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डायन-बिसाही कुप्रथा की मौजूदगी: एक सामाजिक अभिशाप

यह वही छुटनी महतो हैं. जिन्हे गांव के लोगों ने डायन बताकर प्रताडित किया था. मैला पान कराया था. गांव से निकाल बाहर किया था. उनके डायन कुप्रथा के विरूद्ध लडाई लडने तथा इस कुप्रथा की शिकार महिलाओं को संरक्षण एवं उन्हे न्याय दिलाने के लिए सतत संघर्ष करने हेतु पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया है।

By प्रो.(डा.) नागेश्वर शर्मा

21 अक्टूबर 2021 से ही छुटनी महतों समाचार की सुर्खियों मे हैं। 9 नवम्बर 2021 को छुटनी महतों को एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में माननीय राष्ट्रपति ने पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित किये हैं। अब वे पद्मश्री छुटनी हो गयी हैं। बीबीसी,लंदन से साक्षातकार में वे अपना संक्षिप्त परिचय इस प्रकार देती हैं। मैं एक डायन हूं। मेरा नाम छुटनी महतो है। सरायकेला खरसावां जिले के गम्हरिया प्रखंड में बिरबांस पंचायत के भोलाडीह गांव की रहने वाली हूं।

यह वही छुटनी महतो हैं. जिन्हे गांव के लोगों ने डायन बताकर प्रताडित किया था. मैला पान कराया था. गांव से निकाल बाहर किया था. उनके डायन कुप्रथा के विरूद्ध लडाई लडने तथा इस कुप्रथा की शिकार महिलाओं को संरक्षण एवं उन्हे न्याय दिलाने के लिए सतत संघर्ष करने हेतु पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया है।

प्रथा और कुप्रथा में अन्तर:

समाज से मान्यता प्राप्त,पीढी दर पीढी हस्तान्तरित होने वाली सुव्यवस्थित ,दृढ़ जन रीतियां ही प्रथाएं कहलाती हैं। प्रथा वास्तव में सामाजिक क्रिया करने की स्थापित और मान्य विधि है। उन रीति रिवाजों एवं परम्पराओं को कुप्रथा कहते हैं जिनके परिचालन एवं अनुपालन से समाज के एक वर्ग या हिस्से को प्रताडित होना पड़ता हो. सामाजिक वहिष्कार बिना किसी अपराध के भुगतना पड़ता हो. अपमान की जिन्दगी जीना पड़ता हो और ऐसे रिवाज जो अन्धविश्वास और अज्ञानता पर आधारित हों, उन्हें कुप्रथा कहते हैं.

जैसे- महिला को डायन-बिसाही बताकर प्रताडित करना। दहेज का लेन- देन,बाल विवाह, भ्रूण हत्या,सती होने की क्रिया,बाल श्रम,छुआछूत की भावना से जुडी दुर्भावनाएं आदि कुप्रथा की श्रेणी में आते हैं।

झारखंड में डायन बिसाही की समस्या:

झारखंड के विषय मे एक कहावत है और सत्य है. कोख में अमीरी और गोद में गरीबी। ताजा रिपोर्ट के अनुसार आज भी झारखंड मे 55% लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने को मजबूर हैं। यह आदिवासी बहुल प्रदेश है। कुपोषण और एनिमिया,खासकर बच्चों और महिलाओं में एक गंभीर सम्सया है जिसका सीधा संबंध गरीबी से है।

निरक्षरता भी एक समस्या है। अनपढ़ लोग ही अंधविश्वास की जाल में ज्यादा आसानी से फंसते हैं। यों तो भारत के ग्रामीण इलाकों में डायन-बिसाही एक समस्या है. लेकिन झारखंड में यह समस्या गंभीरतम रूप में हैं। पिछले पांच साल में झारखंड में डायन -बिसाही के नाम पर 215 महिलाओं की हत्या हुई है।

