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कोरोना ने भारत को जगाया हो या नहीं, जागने का संदेश तो दे ही दिया है…

By Heman Kumar Jha

कोरोना संकट ने भारत को वैचारिक चौराहे पर ला खड़ा किया है। मोदी ब्रांड पिट चुका है और इसके साथ ही देश के सामने कई सवाल आ खड़े हुए हैं। ऐसे सवाल, जिनसे इस देश के नागरिकों का जीवन-मरण का संबंध है।

पहला और सबसे महत्वपूर्ण सवाल तो यही है कि क्या नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नीति आयोग उन्हीं आर्थिक-सामाजिक नीतियों पर आगे भी काम करता रहेगा जिनके आधार पर बीते वर्षों में वह अपनी कार्य योजनाएं बनाता रहा है?

उन सपनों की प्रासंगिकताएं कितनी रह गई हैं जिनमें हमें बताया जाता रहा है कि जल्दी ही, अगले कुछेक वर्षों में हम 5 ट्रिलियन की इकोनॉमी बनने वाले हैं, कि बस जल्दी ही हमारे देश में हर सिर के ऊपर पक्की छत होगी, कि अब गरीबों के इलाज के लिये ‘आयुष्मान योजना’ के रूप में एक रामबाण नुस्खा खोज लिया गया है…और कि जल्दी ही किसानों की आय दोगुनी हो जाने वाली है।

तालियां जोश भरी उम्मीदों पर ही बजती हैं। इस तरह की घोषणाएं करते नरेंद्र मोदी ने बहुत तालियां बटोरी हैं। वैसे ही, जैसे अपनी चुनावी सभाओं में वे 2 करोड़ रोजगार प्रतिवर्ष के वादों पर बेहिंसाब तालियां बटोरा करते थे।

लेकिन, सच का सामना करने का वक्त आ चुका है। मोदी की गति मोदी जानें, इस देश के लोगों को सोचना होगा कि जिन रास्तों पर नीति आयोग देश को ले जा रहा था, महामारी के इस संकट में उनकी सीमाएं उजागर होने के बाद अब उन नीतियों का क्या होगा?

सार्वजनिक चिकित्सा तंत्र की कमजोर संरचना कोविड संकट में पूरी तरह एक्सपोज हो चुकी है और निजी चिकित्सा तंत्र की अमानवीय लिप्सा भी निर्लज्ज तरीके से उजागर हो चुकी है।

अब, इस संदर्भ में नीति आयोग की उन कार्य योजनाओं पर विचार करने का वक्त आ गया है जिनमें इस देश की चिकित्सा प्रणाली में निजी भागीदारी को अधिक से अधिक बढाने की पैरोकारी की जाती रही है।

क्या नीति आयोग उन्हीं नीतियों पर चलता रहेगा? और…इतना कुछ गुजरने के बाद भी अगर वह उन्हीं नीतियों की वकालत करता उन्हीं कार्य योजनाओं पर काम करता रहेगा तो क्या आम लोगों को चुप रह जाना चाहिए?

जैसा कि सर्वविदित है, नीति आयोग ऐसी योजनाओं पर काम कर रहा है जिनमें देश के तमाम जिला अस्पतालों में निजी निवेश को बढ़ावा दिया जाएगा।

कोविड संकट से मिले सबक के बाद भी क्या ऐसी योजनाओं पर काम होता रहेगा? आज की तारीख में जितने भी जिला अस्पताल हैं, अपनी तमाम साधनहीनताओं के बावजूद वे कोरोना  मरीजों के लिये बड़ा सहारा बन कर सामने आए हैं। कल्पना करें, उन अस्पतालों में अब तक अगर, जैसा कि नीति आयोग चाहता है, मुनाफा के सौदागरों की घुसपैठ हो चुकी होती तो कैसा मंजर होता?

