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श्रावणी मेला का आयोजन नहीं, तो कैसे होंगे आर्थिक हालात : एक आंकलन

नागेश्वर  Written by: प्रो. (डॉक्टर) नागेश्वर शर्मा 

देवघर।

कोरोना (कोविड -19 ) महामारी से केवल मानवीय जीवन को ही नुकसान नही हुआ है, बल्कि अर्थ और धर्म भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं । इसका सबसे सटीक उदाहरण विश्व प्रसिद्ध देवघर श्रावणी मेले का स्थगन है । इसके स्थगन से न केवल अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चिता भूमो बैद्यनाथं, जो द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक विशिष्ट ज्योतिर्लिंग है, का मंदिर श्रावण के पुण्य मास में श्रद्धालुओं से खाली रहेगा, बल्कि मेले का अर्थशास्त्र भी बुरी तरह प्रभावित होगा ।

यद्यपि मेले के आयोजन हेतु माननीय उच्च न्यायालय रांची, झारखंड मे एक जनहित याचिका दायर की गई है, लेकिन करीब करीब मेला स्थगित होना तय है । राजनीति से धर्म को अलग नही किया जा सकता है । यह ऐतिहासिक मेला दो राज्य (बिहार, झारखंड) सरकारों की साझेदारी में सम्पन्न होता है । मेले की अर्थव्यवस्था का फैलाव 110 किलोमीटर बिहार के सुल्तानगंज से लेकर बैद्यनाथ धाम, देवघर, झारखंड तक है । इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था एवं आबादी वाला यह अकेला एकमात्र मेला है । पिछले साल का रिकॉर्ड बताता है कि करीब 28 -30 लाख कावंरियो और शीघ्र दर्शन के तहत पूजन-अर्चन की थी ।

अब हम आएंगे आलेख के मूल बिन्दू पर।

अगर मेला नही, तो मेले से जुड़े विभिन्न प्रकार के छोटे बड़े कारोबारियों, संवेदक, मंदिर परिसर के अंदर विभिन्न प्रकार के कर्मी, आपूर्ति कर्ता आदि के अर्थशास्त्र का क्या होगा? 

इसी सिलसिले में कल जब मैंने एक अत्यंत छोटे बर्तन व्यापारी से दूरभाष पर बात की तो वे विफर उठे, और बोले कि एक तो लाकडाउन ने चौपट कर दिया । सर , दुकान की कमाई से गृह खर्च चल जाता है । श्रावणी मेले से मेरे जैसे कारोबारी साल भर के लिए अन्य खर्च, बच्चे का स्कूल फीस ,दवाई -इलाज का खर्च, बिजली, पानी का खर्च एवं अन्य खर्च की व्यवस्था कर लेते थे, अब तो ये सब कर्ज लेकर ही निभाना पडे़गा । आर्थिक संकट मुंह बाये सामने खड़ी है । मुझे लगा कि मैंने उनकी दुखती रग पर उंगली रख दी ।

मेले का उद्गम स्थल बिहार प्रांत स्थित सुल्तानगंज शहर है, जहां उत्तर वाहिनी मां गंगा बहती है । सच मे यह शहर इस मेले की बदौलत फला फूला है । श्रद्धालु कावंरिया यहीं जल भरते हैं । जल भरने के पहले कावंरिया तीन चीजों की खरीद अवश्य करते हैं । जल पात्र, कावंर , और केसरिया रंग का वस्त्र । मान लें कि प्रति कावंरिया दो सौ रुपए इन चीजों पर खर्च करते हैं और पिछले साल का ही ऑकडा 28 लाख कावंरियो की संख्या मान लें तो कुल खरीदारी 56 करोड़ रुपए की होती है । अर्थशास्त्र के अनुसार, किसी का खर्च किसी दूसरे व्यक्ति की आमदनी होती है, और यह खर्च -आमदनी इस बार मेले के आर्थिक परिदृश्य से गायब रहने की संभावना है ।

