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श्रावणी मेला की बंदी का अत्यन्त छोटे और मझोले विक्रेताओ पर कितना आर्थिक असर: एक आंकलन

देवघर श्रावणी मेला विश्व का सबसे अधिक लम्बी अवधि का धार्मिक मेला है। यह दो राज्यों बिहार और झारखंड का संयुक्त मेला है।

By: प्रोफेसर (डाक्टर) नागेश्वर शर्मा

देवघर: देवघर श्रावणी मेला विश्व का सबसे अधिक लम्बी अवधि का धार्मिक मेला है। यह दो राज्यों बिहार और झारखंड का संयुक्त मेला है। यह मेला लंबी अवधि का ही नहीं, लंबी दूरी का भी मेला है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में बैद्यनाथ का पंचम स्थान है। श्रावण के पवित्र माह में भक्तगण लाखों की तादाद में उत्तरवाहिनी गंगा का पवित्र जल लेकर सुल्तानगंज से पैदल चल कर बैद्यनाथ पर जलार्पण करने आते हैं।

मान्यता है कि चिता भूमो बैद्धनाथं जिसकी स्थापना स्वंय मां त्रिपुर सुन्दरी और हरि ने की है, एक मनोकामना लिंग है। यही कारण है कि इस पवित्र माह में लाखों की तादाद में भक्तगण बोल-बम का नारा लगाते हुए देवघर आते हैं। एक अनुमान के अनुसार पिछले के पिछले वर्ष 30-40 लाख कांवड़िया देवघर आए थे। इतनी लंबी और इतने बड़े मेले का अर्थशास्त्र भी बड़ा है। विगत दो वर्षो से कोरोना महामारी के चलते मेला नहीं लग रहा है । अतः आवश्यक है कि मेले के अर्थशास्त्र से जुड़े विभिन्न प्रकार के विक्रेताओ पर इसका क्या असर पड़ा जानना आवश्यक है।

जिस श्रावणी मेले का इन्तजार विभिन्न तरह के व्यापारियों एवं अन्य संबंधित लोग (मंदिर के प्रागंण में या इर्द-गिर्द फूल , विल्ब पत्र, बद्धी माला ,अगरबत्ती आदि बेचने वाले) बेसब्री से करते थे , अब जबकि यह प्रसिद्ध मेला विगत वर्ष 2020 से ही नहीं लग रहा है, तो ऐसे लोगो के सब्र का बांध टूटना लाजिमी है। पुरोहितो से लेकर अन्य छोटे-मझोले और बड़े विक्रेताओ की व्यथा एवं वेदना के वक्तव्य स्थानीय दैनिक समाचार पत्र की सुर्खियों में लगातार पढ़ने को मिल रहा है। ये लोग हतोत्साहित और निराश हैं। ऐसा होना बिल्कुल स्वाभाविक है।

हम अपनी बात अत्यंत छोटे और निर्धन-कमजोर विक्रेताओ से शुरू करेंगे। ऐसे विक्रेताओ में बद्धी-माला बेचनेवाले , विभिन्न तरह के फोटो/तस्वीर , खिलौना, सिन्दुर आदि बेचने वाले आते हैं। ऐसे विक्रेताओ की संख्या एक अनुमान के अनुसार पूरे मेला क्षेत्र में स्थाई-अस्थाई दोनो को मिलाकर दो से ढाई हजार की होती है। प्रतिदिन इनकी कमाई दो से ढाई हजार रूपये की होती थी और लागत सात से आठ सौ रूपये । इस प्रकार मेले में अच्छी कमाई हो जाती थी , जिस पर पिछले साल से ही बट्टा लगा हुआ है । सच में, ऐसे लोगों की आर्थिक स्थिति चरमरा गयी है। कर्ज के बोझ तले दब गये हैं।

कांवरिये पैदल, नंगे पैर लाखो की तादाद में आते थे । बैद्यनाथ पर जलार्पण के बाद उन्हें चप्पल की जरूरत पड़ती है। लोग घूम घूम कर ठेले पर हवाई चप्पल , चमड़े का चप्पल , चमड़े का बैग आदि सामान बेच कर साल भर के अतिरिक्त खर्च की भरपाई कर लेते थे। ऐसे बिक्रेता भी मेला बंदी से उतपन्न संकट से जूझ रहे है।

