
Deoghar: 72 वर्ष की आयु में, रोहिणी की सेवानिवृत्त शिक्षिका आशा प्रसाद, जिन्हें स्नेहपूर्वक ‘बेबी दीदी’ कहा जाता है, यह साबित कर रही हैं कि सेवानिवृत्ति के बाद भी जीवन नए सपनों, नई यात्राओं और नए अनुभवों से भरा हो सकता है।

झारखंड के देवघर जिले के रोहिणी गाँव में जन्मी और पली-बढ़ी आशा प्रसाद ने लगभग 40 वर्षों तक शिक्षा के क्षेत्र में सेवा दी और राजकीय मध्य विद्यालय, रोहिणी से सेवानिवृत्ति प्राप्त की। अपने शिक्षण काल में वे “साइकिल वाली दीदी” के नाम से प्रसिद्ध थीं। उस समय जब ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं का साइकिल चलाना बहुत कम देखने को मिलता था, आशा प्रसाद उन शुरुआती महिलाओं में से थीं जिन्होंने आत्मविश्वास के साथ साइकिल चलाकर एक नई मिसाल कायम की।

अपने शिक्षण जीवन के दौरान भी आशा प्रसाद को यात्रा करना बेहद पसंद था। उन्होंने भारत के विभिन्न राज्यों और शहरों की यात्राएँ की तथा देश की विविध संस्कृतियों, परंपराओं और जीवनशैली को करीब से देखा। वे हमेशा चाहती थीं कि एक दिन भारत की सीमाओं से बाहर निकलकर विभिन्न देशों और संस्कृतियों को भी करीब से जानें।
सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने अपने पति के साथ दुनिया घूमने का सपना देखा था। वर्ष 2021 में कोविड-19 के दौरान उनके पति के निधन के बाद जीवन ने एक कठिन मोड़ लिया। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने अधूरे सपनों को नई ऊर्जा के साथ पूरा करने का निर्णय लिया।
आज बेबी दीदी विभिन्न वरिष्ठ नागरिक यात्रा समूहों के साथ देश-विदेश की यात्राएँ करती हैं। जहाँ अधिकांश लोग रिटायरमेंट के बाद आरामदायक जीवन चुनते हैं, वहीं उन्होंने दुनिया को देखने, नई संस्कृतियों को समझने और नए अनुभवों को अपनाने का रास्ता चुना।
अपनी पेंशन की बचत, अनुशासित जीवनशैली और अटूट जिज्ञासा के बल पर वे अब तक सिंगापुर, थाईलैंड, मलेशिया, दुबई, जापान, ऑस्ट्रेलिया, लंदन, फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड, लक्ज़मबर्ग, जर्मनी, स्विट्जरलैंड और इटली की यात्रा कर चुकी हैं। हाल ही में अप्रैल 2026 में उन्होंने जापान की यात्रा की, जहाँ उन्होंने विश्वप्रसिद्ध चेरी ब्लॉसम (सका) का मनमोहक दृश्य देखा। इस यात्रा के दौरान उन्होंने हिरोशिमा और नागासाकी के ऐतिहासिक स्मारकों का भी भ्रमण किया, जो शांति और मानवता का महत्वपूर्ण संदेश देते हैं। इसके साथ ही उन्होंने टोक्यो की आधुनिक जीवनशैली, संस्कृति और तकनीकी विकास को भी करीब से अनुभव किया।
जहाँ कई लोग बढ़ती उम्र में यात्रा करने से हिचकिचाते हैं, वहीं बेबी दीदी हर नई यात्रा को उत्साह और साहस के साथ स्वीकार करती हैं। नए देशों में जाना, स्थानीय लोगों से मिलना, विभिन्न संस्कृतियों को समझना और दुनिया को करीब से देखना उनकी पहचान बन चुका है। उनके लिए यात्रा केवल घूमना-फिरना नहीं, बल्कि सीखने और जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने का माध्यम है।
उनका यात्रा-सफर अभी समाप्त नहीं हुआ है। एशिया, यूरोप, मध्य-पूर्व और ऑस्ट्रेलिया की यात्रा के बाद अब उनका अगला सपना अमेरिका और कनाडा की यात्रा करना है। वे मानती हैं कि दुनिया बहुत विशाल है और हर देश, हर संस्कृति और हर समाज हमें कुछ नया सिखाता है।
उनकी इस प्रेरणादायक यात्रा में उनका परिवार हमेशा उनके साथ खड़ा रहा है। उनके बड़े पुत्र डॉ. दीप सागर वर्मा निफ्ट (NIFT) में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। उनकी बहू पूजा श्रीवास्तव, जो एक चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, उनकी यात्राओं की योजना बनाने और उन्हें प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उनकी पुत्री राज लक्ष्मी वर्मा और पुत्र वीर सागर वर्मा, दोनों CISF में इंस्पेक्टर हैं और हमेशा उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे हैं।
बेबी दीदी कहती हैं कि हर नई यात्रा उन्हें और अधिक उत्साहित करती है। जितना अधिक वे दुनिया को देखती हैं, उतनी ही उनकी इच्छा बढ़ती है कि वे और देशों की यात्रा करें, विभिन्न संस्कृतियों को समझें और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों को करीब से जानें। उनके अनुसार, दुनिया एक खुली पुस्तक की तरह है और वे उसके अधिक से अधिक पन्ने पढ़ना चाहती हैं।
बेबी दीदी की कहानी केवल दुनिया घूमने की कहानी नहीं है। यह साहस, आत्मनिर्भरता, सकारात्मक सोच और जीवन को पूरे उत्साह के साथ जीने की कहानी है। रोहिणी गाँव की प्रिय “साइकिल वाली दीदी” से लेकर एक वैश्विक यात्री बनने तक, उन्होंने यह साबित किया है कि सपनों को पूरा करने की कोई उम्र नहीं होती।
उनका संदेश सरल लेकिन प्रेरणादायक है:
“उम्र केवल एक संख्या है। यदि मन में जिज्ञासा, साहस और सीखने की इच्छा बनी रहे, तो दुनिया का कोई भी कोना दूर नहीं।”
रोहिणी की सड़कों पर साइकिल चलाने वाली यह शिक्षिका आज दुनिया के विभिन्न देशों की यात्रा कर रही हैं और यह साबित कर रही हैं कि जीवन के सबसे खूबसूरत सफर की शुरुआत रिटायरमेंट के बाद भी हो सकती है। उनकी कहानी हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो मानता है कि सपनों को पूरा करने की कोई उम्र नहीं होती।