योजना आयोग की जगह बड़े ही जोर-शोर से नीति आयोग को लाया गया था। लेकिन, अंततः यह कारपोरेट सेक्टर का पैरोकार मात्र बन कर रह गया।

स्थापना के इतने वर्षों के बाद इस पर बात होनी चाहिए कि नीति आयोग की क्या उपलब्धियां रही हैं। बेचने के लिये सार्वजिनक इकाइयों की पहचान करना उसका मुख्य कार्य रहा है। यहां तक कि उसके सीईओ अमिताभ कांत ने तो प्रारम्भिक शिक्षा के ‘कम्प्लीट प्राइवेटाइजेशन’ की वकालत की है।

जब कोई बड़ा ब्रांड पिटने लगता है तो उसके साथ ही बड़े-बड़े सपने भी धराशायी होने लगते हैं। मोदी की चमक मद्धिम तो तभी होने लगी थी जब आर्थिक क्षेत्र में एक के बाद एक उनकी तमाम विफलताएं सामने आने लगी थीं। कहाँ तो दो करोड़ रोजगार प्रतिवर्ष दे रहे थे, कहां बेरोजगारी 45 वर्ष के उच्चतम स्तरों पर पहुंच गई, विकास-विकास की रट लगाते विकास दर ही गोता लगाने लगी।

लेकिन, अपनी आर्थिक विफलताओं को अपने प्रचार-प्रबंधन और छवि निर्माण की सुनियोजित प्रक्रियाओं के द्वारा वे यथासंभव नेपथ्य में धकेलने में सफल होते रहे। नौकरियां खत्म होती रहीं, आर्थिक मंदी से देश घिरता गया लेकिन उनका आईटी सेल और मीडिया का बड़ा हिस्सा उनकी विरुदावली गाता रहा।
वे नेता से अधिक ब्रांड बन कर भारतीय राजनीति में छाए थे। इस ब्रांड को कृत्रिम चमक देने की जितनी सुनियोजित कोशिशें होती रहीं वह इतिहास का हिस्सा बन चुका है।

बहरहाल, मोदी अभी इतिहास का हिस्सा नहीं हुए हैं। वे बाकायदा इस देश के प्रधानमंत्री हैं अभी और भाजपा के सबसे बड़े नेता भी। लेकिन, कोविड संकट ने उनकी वैचारिक और क्षमतागत सीमाएं उजागर कर दी हैं।

वे जल्दी हार मानने वालों में से नहीं है, इसलिये वे और उनके सलाहकार विमर्शों को नए मोड़ देने की हर संभव कोशिश करेंगे, ताकि छिटकते और उदासीन होते जनसमर्थन को फिर से साथ लिया जा सके।  लेकिन…अब यह इतना आसान नहीं रहा। उनके अहंकार, उनकी कार्यप्रणाली ने इस देश को जितने बड़े संकट में डाल दिया है वह नजरअंदाज करने के लायक नहीं है।

एक बड़े राजनीतिक प्रकाशपुंज का अचानक से मद्धिम पड़ जाना सिर्फ नियति का ही खेल नहीं है, उनकी वैचारिक सीमाओं का भी बड़ा योगदान है इसमें…और, उनकी इन्हीं वैचारिक सीमाओं ने देश को एक वैचारिक चौराहे पर ला खड़ा किया है।

सवाल यह नहीं है कि मोदी की जगह पर कौन, बल्कि सवाल यह है कि मोदी जिन कारपोरेट समर्थक, विचारशून्य सलाहकारों के भरोसे इस देश को मनमानी दिशा में हांके जा रहे थे, उनकी  प्रासंगिकता कितनी रह गई है। महामारी के सबक और संकेतों ने स्पष्ट कर दिया है कि जिस राह वे देश को ले जा रहे थे वह भारत के विशिष्ट सन्दर्भों में कतई प्रासंगिक नहीं है।

कोरोना ने भारत को जगाया हो या नहीं, जागने का संदेश तो दे ही दिया है। जगे हुए भारत में नरेंद्र मोदी और उनके कारपोरेट एजेंट टाइप सलाहकारों की प्रासंगिकता कैसे बनी रह सकती है?

डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार है।

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