
Deoghar: टेक्नोलॉजी वाले इस बदलते दौर ने भले ही पूरी दुनिया एक छोटे से डब्बे (मोबाईल) में समेट दी हो। लेकिन हम उस जमाने को नहीं भूल सकते जब साईकल पर गली-मोहल्ले में डब्बे वाले (बाइस्कोप) को आता देख बच्चों की टोली पीछे-पीछे दौड़ जाती थी। शायद ही, आज के दौर के बच्चे बाइस्कोप से वाकिफ हों लेकिन, जिन्होंने इस दौर को जिया है वो फिर से एक बार अपने बचपन को याद कर रहे हैं।

दरअसल, देवघर नगर निगम कार्यालय के पास लगे शिल्प महोत्सव में एक साईकल पर रखे छोटे डब्बे के पास बच्चों से ज्यादा बड़ों की भीड़ है। बड़े अपने बचपन को याद कर रहे और अपने बच्चों को भी इससे रूबरू करा रहे। हो भी क्यों न! यहां, बिहार के पूर्वी चंपारण से आए राज कुमार चौबे ने बाइस्कोप जो लगा रखा है।

राज कुमार चौबे बताते हैं कि जब बड़े-बुजुर्ग यहां पहुंच इस बाइस्कोप को देखते हैं तो काफी खुश हो जाते हैं, वे अपने बचपन की यादों को एक बार फिर समेटने के लिए बाइस्कोप देखते हैं। इतना ही नहीं अपने बच्चों को भी इसे देखने के लिये प्रेरित करते हैं।
वो बताते हैं कि ये भले ही हमारे रोजी-रोटी का जरिया हो लेकिन चंद रुपये देकर इस बाइस्कोप को देख बुजुर्गों के चेहरे पर जो मुस्कान आती है वो इन रुपयों से कई गुना ज्यादा बड़ा है।
वहीं, इस बाईस्कोप को देख उस जमाने को जीने वाले लोग कहते हैं, बचपन याद आ गया। एक दौर था जब हम इस एक छोटे से डब्बे में पूरी दुनिया घूम लेते थे। चाहे, कश्मीर की खूबसूरत वादियां हो, या आगरा का ताजमहल, दिल्ली के कुतुबमीनार की बात करें या फिर मुंबई का गेटवे ऑफ इंडिया। तमाम पर्यटक स्थल इस छोटे से डिब्बे में बंद रहता था और हम सभी साथी इसे देखने के लिए बाईस्कोप वाले के पीछे-पीछे भागते थे।