वर्ष 2019 में रोजाना करीब तीन मामले दर्ज किए गए।वर्ष 2015- 20 के दौरान डायन -बिसाही से जुड़े आंकड़े की बात करें तो 4556 मामले दर्ज किए गये । इसमें हत्या से संबंधित 272 मामले दर्ज हैं जिसमें 215 महिलाओं की हत्या हुई ।

गृह विभाग की ओर से जारी रिपोर्ट के अनुसार डायन प्रथा प्रतिशेध अधिनियम के तहत वर्ष में 818 मामले दर्ज किए गए। वहीं वर्ष 2016 में 688 , 2017 में 668 ,वर्ष 2018 में 567, 2019 में 978 और 2020 में 837 मामले दर्ज किए गए। झारखंड में डायन-बिसाही की स्थिति भयावह है। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार झारखंड में रोजाना डायन -बिसाही के दो मामले होते हैं। एक सप्ताह में दस से ज्यादा। साल में 50 से अधिक जानें डायन-बिसाही की वजह से जाती हैं।

डायन- बिसाही कुप्रथा उन्मूलन को लेकर लम्बे समय से कार्यक्रम चला रही गैर सरकारी संस्था आशा का दावा है कि वर्ष 1992 से लेकर अब तक 1800 महिलाओं को सिर्फ डायन,जादू-टोना, चुडैल होने और ओझा- गुनी के इशारे पर मारा गया है। गैर-सरकारी संस्था आशा द्वारा संम्पादित सर्वे के अनुसार वर्ष 1991-2000 तक 522हत्याएं हुए ,जिसमें से 186 मामले दर्ज ही नही हुए । 2001- 2012के बीच 604 हत्याएं हुईं।

एसोसियेसन फाॅर एडवोकेसी एण्ड लीगल इनिशियेटिव के अनुसार इस कुप्रथा का शिकार होने वाली महिलाओं में 35% आदिवासी और 34% दलित हैं। इस वर्ष(2021) में झारखंड में हंटरगंज प्रखंड के गेंजना गांव में रहने वाली 80 वर्षीय मुसिया देवी को उनके परिवार के सदस्यों ने डायन – बिसाही बता कर मार पीट कर घायल कर दिया। पश्चिमी सिंहभूम के मनोहरपुर क्षेत्र में इस कुप्रथा के खिलाफ काम कर रही अंधविश्वास उन्मूलन मिशन नामक संस्था के संस्थापक सदस्य प्रेमचंद के अनुसार राज्य में हर साल अंधविश्वास की वजह से 50 लोगों को जान गंवानी पड़ती है।

उन्होनें यह भी बताया कि कोविड-19 के काल में इसमें कमी आई है।वर्ष 2020 से जुलाई 2021 तक कोल्हान में ऐसे नौ मामले ही सामने आए हैं, जिनमें पांच लोगों को जान गंवानी पड़ी है। उपर्युक्त वर्णित तथ्य एवं आंकडें इस बात की पुष्टी करते हैं कि झारखंड में आज भी डायन-बिसाही की समस्या एक गंभीर एवं चिन्तनीय समस्या है, साथ ही हमारे पिछडेपन का सूचक है। डायन-बिसाही का कारण यह एक अंधविश्वास आधारित एक सामाजिक समस्या है।

इसके मूल में कई कारण हैं:

इस कुप्रथा का सबसे महत्वपूर्ण कारण अशिक्षा है। अशिक्षा अज्ञानता की जननी है।शिक्षा और ज्ञान केअभाव में भोले-भाले ग्रामीण लोग अंधविश्वास की चपेट में आसानी से आ जाते हैं। फिर डायन- बिसाही जैसी अंधविश्वास जनित कुप्रथा का धृणित खेल शुरू हो जाता है।

