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Jharkhand: दो दशक पहले खारिज हो चुकी डोमिसाइल पॉलिसी पर हेमंत सरकार ने लगाया दांव

Ranchi: झारखंड डोमिसाइल पॉलिसी (Jharkhand Domicile Policy) को लेकर एक बार फिर से सुर्खियों में है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन (Chief Minister Hemant Soren) ने कैबिनेट की बैठक में 1932 के खतियान (Khatian of 1932) पर नियोजन नीति और ओबीसी को झारखंड में 27 प्रतिशत आरक्षण पॉलिसी ड्राफ्ट को मंजूरी देकर एक नई चर्चा छेड़ दी है। राज्य में डोमिसाइल के लिए नयी पॉलिसी (new policy) के ड्राफ्ट को सरकार ने मंजूरी दे दी है।

यह बिल के विधानसभा में पारित कराये जाने और राज्यपाल की मंजूरी के बाद कानून का रूप लेगा। इस पॉलिसी में झारखंड का स्थानीय निवासी (domicile) होने के लिए 1932 के खतियान की शर्त लगायी गयी है। इस पॉलिसी पर पूरे झारखंड में बहस छिड़ी है।

सरयू राय ने उठाया सवाल

सरयू राय ने ट्वीट कर कहा “हेमंत सोरेन ने गत विधानसभा में कहा कि 1932 खतियान आधारित स्थानीयता संभव नहीं। अब इसे लागू कर दिया। दो माह में ऐसा क्या हुआ? हाईकोर्ट के पांच जजों का निर्णय 2002 में रहते हुए यह 9 वीं अनुसूची में कैसे शामिल होगा? जबकि आधा झारखण्ड इसकी परिधि में नहीं आता। नीयत सही है, तो सर्वेक्षण करा लें।”

1932 खतिहान के अनुसार झारखंड के मंत्री सरकार में रहने लायक नहीं: निशिकांत

इधर गोड्डा के भाजपा सांसद निशिकांत दूबे ने भी एक के बाद एक ट्विट कर हेमन्त सोरेन के 1932 के खतियान लागू करने की नीयत पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। उन्होंने लिखा है “पूरा पलामू कमिश्नरी, कोल्हान, संथालपरगना के अधिकतर हिस्से, धनबाद 1932 के सर्वे में चिन्हित नहीं है, ज़्यादातर अनुसूचित जाति के लोगों के पास घर भी नहीं है, 1947 में बँटवारा के बाद लोग यहाँ आकर बसे। झारखंड के 3.50 करोड़ लोगों में 2.50 करोड़ यानि दो तिहाई लोगों के लिए क्या नीति?

एक और ट्वीट में उन्होंने लिखा “1932 खतिहान के अनुसार झारखंड के मंत्री चम्पई जी, बन्ना जी, मिथिलेश जी, हफीजूल जी, आलमगीर जी, जोबा जी कोई भी सरकार में रहने लायक़ नहीं है, सरायकेला, मधुपुर 1956 में हमारे पास आया, इसके पहले यह उड़ीसा, बंगाल का हिस्सा था, पाकुड़ का सर्वे नहीं हुआ, शहर में रहने वाले कोई भी 1932 के खतियानी नहीं”

राज्य के लिए पॉलिसी अहितकर : पूर्णिमा नीरज

इस संबंध में सरकार के घटक दल कांग्रेस के विधायकों ने अहितकर बताया। कांग्रेस विधायक पूर्णिमा नीरज सिंह ने कहा कि इस पॉलिसी से झारखंड फिर से जलेगा। यह जरूरी नहीं कि कैबिनेट से पास प्रस्ताव विधानसभा से भी पास हो। कोर्ट में टिकने लायक प्रस्ताव सरकार को लाना चाहिए। सभी वर्ग के लोगों की भावनाएं बनी रहे, ऐसा प्रयास सरकार करे।

1932 का खतियानी कोल्हान के लिए घातक: गीता कोड़ा

कांग्रेस की सांसद गीता कोड़ा ने 1932 के खतियानी को कोल्हान के लिए घातक बताया है। गीता ने कहा है कि इस निर्णय से झारखंड के कोल्हान क्षेत्र की आम जनता स्थानीय अर्थात झारखंडी होने से वंचित रह जायेगी। उन्हें अपनी ही जन्मस्थली पर स्थानीय का दर्जा नहीं मिल सकेगा। बल्कि, इस क्षेत्र की जनता प्रवासी बनकर रह जायेगी। कोल्हान में सर्वे सेटलमेंट 1964, 65 और 70 में किया गया था। ऐसी परिस्थिति में 1932 के खतियान को स्थानीयता का आधार बनाना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। ऐसे में सरकार तत्काल इस प्रस्ताव पर पुनर्विचार करे।

