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बाबू समझो इशारे! ….. लेकिन बाबुओं की जमात समझने को तैयार नहीं।

एक इशारा जो स्कूली बच्चो के निवाले से जुड़ा है, उसे सरकारी सिस्टम और बाबुओं की जमात समझने को तैयार नहीं।

Deoghar: बाबू समझो इशारे!…..हम बात कर रहे उस इशारे की …. जिसे अमल में लाने के लिए चंद सरकारी बाबू बड़ी ही शिद्दत से दिन रात जुटे रहते हैं। लेकिन, एक इशारा जो स्कूली बच्चो के निवाले से जुड़ा है, उसे सरकारी सिस्टम और बाबुओं की जमात समझने को तैयार नहीं। हम बात कर रहे हैं देवघर जिले के देवीपुर प्रखंड स्थित एक मिडिल स्कूल की, जो बीते दो साल से साफ पानी के लिए तरस रहा है, स्कूल की रसोईया पास के गांव से पानी लाकर बच्चों के लिए मिड डे मील तैयार कर रही हैं लेकिन, सरकारी बाबुओं की लालफीताशाही और अफसरशाही है  की, बीते दो वर्षों से लगातार एक अदद चापानल ठीक कराने की गुहार तक सुनने को तैयार नहीं। 

बच्चे पढ़ें….स्वस्थ रहें और गरीबों के बच्चो को स्कूल में ही पौष्टिक खाना मिले और देश का भविष्य सुरक्षित रहें…इन सब जिम्मेदारी को निभाने वाली महिलाएं या यूं कहें यह रसोइए आज लाचार हैं…बेबस हैं…और मजबूर हैं…मजबूरी है कि, बच्चों का पेट वक्त पर भरना है…उन्हें पीने के लिए साफ पानी देना है तभी तो, स्कूल में चापानल रहते हुए भी, पानी के लिए पास के गांव जाना होता है…हाथ मे बाल्टी और सर पर मटका भर न सिर्फ अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रही हैं बल्कि, अपने बच्चे को भी गोद मे लेकर ड्यूटी करने पर मजबूर हैं। 

जी हां, यह तस्वीर भी किसी ऐसे इलाके की नहीं है जहां पानी की घोर किल्लत है…या फिर इलाका ही सूखाग्रस्त है बल्कि, यह कहानी है देवघर जिले के देवीपुर ब्लॉक के एक उत्क्रमित मध्य विद्यालय जसियाडीह की है जहां, बीते लॉक डाउन के दौरान हुई भारी बारिश की वजह से स्कूल में लगें चापानल की गहराई में भराव हो गया..नतीजतन अब न तो पानी निकलती है अर्बन ही नल ही काम का रह गया है.. मेहन्तकशी के बाद अगर पानी की धार निकल भी आई तो, कीचड़ और गंदगी इतनी की, सरकारी बाबू तो उसे देखते ही बीमार पड़ जाएं लेकिन, यहां तो गांव और गरीबों के बच्चे हैं लिहाज़ा, जिम्मेदार अधिकारी इस परेशानी को समझने तक के लिए तैयार नहीं।

बहरहाल, गर्मी शुरू होते ही पारा अपने चरम पर है…आग उगलते सूरज की गर्मी की तपिश कुछ ऐसी है कि, लोग घर से बाहिर निकलने से गुरेज करने लगे हैं। ज़रा सोचिए बदन को झुलसा देने वाली गर्मी और चूल्हे की आंच के साथ बच्चों का निवाला तैयार करने वाली इन महिलाओं का हाल क्या होगा। इंसानियत का भी एक तकाज़ा है….सोचिएगा ज़रूर और कोसिए अपनी व्यवस्था को और सरकारी मुलाजीमो को क्योंकि, सरकार ने तो इंतज़ाम ज़रूर किये हैं पर, यह सरकारी मुलाजिम हैं कि, समझने को तैयार नहीं।

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