105 किलोमीटर के मार्ग में अस्थाई होटलों की संख्या (छोटे -बड़े ) 1 हजार ही मान लें, और यह भी मान लें कि औसतन 4-5 व्यक्ति एक होटल में काम करते हैं, तो कुल कार्यरत कर्मियों की संख्या 4-5 हजार होती है, और यह भी मान लें कि प्रति व्यक्ति प्रति दिन 3 सौ रुपए मजदूरी दी जाती है, तो कुल भुगतान एक दिन और एक माह में क्रमश:12 -15 लाख रुपए एवं 4 -5 करोड़ आता है। मेले का आयोजन न होने से आम लोगों की कमाई भी चौपट हो जाएगी ।

मेले की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख अंग स्वयं बाबा मंदिर प्रांगण है । पंडा धर्म रक्षणी के उपाध्यक्ष ने बताया कि करीब तीन हजार पंडा (हांडी पति ) मंदिर से जुड़े हुए हैं । श्रावणी मेला से इन्हें विभिन्न रूपों में आय प्राप्त होती है, जो इस बार नही होगी । उन्हें इस बात को लेकर मायूसी है । करीब पांच सौ गुमासता हैं, जिनकी आजीविका मंदिर की कमाई पर ही निर्भर है । लाकडाउन से ही उनकी कमाई बाधित है । बचा-खुचा कसर मेले का स्थगन पूरा कर देगा । फूल -माला बिक्रेता , धूप -अगरबत्ती बिक्रेता, भंडारी, बद्दी बिक्रेता, पनभाडा , नाई ठाकुर, फोटोग्राफर आदि के पेट पर संकट आ गया है । मेले की कमाई से ऐसे लोगाें को बड़ी राहत मिलती थी । इस बार कमाई की नाउम्मिदी से हताश और बेचैन हैं । ऐसे लोगों के लिए राहत पैकेज और मुआवजे की मांग की गई है ।

मेले के स्थगन के बाबत जब पेडा बिक्रेता, चुडी बिक्रेता, खोवा आपूर्तिकर्ता एवं फल के थोक व्यापारी से बात की तो उन्होंने बताया कि मेला न लगने के फलस्वरूप करोड़ो का कारोबार प्रभावित होगा । फल के थोक व्यापारी ने बताया कि कटोरिया तक के खुदरा फल बिक्रेता यहीं से फल खरीदते हैं । केवल श्रावणी मेले के दौरान हजारों क्विंटल पेड़ा की बिक्री होती है । चूड़ी की कुल सौ छोटी -बड़ी दुकानें हैं । केवल एक माह में करोड की बिक्री का अनुमान है ।

सरकारी व्यवस्था पर खर्च श्रावणी मेले के अर्थशास्त्र का एक महत्वपूर्ण एवं बड़ा हिस्सा है । इसमे अस्थायी विद्युत व्यवस्था, पुलिस आवासन व्यवस्था, नजारत को जरूरी सामानों की आपूर्ति, एवं प्रवेश द्वार दुम्मा से लेकर बाबा मंदिर और मंदिर से कुमैठा स्टेडियम तक पंडाल की व्यवस्था सम्मिलित है। अन्य व्यवस्था कच्ची सड़क की मरम्मती , उस पर बालू भराई, पानी की व्यवस्था, चिकित्सा की व्यवस्था आदि पर खर्च सम्मिलित है ।पिछले साल इन सारी व्यवस्थाओं पर 6-7 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे ।

इस तरह स्पष्ट है कि देवघर श्रावणी मेले का अर्थशास्त्र अरबों रुपए का है, जिसे कोरोना वायरस ने पूरी तरह से चपेट में लेकर एक बड़े समुदाय के सामने आर्थिक संकट पैदा कर दिया है ।

लेख़क प्रोफेसर (डॉक्टर )नागेश्वर शर्मा भारतीय आर्थिक परिषद के संयुक्त सचिव है. ये लेखक के निजी विचार है.

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