गरीबी: गरीबी और जहालत की जिन्दगी लोगों के लिए आर्थिक ही नही बल्कि सामाजिक अभिशाप होता है। गरीबी की वजह से वे अस्पताल में ईलाज कराने नही जा पाते हैं। फिर वे जादू टोना और मंत्र-जाप का सहारा लेते हैं ,जहां उन्हें डायन -बिसाही की करतूत बता कर ठगते ही नही बल्कि आपसी द्वेष पैदा करते हैं।

ओझा- गुणी, ढोंगी मंतरया, धाम लगाने वाले लोगों का गांव में फैला नेटवर्क भी एक कारण है। ऐसे लोग डायन-बिसाही की करतूत बताकर कमाई तो करते ही हैं, गांव की औरतों पर अत्याचार भी करवाते हैं। हत्याएं भी करवाते हैं। एक कारण लोभ लालच भी है।यदि महिला बिधवा है और उसके पुत्र नही हैं या छोटे हैं. तो उनकी जमीन जायदाद हड़पने के ख्याल से उन पर डायन बिसाही होने का आरोप लगाया जाता है।

मेरी राय में सबसे अहम् कारण अशिक्षा और अंधविश्वास है। मेरा अपना अनुभव है। जब बच्चे थे ।शिक्षा का अभाव था । तब डायन ,भूत-प्रेत की खूब चर्चा होती थी। सर्प दंश में भगवती थान का नीर पिलाया जाता था । लेकिन शिक्षा के प्रचार प्रसार ने इन गलत धारणाओं को समूल नष्ट कर दिया है। अब चर्चा तक नही होती है।

कुप्रथा पर प्रतिबंध के सरकारी प्रयास:

झारखंड सरकार इस कुप्रथा पर अंकुश लगाने के लिए सतत प्रयत्नशील है। इस पर अंकुश लगाने के लिए डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम 2001 क्रियाशील है। इसी अधिनियम के तहत डायन -बिसाही के मामले दर्ज किए जाते हैं।इस अधिनियम के लागू होने के बाद ही राज्य में इस कुप्रथा के खिलाफ प्रचार -प्रसार किया जा रहा है। प्रचार – प्रसार एवं जागरूकता अभियान पर खर्च की राशि बढ़ा कर दोगुनी कर दी गई है। पहले यह राशि 1करोड़20लाख थी। मुहल्लों , गावों, और पंचायतों में नुक्कड़ नाटक के माध्यम से सरकार निरंतर जागरूकता अभियान चला रही है। सरकारी प्रयासों के अलावे गैर-सरकारी स्वंय सेवी संगठन भी इस कुप्रथा के खिलाफ अभियान चला रही है।

पश्चिमी सिंहभंम मेंमुंडा-मानकी और पंचायत प्रतिनिधि ने इस कुप्रथा के खिलाफ जंग का ऐलान कर चुके हैं। राज्य में कार्यरत अंधविश्वास उन्मूलन मिशन नामक संस्था इस दिशा में कार्य कर रही है।अब इस प्रथा के खिलाफ आदिवासी सेंगल अभियान के कार्यकर्ता ने मुहीम छेड़ दी है।

24दिसम्बर 2021 को देवघर सीजेएम कोर्ट की एक रिपोर्ट इस वर्ष दर्ज मुकदमें से संबंधित थी। रिपोर्ट के अनुसार इस वर्ष डायन-बिसाही से जुड़े कुल 91 मामले दर्ज हुए। ये आंकड़े निसन्देह हमारे पिछड़ेपन की निशानी है।गांव,जिसे भारत की आत्मा कही जाती है,में अशिक्षा के आभाव को बयां करती है। इस कुप्रथा की समाप्ति के लिए कठोर कानून के साथ साथ शिक्षा की विस्तृत व्यवस्था आवश्यक है। यह आलेख प्द्मविभूषित छुटनी महतों को समर्पित।

(लेखक प्रो.(डा.) नागेश्वर शर्मा, भारतीय आर्थिक परिषद के संयुक्त सचिव हैं)

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