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लिंचिंग खंड के रूप में यूं ही बदनाम नहीं झारखंड, वारदात के आंकड़े देते हैं इसकी गवाही

देश में भीड़ तंत्र के हाथों हत्या, जिंदा जला डालने, मारपीट, रेप, अमानवीय प्रताड़ना की घटनाओं का जिक्र हो तो सबसे पहले जिस राज्य का नाम आता है, वह है-झारखंड।

शंभु नाथ चौधरी Ranchi: देश में भीड़ तंत्र के हाथों हत्या, जिंदा जला डालने, मारपीट, रेप, अमानवीय प्रताड़ना की घटनाओं का जिक्र हो तो सबसे पहले जिस राज्य का नाम आता है, वह है-झारखंड। वर्ष 2014 के आसपास जब ऐसी वारदात के लिए ‘मॉब लिंचिंग’ टर्म का इस्तेमाल किया जाने लगा, तब विपक्षी पार्टियों के नेता झारखंड को ‘लिंचिंग खंड’ का नाम दिया करते थे।

इस राज्य में भीड़ हिंसा की लगातार होने वाली घटनाओं के आंकड़े भी इसकी तस्दीक करते हैं। झारखंड सरकार ने इसी साल विधानसभा के बजट सत्र के दौरान सीपीआई एमएल के विधायक विनोद सिंह के एक सवाल के जवाब में बताया था कि वर्ष 2016 से 2021 के बीच राज्य में मॉब लिंचिंग की 46 घटनाएं हुईं।

2022 की बात करें तो भीड़ हिंसा की तकरीबन एक दर्जन वारदात सामने आ चुकी हैं। जाहिर है, राज्य में ऐसी घटनाओं का बदस्तूर सिलसिला चला आ रहा है।

बीते छह अक्टूबर की रात बोकारो जिले के गोमिया प्रखंड अंतर्गत धवैया गांव में दर्जनों लोगों ने गांव के ही 45 साल के शख्स इमरान अंसारी की पीट-पीटकर हत्या कर दी। गांव वालों का आरोप था कि इस शख्स का गांव में दूसरे धर्म की एक महिला से नाजायज रिश्ते थे।

इस वारदात को लेकर गांव और आसपास के इलाकों में सांप्रदायिक तनाव की स्थिति बन गई। हालात नियंत्रित करने के लिए 300 से भी ज्यादा पुलिसकर्मियों की तैनाती से लेकर धारा 144 तक लागू करनी पड़ी। कुल 11 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।

3 अक्टूबर को झारखंड-छत्तीसगढ़ की सीमा पर स्थित गुमला जिला अंतर्गत जारी थाना क्षेत्र की डूमरटोली बस्ती में भीड़ ने गुमला निवासी 22 वर्षीय एजाज खान की पीट-पीटकर हत्या कर दी। उस पर लाठियों और धारदार हथियार से कई वार किए गए थे। मारे गए युवक पर छत्तीसगढ़ में बकरी चुराने का आरोप था। इस मॉब लिंचिंग के खिलाफ कुछ संगठनों ने कई दिनों तक जस्टिस फॉर एजाज हैशटैग से अभियान चलाया।

25 सितंबर की रात दुमका जिले के सरैयाहाट प्रखंड अंतर्गत असवारी गांव में भीड़ ने डायन का आरोप लगाकर एक परिवार की तीन महिलाओं सहित चार लोगों को भयावह तरीके से प्रताड़ित किया। इन चारों को जबरन मल-मूत्र पिलाया और उन्हें लोहे की गर्म छड़ों से दागा। दूसरे रोज पुलिस ने उन चारों को हॉस्पिटल में भर्ती कराया।

4 सितंबर की रात राजधानी रांची से 50 किलोमीटर सोनाहातू थाना क्षेत्र के राणाडीह गांव में सैकड़ों की भीड़ ने गांव की तीन महिलाओं को डायन करार देकर लाठियों और धारदार हथियारों से मार डाला। हद तो यह हमलावरों की भीड़ में मृतक महिलाओं में से एक का पुत्र भी शामिल था। दूसरे रोज पुलिस जब गांव में पहुंची तो सर्च अभियान के दौरान उसे ग्रामीणों के विरोध का सामना करना पड़ा।

इस साल फरवरी महीने में हजारीबाग के बरही में सरस्वती पूजा विसर्जन जुलूस के दौरान भीड़ ने रूपेश पांडेय नामक एक 17 वर्षीय किशोर को पीट-पीटकर मार डाला था तो इसकी गूंज पूरे देश में पहुंची थी। यह मामला संसद में भी उठा था।

