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देश मे उपभोग स्तर में गिरावट चिंता का विषय

नागेश्वर  By:प्रोफेसर (डा)नागेश्वर शर्मा

 
भारतीय केन्द्रीय बैंक (आर बी आई ) के एक रिपोर्ट के अनुसार इस वित्तीय वर्ष 2020-21 की दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था के और सिकुड़ने की संभावना है।

कोविड -19 महामारी के चलते लाकडाउन काल में सारी आर्थिक गतिविधियाँ ठप्प पर गयी थी ।परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था में सिकुड़न (कनट्रेक्शन)आई थी। अनलॉक में छूट की वजह से सोयी हुई अर्थव्यवस्था में चेतना आनी शुरू हुई है । अनलॉक का चौथा फेज अब शुरू हो चूका है । इसी बीच 25 अगस्त को आरबीआई का वर्ष 2019 -20 का वार्षिक रिपोर्ट जारी हुआ है, जिसमे उपभोग को तीव्र आघात लगने की बात कही गई है, जो अर्थव्यवस्था और आर्थिक नीतिकारो के लिए चिंता का विषय है । रिपोर्ट में इस बात का जिक्र है कि उपभोग ही मांग के रिवाइवल की कुंजी होगी ।

अब सवाल है कि ऐसा क्यों हो रहा है?

आरबीआई ने अपने प्रतिवेदन में कहा है कि उच्च आवृति वाले अब तक के संकेतों ने इंगित किया है कि आर्थिक गतिविधि में छंटनी का इतने बड़े पैमाने पर होना अप्रत्याशित घटना है । सेन्टर फॉर मॉनिटरिंग के अनुसार अप्रैल 2019 और जुलाई 2020 के बीच दो करोड़ नौकरियाँ समाप्त हुई है । केवल जुलाई 2020 मे 50 लाख नौकरियाँ समाप्त हुई है। ये सारे के सारे उपभोक्ता होते हैं ।इनके द्वारा की जाने वाली खाद्य पदार्थों की मांग मे भले ही कम हुई है, लेकिन आमदनी खत्म हो जाने की वजह से अन्य तरह के मांगों मे भारी गिरावट आई है ।

उपभोग से तात्पर्य केवल खाद्य पदार्थों का उपभोग ही नही होता, बल्कि अन्य औद्योगिक उत्पादों के उपभोग से भी होता है। औद्योगिक उत्पादों की मांग में हुई कमी से अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं । लॉकडाउन में ढील के कारण मई और जून माह में इनकी मांगों मे वृद्धि जो दिखने लगी थी, वह जुलाई और अगस्त माह घटती हुई नजर आ रही है।

आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, ई -वे बिल का कुल निर्गम जो घरेलू व्यापार क्रिया का एक संकेत है, में जुलाई माह में गिरावट आई है। यह इस बात का संकेत है कि उपभोक्ता के विश्वास में काफी कमी आई है । अधिकांश लोगों में सामान्य आर्थिक हालात, रोजगार, मंहगाई और आय को लेकर काफी निराशा है। सरकारी उपभोग में कमी न भी आए, तो बिना निजी उपभोग में वृद्धि के अर्थव्यवस्था में रिकवरी की प्रक्रिया तेज होना संभव नही है ।

वर्तमान में उपभोग अपने दौर के निचले स्तर पर है। इस वर्ष में अब तक के कुल मांग का मूल्यांकन बताता है कि उपभोग में हुई गिरावट गंभीर है, और इसे कोविड 19 के पूर्व की स्थिति में लाने में समय लगेगा। निजी उपभोग ने पूरे देश में अपने स्वैच्छिक शक्तियां खासकर परिवहन सेवा, हॉस्पिटैलिटी, रिफ्रेश, और सांस्कृतिक गतिविधियों में खो दिया है। (आरबीआई रिपोर्ट)

शहरी उपभोग को ज्यादा नुकसान हुआ है। यात्री वेहिकल्स और टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं में इस वर्ष की पहली तिमाही में पिछले साल की तुलना मे क्रमश: 5 और 3 गुने कमी आई है । देहाती मांग विभिन्न प्रकार के उपायों के बावजूद प्रवासी संकट और रोजगार संकट के चलते विकटावस्था में है ।

इस संकट से उबरने का मेरी राय में कारगर उपाय मांग वृद्धि है। रोजगार सृजन से क्रयशक्ति में वृद्धि, फिर मांग में वृद्धि, फिर उत्पादन और रोजगार में वृद्धि । इस तरह अर्थव्यवस्था का चक्र फोरवार्ड दिशा में घूमने लगता है। उद्यमियों को दिये गये पैकेज का बड़ा हिस्सा हुई हानि की भरपाई में चला जाता है। फिर अपेक्षित मात्रा में रोजगार सृजन नही हो पाता है। उसी प्रकार किसान, मजदूर, एवं ग्रामीणों को दी जाने वाली सहायता राशि से भी रोजगार का सृजन नही होता है। कल्याणकारी राज्य होने के नाते कुछ योजनायें तो निःसंदेह गरीब एवं असहायों के लिए आवश्यक है । लेकिन कामगारो, बेरोजगार श्रमिकों, युवकों को रोजगार देने से डिमांड चेन को शक्ति मिलेगी । आर्थिक इतिहास इस बात का साक्षी है ।

लेख़क प्रोफेसर (डॉक्टर )नागेश्वर शर्मा भारतीय आर्थिक परिषद के संयुक्त सचिव है. ये लेखक के निजी विचार है.

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