
Ranchi : झारखंड सरकार के मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू के शनिवार-रविवार की दरम्यानी रात निधन की खबर से पूरा राज्य स्तब्ध है। 56 साल के इस मुखर नेता का असमय जाना झारखंड की राजनीति में एक ऐसी जगह खाली कर गया है, जिसे भरना आसान नहीं होगा।

सुदिव्य कुमार सोनू ने एक संघर्षशील कार्यकर्ता से विधायक और फिर कैबिनेट मंत्री तक का सफर तय किया। उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत किसी चमक-दमक भरी जीत से नहीं, बल्कि एक कठिन पराजय से हुई थी। वर्ष 2009 के विधानसभा चुनाव में जब वे गिरिडीह सदर सीट पर पहली बार झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रत्याशी के तौर पर उतरे, तो महज 8,272 वोटों के साथ छठे स्थान पर रहे। लेकिन हार ने उनके हौसले को तोड़ा नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक व्यक्तित्व की मजबूत नींव रखी।

वर्ष 2014 में उन्होंने जबर्दस्त वापसी की और दूसरे स्थान पर पहुंचे। भले ही वे भाजपा के निर्भय कुमार शाहाबादी से चुनाव हार गए, लेकिन उन्होंने खुद को मुख्य मुकाबले में मजबूती से स्थापित कर लिया। पांच साल बाद, 2014 में तस्वीर बदली। सुदिव्य कुमार सोनू दूसरे स्थान पर पहुंचे। भाजपा के निर्भय कुमार शाहाबादी से वह करीब नौ हजार से अधिक मतों से चुनाव हार गए। लेकिन अब वह मुकाबले में मजबूती से स्थापित हो चुके थे। हार के बावजूद क्षेत्र में उनकी सक्रियता बनी रही और अगले चुनाव तक उन्होंने अपनी राजनीतिक जमीन को और मजबूत किया। फिर आया 2019 का चुनाव। यही चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
उन्होंने उसी निर्भय कुमार शाहाबादी को 15 हजार से अधिक मतों के अंतर से हराया, जिनसे पांच साल पहले उन्हें हार मिली थी। 2009 में छठे स्थान पर रहने वाला उम्मीदवार अब गिरिडीह सदर का विधायक बन चुका था। 2024 में उन्हें फिर कड़ी चुनौती मिली। इस बार मुकाबला बेहद करीबी रहा। इसके बावजूद उन्होंने 3,838 मतों के अंतर से जीत दर्ज की और लगातार दूसरी बार विधानसभा पहुंचे। इसके बाद उनके राजनीतिक सफर का एक और महत्वपूर्ण अध्याय शुरू हुआ।
दिसंबर 2024 में हेमंत सोरेन के नेतृत्व में बनी सरकार में उन्हें पहली बार कैबिनेट मंत्री बनाया गया। उन्हें उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, नगर विकास एवं आवास तथा पर्यटन, कला-संस्कृति, खेल एवं युवा कार्य जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी मिली। गिरिडीह की राजनीति से निकलकर राज्य सरकार के महत्वपूर्ण विभागों तक पहुंचना उनके लिए बड़ा राजनीतिक पड़ाव था। खास बात यह थी कि यह सफर उन्होंने किसी एक चुनावी जीत के सहारे नहीं, बल्कि लगातार संगठन और क्षेत्र में सक्रिय रहकर तय किया था।
सुदिव्य कुमार सोनू की पहचान सिर्फ गिरिडीह के विधायक के तौर पर नहीं बनी। झामुमो संगठन में उनकी सक्रियता लंबे समय तक रही। वह पार्टी के केंद्रीय महासचिव रहे और संगठन के प्रति उनकी निष्ठा को पार्टी के भीतर खास महत्व दिया जाता था। झारखंड आंदोलन की राजनीतिक विरासत और झामुमो की विचारधारा से उनका जुड़ाव उनके सार्वजनिक जीवन की महत्वपूर्ण पहचान रही। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के साथ उनकी राजनीतिक निकटता भी चर्चा में रही। वह सरकार के पक्ष को मजबूती से रखने वाले नेताओं में शामिल थे।
विधानसभा में वह मुखर रहे और विपक्ष के सवालों का जवाब बेबाकी से देते थे। हाल के छात्र आंदोलन के दौरान सरकार और आंदोलनरत छात्रों के बीच संवाद की जिम्मेदारी संभालना भी सरकार के उन पर भरोसे को दर्शाता है। सुदिव्य कुमार सोनू की कहानी इसलिए अलग है क्योंकि इसमें सफलता से पहले संघर्ष का लंबा दौर है। 2009 में छठे स्थान से शुरुआत। 2014 में दूसरे स्थान तक पहुंचना। 2019 में पहली बड़ी जीत। 2024 में करीबी मुकाबले में दूसरी जीत और फिर कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी। राजनीति में कई बार अंतिम मुकाम ही याद रखा जाता है।
सुदिव्य कुमार सोनू की यात्रा यह याद दिलाती है कि अंतिम मुकाम तक पहुंचने के पीछे कई ऐसे पड़ाव होते हैं, जिन्हें भुलाया नहीं जाना चाहिए। उनकी राजनीतिक यात्रा में हार भी थी, इंतजार भी था, संगठन के प्रति निष्ठा भी थी और वापसी का जज्बा भी। उनके निधन के साथ यह सफर अचानक थम गया। लेकिन गिरिडीह की चुनावी राजनीति में छठे स्थान से शुरू होकर राज्य सरकार के कैबिनेट तक पहुंची उनकी यात्रा लंबे समय तक याद की जाएगी। (IANS)