इसके पहले जनवरी के पहले हफ्ते में सिमडेगा के कोलेबिरा थाना क्षेत्र अंतर्गत बेसराजरा बाजार में भीड़ ने संजू प्रधान नामक एक आदिवासी युवक को लकड़ी चोरी के आरोप में पहले तो जमकर पीटा और फिर बाद में उसे सरे बाजार लकड़ियों की चिता सजाकर उसे जिंदा जला दिया था।

इस मामले में एक दर्जन से ज्यादा लोग गिरफ्तार किये गये थे। मई महीने में गुमला जिले के भरनो थाना क्षेत्र में भीड़ ने 45 वर्षीय शमीम अंसारी को लाठी-डंडों से पीट-पीटकर सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतार दिया क्योंकि उन्होंने पेड़ काटने का विरोध किया था।

झारखंड सरकार ने मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर अंकुश के लिए बीते वर्ष दिसंबर में विधानसभा से एंटी मॉब लिंचिंग बिल भी पास कराया था, लेकिन बीते मार्च में राज्यपाल ने यह बिल कुछ तकनीकी आपत्तियों के साथ सरकार को लौटा दी। आपत्तियों के निराकरण के बाद यह बिल सरकार दुबारा पास कराएगी, तब राज्यपाल की मंजूरी के बाद यह कानून का रूप ले पाएगा।

इस विधेयक में मॉब लिंचिंग में मौत होने पर दोषी को उम्र कैद तथा पांच से 25 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। लिंचिंग के शिकार के इलाज का खर्च जुर्माने की राशि से दिया जाएगा। भीड़ हिंसा में किसी व्यक्ति के हल्का जख्मी होने पर भी आरोपियों को एक से तीन साल तक जेल या एक लाख से तीन लाख रुपये तक जुर्माना और गंभीर रूप से जख्मी होने की स्थिति में एक से 10 साल तक जेल या तीन से 10 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है।

इस विधेयक में दो या दो से अधिक लोगों द्वारा हिंसा को मॉबलिंचिंग के रूप में परिभाषित किया गया है। राज्यपाल रमेश बैस ने इसी बिंदू पर आपत्ति जताते हुए विधेयक लौटाया है। उन्होंने भीड़ को फिर से परिभाषित करने को कहा गया है।

संसदीय कार्यमंत्री आलमगीर आलम कहते हैं कि जिन बिंदुओं पर राजभवन को आपत्ति है, उन्हें दूर कर अगले सत्र में सरकार इस विधेयक को फिर से पारित कराएगी और कानून का रूप देगी। इस विधेयक में किसी के कारोबार या व्यापार का बहिष्कार करना, घर या आजीविका स्थल छोड़ने के लिए मजबूर करना, धर्म, वंश, जाति, लिंग जन्म स्थान, भाषा, लैंगिक, राजनैतिक संबद्धता और नस्ल के आधार पर हिंसा या परेशान करना और लिंचिंग के लिए उकसाने वाले को भी लिंचिंग के दोषी जैसी सजा जैसे कई प्रावधान किए गए हैं।

संसदीय कार्य मंत्री ने सदन को बताया कि मॉब लिंचिंग मामलों के त्वरित निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन करने पर सरकार विचार कर रही है।

झारखंड में मॉब लिंचिंग की घटनाओं को लेकर एस अली नामक एक शख्स ने झारखंड हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर रखी है। अली ने राज्य में म़ॉब लिंचिंग के जो आंकड़े जुटाए हैं, उसके मुताबिक 17 मार्च 2016 से 13 मार्च 2021 तक 42 लोगों की मॉब लिंचिग हुई है, जिसमें 23 की मौत हुई जबकि 19 गंभीर रूप से घायल हुए हैं। अली के मुताबिक साल 2017 में देशभर मे हो रही मॉब लिंचिंग की घटना को लेकर तहसीन पूनावाला सुप्रीम कोर्ट गए थे। उस मामले में झारखंड को भी पार्टी बनाया गया था।

उसी साल झारखंड हाई कोर्ट में रंजीत उरांव ने भी ऐसी ही घटनाओं पर हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की। उसके बाद कोर्ट ने कहा कि चूंकि मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है, ऐसे में वहां से जो डायरेक्शन आएगा, उसे राज्य में लागू करना होगा।

झारखंड हाईकोर्ट के एडवोकेट योगेंद्र यादव कहते हैं कि राज्य में भीड़ हिंसा की प्रवृत्ति बेहद खतरनाक है। अदालतों में आने वाले ऐसे मामलों के पीछे अंधविश्वास, प्रेम प्रसंग, जातीय एवं धार्मिक विद्वेष, आपसी रंजिश जैसी वजहें प्रमुख होती हैं।

ऐसे मामलों की जांच के लिए स्पेशल सेल बनाने, फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित करने जैसे कदम उठाने के साथ जरूरी है कि इस प्रवृत्ति पर रोक के लिए व्यापक जन जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए।(IANS)

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