मेला बंदी के worst sufferer मे पुरोहित समाज के लोग भी है। पुरोहित (पंडा जी) और यजमान का संबंध बहुत ही मधुर एवं अध्यात्म आधारित होता है । अरघा सिस्टम के वाबजूद बाबा पर जलार्पन पूर्व यजमान अपने पंडाजी से संकल्प अवश्य कराते हैं। पहले यह मंदिर प्रागंण में होता था ,अब बाहर ही होता है । पुरोहितो की आमदनी का यह एक अच्छा स्रोत है। विगत दो-बर्ष से यह बंद है। पंडाजी अपने अच्छे -खासे यजमान के आवासन की व्यवस्था करते हैं। इससे भी उन्हे मेले के दौरान अच्छी खासी आमदनी हो जाया करती थी। विगत दो वर्षो से आमदनी का यह स्रोत सूख गया है। आर्थिक संकटो से घिरे इन पुरोहितो ने अपनी आप बीती को स्थानीय प्रशासन से लेकर सरकार तक पहुचा चुके है।

अब हम छोटे अस्थाई भोजनालयों, चाय और फल विक्रेताओ की बात करेंगे। श्रावणी मेले का प्रवेश द्वार दुम्मा है। दुम्मा से लेकर दर्शनिया तक और फिर रिखिया मोड़, भुरभुरा मोड़, गिधनी मोड़ आदि जगहो पर करीब छह सौ से सात सौ इस प्रकार की दुकानें फैली रहती थी और एक अनुदार अनुमान के अनुसार करीब छह हजार लोग एक से डेढ माह के लिए रोजगार पाते थे।मजदूर समेत दुकानदारो को अच्छी आय प्राप्त होती थी। ये भी मेला बंदी से आहत और प्रभावित है।

मेले से जुड़े अन्य व्यावसायी भी मेला बंदी के शिकार हुए हैं। ये हैं- पेड़ा विक्रेता , खोवा विक्रेता, चूड़ी विक्रेता , लोहे के सामानों के विक्रेता , बद्धी और फोटो के निर्माणकर्ता आदि। पेड़ा विक्रेता ने ही बताया कि पेड़े की स्थाई दुकानो की संख्या करीब दो सौ है। मेले के दौरान करीब तीन सौ अस्थाई दुकाने हो जाती है। मेला शुरू होने के एक-डेढ माह पूर्व से ही स्थाई दुकानदार खोवे का स्टॉक बनाना शुरू कर देते थे। बड़े पैमाने पर खोवे की आपूर्ति मुगलसराय ,बनारस,मिर्जापुर ,ग्वालियर , कोलकाता,मुर्शीदाबाद और कान्डी आदि जगहो से होता था। देवघर जिला के विभिन्न गांवों से भी खोवा आता था। पेड़े की बढ़ी हुई डिमान्ड को देखते हुए खोवा -सह पेड़ा व्यावसायी मजदूरो की संख्या बढा देते थे। उन्ही लोगो के अनमानुसार इस कारोबार मे direct and indirect करीब चार से छह हजार लोग लगे रहते थे । विगत दो मेला बंदी से इनकी अर्थव्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित हुई है।

एक पेड़ा बिक्रेता ने बताया कि औसतन प्रतिदिन एक से डेढ क्विन्टल पेड़े की बिक्री एक दुकान से होती थी। अभी के सरकारी दर पर ही पेडे की बिक्री की बात करे तो केवल पेड़ा उद्योग की सकल आय एक माह में 30 करोड़ रूपये के आस-पास होगी। 5 हजार मजदूरो की एक माह की कमाई की रकम और ईलायची दाने की बिक्री की आमदनी को जोड़ दे तो सकल आय की राशी एक करोड़ के पास होगी यानी कुल आय 31 करोड़। विगत दो वर्षो से देवघर की अर्थव्यवस्था को इतनी बड़ी हानी हो रही है।

जानकारी हो कि मेले में भक्तों के ठहरने के लिए सरकारी और गैर सरकारी संगठनो द्वाराबड़े-बड़े पंडालो का निर्माण होता था। अकेले एक बडे एवं नामी डेकोरेटर्स के द्वारा 70 -80 हजार वर्ग फीट मे विभिन्न जगहो पर चार से छह शिविरों के खातिर पंडाल बनाये जाते थे। उन्होने बताया कि इन पंडालो के निर्माण मे 70- 80 मजदूर लगातार कार्य करते थे । ये मजदूर इस कार्य में निपुन है। मेला बंदी की मार के थपेडो से ये मजदूर भी पीड़ित हैं। गत वर्ष से ही इनकी लाखो -लाख की कमाई बंद है। डेकोरेटर्स की पचासो लाख की आय समाप्त हो गयी है। श्रावणी मेले की अर्थव्यवस्था का यह सेक्टर भी महत्वपूर्ण सेक्टर है। बड़े डेकोरेटर्स के अलावे दस ऐसे डेकोरेटर्स है ,जो 50- 60 वर्ग फीट के अनेको गैर सरकारी संस्थानो के लिए पंडालो का निर्माण करते थे।

