

बिहार विधानसभा चुनाव के समय से पक रही लोजपा की राजनीतिक खिचड़ी में रविवार को जबरदस्त तड़का लगा. अब तक लोजपा के सुप्रीमो रहे रामविलास के सांसद पुत्र चिराग को उनके सगे चाचा और सांसद पशुपति कुमार पारस ने उन्हें सभी पदों और पार्टी की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया. लोजपा के पांच सांसदों ने पशुपति कुमार पारस को राष्ट्रीय अध्यक्ष और संसदीय दल के नेता का दायित्व सौंपा और इस घोषणा को व्यवहारिक रूप देते हुए इससे संबधित आधिकारिक पत्र लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को रविवार रात आठ बजे आनन-फानन में सौंप दिया.
अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ?

बिहार की राजनीति को समझने वालों के लिए यह कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है. पिछली बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के दौरान ही लोजपा के सुप्रीमो रामविलास पासवान के बेटे सांसद चिराग पासवान खुशफहमी के शिकार हो गए थे. एनडीए के तरफ से नीतीश के नेतृत्व में लड़े जा रहे इस चुनाव में चिराग ने बागी रूप अख्तियार कर लिया. चिराग को नीतीश के नेतृत्व पर आपत्ति थी. अपरिपक्व राजनीति का नमूना पेश करते हुए चिराग ने खुले प्रेस कांफ्रेस में ऐलान कर दिया कि वो जदयू के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतारेंगे और ऐसा किया भी. इसके साथ ही एनडीए में रहते हुए नीतीश की राजनीतिक कौशल पर खुलेआम बोलते रहे. नतीजा हुआ कि बीजेपी परेशान हो गई और अन्तत: गैर आधिकारिक ही सही, लोजपा को बिहार चुनाव के मद्देनजर एनडीए से बाहर रखना पड़ा. जाहिर है, एनडीए और खासकर जदयू के लिए बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम पर इसका बहुत ही बुरा असर पड़ा. लोजपा कुल 135 सीटों पर जोरआजमाइश की और केवल एक उम्मीदवार को विधानसभा में इन्ट्री दिला पायी. जबकि राजनीतिक विश्लेषण यह बताता है कि लोजपा की इस हरकत के कारण जदयू को सीधे तौर पर 36 सीटों को गंवाना पड़ा. नीतीश भले ही मुख्यमंत्री बन गए हों लेकिन लोजपा के कारण ही कुल चुनाव परिणाम में उनकी पार्टी को तीसरे पायदान पर संतोष करना पड़ा.

चिराग की इस फिल्मीनुमा कारनामे का नतीजा हुआ की बरसों से रामविलास की कमायी हुई राजनीतिक साख को बट्टा लगा और एनडीए में आंतरिक कटुता के साथ-साथ लोजपा में भी असंतोष की नींव पड़ गई.
जमुई से दूसरी बार एनडीए के दम पर सासंद बने चिराग को राजनीति की सतही जानकारी, जमीनी हकीकत से खुद दूर और पुत्रमोह में रामविलास की ढीली होती पकड़ के कारण पिछले छह महीनों से लोजपा में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा था. रामविलास का लम्बे समय तक बीमार और फिर बाद में उनकी मौत ने सब कुछ उलट-पुलट कर दिया. चिराग बेलगाम हो गए और लोजपा की सभी गतिविधियां बिल्कुल ठप पड़ गई.
दूसरी तरफ राजनीतिक रूप से शांत लोजपा में अन्दर-अन्दर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था. दल के पुराने वफादार कार्यकर्ताओं से लेकर जनप्रतिनिधियों ने अपनी आंतरिक गतिविधि तेज कर दी. विधानसभा में लोजपा के एकमात्र विधायक का जदयू में शामिल होना एक तरह से लोजपा के लिए राजनीतिक हरकारा साबित हुआ. अब तक पारिवारिक वर्चस्व में पल रही लोजपा में रामविलास और रामचन्द्र पासवान की मौत के बाद बदलाव के बुलबुले बनने शुरू हो गए थे. अपने युवा सलाहकारों से घिरे चिराग इस बात को समझ नहीं पाए और खुद को सुप्रीमो मानते हुए भाजपा पर अटूट भरोसा किया. वास्तव में ऐसा हुआ नहीं.
विधानसभा चुनाव से खार खाए नीतीश कुमार ने दोहरी चाल चल दी. लोजपा के इकलौते विधायक को अपने पाले में किया और पुराने प्रेमी रामविलास के सगे भाई सांसद पशुपति कुमार पारस को पटाने में जुटे रहे. सूत्र बताते हैं कि एनडीए को मौके की तलाश थी और यह सुखद मौका संभावित केन्द्रीय मंत्रिमंड़ल का विस्तार माना जा रहा है. एनडीए की सबसे बड़ी घटक बीजेपी यह पहले ही तय कर चुकी है कि मंत्रिमंडल में सभी पार्टियों को प्रतिनिधित्व दिया जाएगा और इसी नियमानुसार रामविलास पासवान केन्द्र में खाद्य आपूर्ति मंत्री थे. उनकी मौत के बाद लोजपा कोटे से मंत्रिपद भरा जाना तय माना जा रहा है. चिराग इसी खुशफहमी के शिकार होकर मंत्री बनाए जाने के न्योता का इंतजार कर रहे थे कि दूसरा खेल शुरू हो गया. अंदरखाने से रिपोर्ट है कि नीतीश के इशारे और उनके सिपाहसलारों की मदद से पशुपति कुमार पारस को तैयार किया गया. पार्टी के पुराने विश्वस्त नेता और सांसद पहले से इस ताक में थे. मौका मिलते ही चिराग पासवान को बाहर का रास्ता दिखाते हुए सभी पांच सांसदों ने एक होकर असली लोजपा होने का दावा ठोक दिया.
पशुपति कुमार पारस का नीतीश प्रेम बहुत पुराना है. यह बात सोमवार को दिल्ली में आयोजित पारस की प्रेस कांफ्रेस में भी दिखा. पारस ने कहा कि नीतीश विकास पुरूष हैं और उनके नेतृत्व में बिहार में एनडीए काफी मजबूत है और आगे भी रहेगा. पार्टी टूटने के आरोप को पारस ने खारिज करते हुए कहा कि उन्होंने पार्टी तोड़ा नहीं है बल्कि बचाया है. पार्टी के जन्मदाता और बड़े भाई रामविलास पासवान की आत्मा को शांति के लिए ऐसा करना जरूरी था. चिराग को उन्होंने पार्टी और परिवार का हिस्सा मानते हुए लोजपा के बदले स्वरूप में स्वागत किया है. साथ ही उन्होंने इस बात का जोरदार खंडन किया कि वो नीतीश के सम्पर्क में हैं और उनकी पार्टी का विलय जदयू में होगा. मगर राजनीति है, जो दिखता है वो होता नहीं है और नि:सन्देह बिहार की राजनीति में इस बदलाव का गहरा असर पड़ेगा.
(लेखक एमिटी शिक्षण संस्थान से जुड़े हैं, ये लेखक के निजी विचार हैं।)


