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‘दिनकर’ के गांव में बच्चे ही नहीं दीवारें भी कविता सुनाती हैं, दो हजार से अधिक ग्रामीणों की जुबान पर विराजमान हैं ‘दिनकर’

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' के पैतृक गांव बिहार के बेगूसराय जिला स्थित सिमरिया की दीवारें भी कविता बोलती हैं।

बेगूसराय: ‘उर्वशी’ की पीड़ा से लेकर ‘हुंकार’ भरते हुए ‘कुरुक्षेत्र’ की गाथा के बाद ‘हारे को हरिनाम’ देने वाले संस्कृति और सामाजिक चेतना के राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ आज जिंदा होते तो 23 सितम्बर को एक बार फिर अपना जन्मदिन मनाते। इस काल्पनिक तथ्य के विपरीत सच्चाई यह है कि जो इस संसार में आया है, उसे जाना ही पड़ता है। जाने वालों की इसी कड़ी में अपने ही ग्रंथ में ‘उर्वशी’ को ”अपने समय का सूर्य हूं मैं” कहने वाले हिंदी साहित्य के सूर्य रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने साहित्य चेतना का जो बीज बोया है, वह सदियों तक उन्हें श्रद्धापूर्वक याद करती रहेगी।

दिनकर जी को जो प्यार यहां दिया जा रहा है, वह प्यार देश के शायद ही किसी अन्य कवि को मिला होगा। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के पैतृक गांव बिहार के बेगूसराय जिला स्थित सिमरिया की दीवारें भी कविता बोलती हैं। बच्चे-बच्चे को याद है ”कलम आज उनकी जय बोल” और ”सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।”

सिमरिया के दो हजार से अधिक लोगों की जुबान पर साक्षात दिनकर विराजमान हैं। यहां के बच्चों को दिनकर रचित कविता-साहित्य की पंक्तियां धाराप्रवाह याद हैं। सिमरिया में प्रवेश करते ही पुस्तकालय के समीप पीतल के दिनकर जी मिल जाएंगे। इसके बाद गांव की हर दीवार पर लिखी मिलेगी ‘दिनकर’ की रचनाओं की दो-चार लाइनें।

दीवार पर लिखी लाइनों को देखकर प्रत्येक साल उनके गांव होने वाले देश के चर्चित साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों, राजनेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और आमजन को एहसास हो जाता है कि सिमरिया के लोग ही नहीं, यहां की दीवारें भी कविता बोलती हैं। दिनकर जी के गांव की मिट्टी की सोंधी खुशबू कविताओं को झंकृत करती है। लोग कविताओं को आत्मसात करते हुए उनके भाव को अपने जीवन में उतारने की कोशिश करते हैं। दीवारों पर लिखी हुई रचनाएं पढ़कर गांव के बच्चे प्रभावित होते हैं। उन्हें लगता है कि हमारे गांव के महाकवि की यह कविता कहीं ना कहीं जीवन में सफलता के मार्ग पर आगे बढ़ने में सीढ़ी का काम करेगी। उन कविताओं को पढ़कर अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं। हर संकट में हर मुसीबत से लड़ने के लिए, दिनकर की कविता बच्चों में उर्जा प्रदान करती है जैसे ”सच है विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है, सूरमा नहीं विचलित होते क्षण एक नहीं धीरज खोते, कांटों में राह बनाते हैं विघ्नों को गले लगाते हैं।”

रामधारी सिंह दिनकर शायद एकमात्र ऐसे कवि हैं, जिनके गांव के बड़े-बुजुर्ग और युवा ही नहीं, नन्हे-मुन्ने पांच साल के बच्चों को भी कविताओं की चार से दस लाइन निश्चित तौर पर कंठस्थ हैं। ‘दिनकर’ मंच पर कई बार युवाओं के द्वारा ‘रश्मि रथी’ का नाट्य मंचन भी किया गया है। इतना ही नहीं, राष्ट्रकवि की उर्वर भूमि सिमरिया गांव में दर्जनाधिक युवा कवियों की टीम है, जो अपनी रचनाधर्मिता में आगे है। उनमें बीएचयू के डॉ. रामाज्ञा शशिधर, प्रवीण प्रियदर्शी, विनोद बिहारी, बबलू कुमार दिव्यांशु, अनिल सिंह अकेला, संजीव फिरोज, शबनम कुमारी, मनीष मधुकर, श्याम नंदन निशाकर, केदारनाथ भास्कर, हरिओम कुमार, रामनंदन झा अकेला, नवकांत झा, रूपम कुमारी, गोविंद गोपाल और निखिल कुमार आदि कुछ उदाहरण हैं। साहित्य की गतिविधियों में पहली पंक्ति में स्थान बना चुके युवा कवि सिमरिया निवासी विनोद बिहारी कहते हैं कि सिर्फ दिनकर के गांव सिमरिया ही नहीं, आसपास के तमाम गांव के सभी सरकारी और निजी विद्यालयों के बच्चे दिनकर जी की रचनाओं का पाठ करते रहते हैं। साल भर आयोजित होने वाले विभिन्न प्रतियोगिता में जब बच्चे दिनकर रचित काव्य की पंक्तियों का सस्वर पाठ करते हैं, तो यहां की मिट्टी भी झूम उठती है।

यहां राष्ट्रकवि दिनकर स्मृति विकास समिति द्वारा दिनकर जयंती सप्ताह का आयोजन 18 सितम्बर से चल रहा है। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की प्रारंभिक पाठशाला बारो स्कूल से कार्यक्रम शुरू कराए जाने के बाद आसपास के गांवों के स्कूलों में आयोजन कराए जा रहे हैं। इस दौरान प्रथम वर्ग से लेकर इंटर तक के बच्चे लगातार रचनाओं का पाठ कर दर्शकों एवं आयोजन समिति को अचंभित कर कर रहे हैं। इसमें नन्हीं स्नेहा जब पाठ करती है ”कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली, दिल ही नहीं दिमाग में भी आग लगाने वाली” तो कलम की ताकत याद आती है। छोटे बच्चे जब ”कलम आज उनकी जय बोल जय बोल, जला अस्थियां बारी बारी जिनने छिटकाई चिंगारी, जो चढ़ गए पुण्य बेदी पर लिए बिना गर्दन का मोल, कलम आज उनकी जय बोल जय बोल” का पाठ करते हैं तो बुजुर्ग भी मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। ”सदियों की ठंडी बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने की ताज पहन इठलाती है, दो राह समय के रथ का घर्घर नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” का पाठ लोगों को उद्वेलित करता है। ”क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो, उसको क्या जो दंत हीन विष रहित विनीत सरल हो” समय की सच्चाई सोचने पर मजबूर करती है।

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