एक मामूली सर्वे के अनुसार 25-30 टेन्ट हाउस की भागीदारी पंडालो के निर्माण मे थी । इनकी आमदनी के साथ-साथ सैकडो मजदूरो की आमदनी भी मेला बंदी की चपेट मे चली गयी। मेला इन लोगो के लिये साल भर का आसरा होता था।

मेले के अर्थशास्त्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ट्रान्सपोर्ट होता है। इसमे रेल और सडक परिवहन दोनों आते हैं। मेले के दौरान सड़क ट्रान्सपोर्ट यानी मोटर गाड़ियों की संख्या में मोटा-मोटी 10 गुने की वृद्धि हो जाती थी। उसी अनुपात मे आय में भी वृद्धि हो जाती थी। विगत वर्ष से इस आय मे भारी गिरावट के चलते ट्रान्सपोटर्स की माली हालत खराब हुई है। इसके अलावे रिक्शा चालक , ऑटो चालक , टोटो चालको की आमदनी जो मेला में बढ़ जाती थी, उस पर विगत वर्ष से ही ब्रेक लग गया है। रेल परिवहन की आय मे भी काफी ईजाफा होता था। इस अवधि में रेल भाड़े के अतिरिक्त सरचार्ज लगाकर करोड़ों की आय प्राप्त रेल कर लेता था। इस प्रकार मेला न लगने के कारण इस सेक्टर को विगत दो सालो मे तीन से चार अरब का नुकसान हुआ है।

मेले की सरकारी व्यवस्था का एक प्रमुख हिस्सा बिजली की व्यवस्था है। बिजली की व्यवस्था से जुडे सामानो के आपूर्तिकर्ता भी मेला बंदी से मरमाहत है,चेहरे मुर्झाए हुए है। मेरे एक छात्र ,जो एक अच्छे होटल के मालिक है, पिछले वर्ष लाकडाऊन एवं मेला बंदी के बाद जब हाल-चाल पूछा तो बताया कि होटल के कर्मचारियो का वेतन भुगतान करना तथा बैंक का ई एम आइ देना मुश्किल हो रहा है। मेला बंदी और कोरोना दोनों के संयुक्त मार से यह सेक्टर अब तक नहीं पाया है। और अभी पूरी निजात की संभावना नही दिखती है। इस प्रकार मेला बंदी ने आम लोगो और व्यापारियो के साथ-साथ देवघर की अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया है।

देवघर की अर्थव्यवस्था की धूरी में बाबा मंदिर है। इस धूरी का लुबरिकेन्ट है श्रावणी मेला। लुबरिकेन्ट के अभाव मे धूरी के घुमने की गति थम सी गयी है। जिस अर्थव्यवस्था का आय-व्यय अरबो में हो, तो उसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता है। तभी तो उत्तरवाहिनी गंगा पर स्थित सुलतानगंज से देवघर और देवघर से बासुकीनाथ तक लाखो लोग इस मेले का इन्तजार करते रहते है। देवघर , सच में इसी मेले एवं बाबा मंदिर रूपी विश्व प्रसिद्ध उद्योग की बदौलत एक फलता- फूलता शहर है।

धर्म, राजनीति और अन्त मे अर्थ , लेकिन बहुत महत्वपूर्ण। क्यो न हो? अर्थ के बिना न तो धर्म हो सकता है और न ही राजनीति। अतः मेला बंदी से प्रभावित मेले की अर्थव्यवस्था पर प्रकाश डालना समीचीन ही नही , अपितु आवश्यक है।

लेखक: प्रोफेसर ( डाक्टर) नागेश्वर शर्मा, संयुक्त सचिव, भारतीय आर्थिक परषद।

(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। इसमें शामिल तथ्य तथा विचार/विश्लेषण ‘N7India’ के नहीं हैं और ‘N7India’ इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)

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