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NHRC की रिपोर्ट : Bengal में कानून का शासन नहीं, मंत्रियों-नेताओं को बताया कुख्यात अपराधी

''चुनाव के बाद की हिंसा'' पर मानवाधिकार आयोग(NHRC) ने हाई कोर्ट(High Court) में रिपोर्ट सौंप दी है। इसमें कहा है कि राज्य में कानून का राज नहीं है, शासक दल का शासन चल रहा है।

कोलकाता: ”चुनाव के बाद की हिंसा” पर मानवाधिकार आयोग(NHRC) ने हाई कोर्ट(High Court) में रिपोर्ट सौंप दी है। इसमें कहा है कि राज्य में कानून का राज नहीं है, शासक दल का शासन चल रहा है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने चुनाव के बाद की हिंसा रिपोर्ट में बंगाल की राज्य सरकार की निंदा की है। इतना ही नहीं, रिपोर्ट में कवि की कविता ”चित्त येथा भय शून्य” के हवाले से कहा गया है, ”जिस राज्य में रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म हुआ था, वहां हजारों लोगों की इतनी क्रूर यातना, हत्या और बलात्कार अकल्पनीय है।”

इसमें कहा गया है कि जिस तरह से सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने राज्य में हिंसा का माहौल बनाया है, उससे सार्वजनिक जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। इसने हजारों लोगों के जीवन को प्रभावित किया है। सत्ताधारी पार्टी के डर से कई लोग अभी भी बेघर हैं। कई लोग यौन अपराधों के शिकार हुए हैं, लेकिन वे मुंह खोलने से डरते हैं। स्थानीय पुलिस प्रशासन के खिलाफ शिकायतें की गई हैं।

NHRC ने हाई कोर्ट में रिपोर्ट दाखिल किया है जिसमें कुख्यात अपराधियों की सूची दी गई है। सूची में ज्योतिप्रिय मल्लिक, उदयन गुहा जैसे तृणमूल के कई बड़े नेताओं का नाम शामिल है।

आयोग ने चुनाव के बाद राज्य में हत्या और बलात्कार की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपे जाने की सिफारिश की है। साथ ही आयोग का मानना है कि उन मामलों की सुनवाई दूसरे राज्यों में होनी चाहिए। रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि मामलों के त्वरित निपटान के लिए एक फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना की जाए। पारदर्शी जांच के हित में सीट का गठन और मामले में गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। आयोग ने विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति पर भी जोर दिया है। आयोग ने हिंसा की शिकार महिलाओं के मुआवजे, पुनर्वास और सुरक्षा की भी अपील की। रिपोर्ट में “जिम्मेदार” सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का भी आह्वान किया गया है।

आयोग ने “चुनाव के बाद की हिंसा” को रोकने के लिए रिपोर्ट की सिफारिशों का पालन करने के लिए त्वरित कार्रवाई का आह्वान किया। साथ ही कोर्ट के आदेश का पालन हो रहा है या नहीं यह देखने के लिए एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति गठित करने का अनुरोध किया गया है।

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