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मोदी कैबिनेट का बड़ा फैसला,को-ऑपरेटिव बैंक अब RBI की निगरानी में,8.6 करोड़ खाताधारकों को होगा फायदा

बीकानेर


नई दिल्ली। 

अब देश के सभी सहकारी बैंक रिजर्व बैंक की निगरानी में आएंगे। अभी देश में 1482 अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक और 58 मल्टी स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक हैं। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बुधवार को कैबिनेट बैठक हुई।  बैंकिंग सेक्टर में सुधार के लिए मोदी कैबिनेट ने एक अहम फैसला लिया। जिसके तहत अब देश के सभी को-ऑपरेटिव और मल्टी स्टेट बैंक आरबीआई के अंतर्गत काम करेंगे। इस फैसले के तहत अब देश के सभी सहकारी बैंक (अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक हो या मल्टी स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक) रिजर्व बैंक की निगरानी में आएंगे। सरकार के इस फैसले से 8.6 करोड़ खाताधारको को सीधा फायदा पहुंचेगा। 

निगरानी का मतलब

इनका ऑडिट आरबीआई नियमों के तहत होगा।  अगर कोई बैंक वित्तीय संकट में फंसता है, तो उसके बोर्ड पर निगरानी भी आरबीआई ही रखेगा. हालांकि, प्रशासनिक मसलों को रजिस्ट्रार ऑफ कोऑपरेटिव्स देखते रहेंगे। 

आइए जानते हैं कि आरबीआई के अंतर्गत आने से को-ऑपरेटिव बैंकों में क्या सुधार होंगे-

पैसा रहेगा सुरक्षित

देश में 1482 अर्बन को-ऑपरेटिव और 58 मल्टी स्टेट बैंक है। इन बैंकों में 8.6 करोड़ से ज्यादा खाताधारकों का 4.84 लाख करोड़ रुपये जमा है। हाल ही PMC बैंक से निकासी पर RBI ने रोक लगा दी थी, जिसके बाद लोग अब 1000 रुपये से ज्यादा नहीं निकाल सकते हैं। इसी तरह कई अन्य को-ऑपरेटिव बैंकों की हालत भी खराब है। मोदी कैबिनेट के फैसले के बाद अब को-ऑपरेटिव बैंक आरबीआई की देखरेख में काम करेंगे। जिससे प्राइवेट बैंकों की तरह उसमें भी लोगों का पैसा सुरक्षित रहेगा।

भ्रष्टाचार से निजात

को-ऑपरेटिव बैंक गांवों और शहर में काम करते हैं। इनका काम स्थानीय लोगों को छोटे कर्ज उपलब्ध करवाना होता है। कई बार भ्रष्ट तंत्र की वजह से कर्ज तो दे दिया जाता है, लेकिन उसकी वसूली नहीं की जाती है। जिस वजह से NPA बढ़ता जाता है। बाद में यही बैंक के डूबने की वजह बनता है। आरबीआई के अंतर्गत आने से इस पर भी काफी हद तक लगाम लगेगी।

क्यों लिया गया फैसला

दरअसल, बीते कुछ समय से देश के अलग-अलग हिस्सों के को-ऑपरेटिव बैंक में नियमों की अनियमितता का खुलासा हुआ है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण पंजाब एंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव (PMC) बैंक है।  इस बैंक ने रिजर्व बैंक के कई नियमों का उल्लंघन तो किया ही, साथ ही केंद्रीय बैंक को गुमराह भी किया। पीएमसी बैंक के मैनेजमेंट पर आरोप है कि नियमों को ताख पर रखकर हाउिसंग डेवलपमेंट एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर (HDIL) को लोन दिया गया। बैंक ने यह कर्ज HDIL को ऐसे समय में दिया जब यह कंपनी दिवालिया होने की प्रक्रिया से गुजर रही थी। साल 2019 में इसका खुलासा हुआ । इसके बाद रिजर्व बैंक ने पीएमसी बैंक पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी । इस पाबंदी के तहत ग्राहकों को पैसे निकालने की लिमिट भी तय कर दी गई । वहीं, बैंक को नए लोन या नए निवेश के अलावा जमा पर रोक लगा दी गई। ऐसे ही एक मामले में मुंबई स्थित सीकेपी सहकारी बैंक का लाइसेंस रद्द कर दिया गया।

फैसले का फायदा

पीएमसी बैंक जैसे मामलों के आने के बाद ग्राहकों की परेशानी बढ़ी है और बैंकों पर से भरोसा कम हुआ है। सरकार का कहना है कि इन बैंकों के आरबीआई की निगरानी में आने के बाद 8.6 करोड़ से अधिक जमाकर्ताओं को भरोसा मिलेगा। यह आश्वासन मिलेगा कि उनका बैंकों में जमा 4.84 लाख करोड़ रुपया सुरक्षित है। इसके साथ ही ग्राहकों के हित में रिजर्व बैंक द्वारा लिए गए फैसले का फायदा निजी और सरकारी बैंकों के साथ ही को-ऑपरेटिव बैंक तक पहुंचेगा। 

प्राइवेट बैंकों की तरह होंगे हाईटेक

को-ऑपरेटिव बैंक की व्यवस्था काफी कमजोर होती है। पूरी दुनिया में टेक्नोलॉजी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है, लेकिन इन बैंकों की व्यवस्था जस की तस है। ज्यादातर खाताधारक तो ATM और इंटरनेट बैंकिंग का इस्तेमाल ही नहीं करते हैं। आरबीआई जब इन बैंकों को हाईटेक करेगा, तो सारे लेने-देन का सही हिसाब रखा जाएगा। इस दौरान किसी भी तरह की गड़बड़ी नहीं होगी, साथ ही ग्राहकों को भी अच्छी सुविधा मिलेगी।

बजट में हुआ था ऐलान

इसी साल फरवरी में आम बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने को-ऑपरेटिव बैंक को आरबीआई की निगरानी में लाने का प्रस्ताव रखा था । इसके साथ ही वित्त मंत्री ने जमा बीमा और ऋण गारंटी निगम को 1 लाख से बढ़ाकर 5 लाख कर दिया था।  इसका मतलब ये हुआ कि बैंक में जमा राशि डूब भी जाती है तो आपको 5 लाख तक की बीमा मिलेगी। 

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