिखाया गया था।

इसके बाद से प्रत्येक बजट का आकार बढ़ता गया। वित्तीय वर्ष 2020-21 में राज्य ने 73,854 करोड़ व्यय किया था, जबकि चालू वित्तीय वर्ष यानी 2021-22 का बजट 91,277 करोड़ रुपये का था। चालू वित्तीय वर्ष के इस बजट अनुमान के विरुद्ध धरातल पर खर्च की बात करें तो योजना विकास विभाग की समीक्षा में यह बात सामने आई कि जनवरी 2022 तक विकास योजनाओं पर निर्धारित बजट की तुलना में मात्र 40.43 प्रतिशत की राशि खर्च की जा सकी थी।

बजट अनुमान की तुलना में राजस्व यानी कमाई के स्रोतों में कमी राज्य की अर्थव्यवस्था से जुड़ी एक बड़ी समस्या है। आंकड़े बताते हैं कि, गुजरे पांच वित्तीय वर्षो के दौरान केंद्र सरकार द्वारा वसूले जाने वाले टैक्स में झारखंड का हिस्सा आठ प्रतिशत घट गया है।

वर्ष 2016-17 में राज्य के बजट में केंद्रीय करों का प्रतिशत 32 था। 2019-20 में यह घट कर 29 प्रतिशत और 2021-22 में 24 प्रतिशत हो गया। खजाने का घाटा पाटने के लिए कर्ज लेना सरकारों को सबसे आसान रास्ता लगता रहा है। पिछले दो दशकों के दौरान वर्ष 2015-16 में सबसे बड़ा कर्ज राज्य सरकार ने 5553.4 करोड़ के पावर बांड के जरिए लिया था।

कौशल की कमी झारखंड में अर्थव्यवस्था खराब होने की एक बड़ी वजह

चर्चित अर्थशास्त्री और विनोबा भावे विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो.(डॉ.) रमेश शरण ने कहा कि वित्तीय प्रबंधन और कौशल की कमी झारखंड में अर्थव्यवस्था खराब होने की एक बड़ी वजह रही है। कर्ज लेकर आधारभूत संरचनाओं को मजबूत बनाने और तरक्की को रफ्तार देने का विचार कतई बुरा नहीं होता, लेकिन झारखंड में अब तक की सरकारों ने कर्ज की राशि का समुचित उपयोग नहीं किया। कर्ज लेकर राज्य में जो संरचनाएं खड़ी की गईं, उनकी उपयोगिता पर ध्यान नहीं दिया गया।

उन्होंने कहा, “राज्य में डेड एसेट्स खड़े करने पर पैसे फूंके गये। ज्यादा दर पर कर्ज लेकर ऐसी योजनाओं पर खर्च किया जाता रहा, जिनका कोई हल नहीं निकला। किसी ने यह नहीं सोचा कि सिर्फ बिल्डिंग्स खड़ी करने से अर्थव्यवस्था को रफ्तार नहीं मिलती, बल्कि इसके लिए उन्हें आर्थिक तौर पर उपयोगी संरचना के रूप में विकसित करना पड़ता है। डॉ. शरण के मुताबिक खनिज आधारित उद्योगों के विकास, एमएसएमई सेक्टर यानी छोटे और मंझोले दर्जे की औद्योगिक इकाइयों की स्थापना, कृषि एवं वनोपज आधारित प्रसंस्करण यूनिट्स लगाने के साथ-साथ पर्यटन के क्षेत्र में ठोस योजना और मजबूत इच्छाशक्ति के साथ काम हो तो झारखंड मजबूत अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित हो सकता है।”(IANS)

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