इस संबंध में राज्य के बुद्धिजीवियों के मंतव्य इस प्रकार हैं।

दूरगामी परिणामों की भी सोचे सरकार: श्रीदेव सिंह

बिटोसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीदेव सिंह ने राज्य में 1932 का खतियान लागू करने के हेमंत सरकार के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि कोई भी राजनीतिक दल जो भी स्टैंड लेना चाहता है उसके लिए वह स्वतंत्र है लेकिन उसके द्वारा लिये गये निर्णयों के क्या दूरगामी परिणाम होंगे, इसपर भी उसे सोचना चाहिए। धनबाद, पूर्वी सिंहभूम और पाकुड़ जैसे जिले 1932 के बाद झारखंड का हिस्सा बने। इन जिलों के जो निवासी हैं वे खतियान धारक नहीं होंगे। राज्य में जो लोग बाहर से आकर कामकाज कर रहे हैं या फिर जो बिजनेस कर रहे हैं उन्हें सरकार के खतियान के फैसले से कोई खास असर नहीं पड़ेगा लेकिन जो राज्य में रहने वाला लोवर मिडिल क्लास और मिडिल क्लास है वह इस फैसले से प्रभावित होगा जबकि इस वर्ग की राज्य को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका है। सरकार ने जो फैसला लिया है वह ठीक है लेकिन लंबे समय से जो लोग यहां रह रहे हैं उनके साथ अन्याय न हो इस दिशा में भी सरकार को सोचना चाहिए।

सर्वथा दोषपूर्ण है डोमिसाइल पॉलिसी : डॉ जेबी पांडेय

झारखंड में 1932 की डोमिसाइल पॉलिसी लागू करने के कैबिनेट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए रांची विश्वविद्यालय के पीजी हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ जेबी पांडेय ने कहा कि एक लंबे संघर्ष के बाद 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य अस्तित्व में आया। झारखंड निर्माण का सपना था झारखंडवासियों का चतुर्दिक और संपूर्ण विकास लेकिन यहां के नेताओं के आपसी कलह के कारण वह सपना चूर-चूर हो गया। झारखंड में कई बार आवासीय नीति बनी लेकिन दोष पूर्ण रही और तुष्टिकरण की नीति पर केन्द्रित रही। वर्ष 1932 को आधार बनाकर जो नीति आयी है, वह सर्वथा दोषपूर्ण है। क्योंकि, इसमें बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय का ख्याल नहीं रखा गया है। आवासीय नीति ऐसी बने जो सर्व जन समावेशी हो। मेरी दृष्टि में झारखंडी केवल वे ही नहीं हैं, जिनका नाम 1932 के खतियान में है बल्कि वे भी हैं जिनका नाम 1932 के खतियान में नहीं है लेकिन जो तन मन-धन से झारखंड का विकास चाहते हैं और विकास में लगे हैं।

क्या है 1932 के खतियान की शर्त

झारखंड में झारखंडी कहलाने के लिए अब वर्ष 1932 में हुए भूमि सर्वे के कागजात की जरूरत होगी। इस कागजात को खतियान कहते हैं, जो लोग इस कागजात को पेश करते हुए साबित कर पायेंगे कि इसमें उनके पूर्वजों के नाम हैं, उन्हें ही झारखंडी माना जायेगा। झारखंड का मूल निवासी यानी डोमिसाइल का प्रमाण पत्र इसी कागजात के आधार पर जारी किया जायेगा।

जिन लोगों के पूर्वज 1932 या उससे पहले से झारखंड की मौजूदा भौगोलिक सीमा में रह रहे थे लेकिन भूमिहीन होने की वजह से उनका नाम भूमि सर्वे के कागजात (खतियान) में नहीं दर्ज हुआ है, उनके झारखंडी होने की पहचान ग्राम सभाएं उनकी भाषा, रहन-सहन, व्यवहार के आधार पर करेगी। ग्राम सभा की सिफारिश पर उन्हें झारखंड के डोमिसाइल का सर्टिफिकेट जारी किया जायेगा।

झारखंड की मौजूदा भौगोलिक सीमा में जो लोग 1932 के बाद आकर बसे हैं, उन्हें या उनकी संतानों को झारखंड का डोमिसाइल यानी मूल निवासी नहीं माना जायेगा। ऐसे लोग जिनका जन्म 1932 के बाद झारखंड में हुआ, पढ़ाई-लिखाई भी यहीं हुई, जिन्होंने इसके बाद यहां जमीन खरीदी या मकान बनाये, उन्हें भी झारखंडी नहीं माना जायेगा। उनका डोमिसाइल सर्टिफिकेट नहीं बनेगा।

जिन लोगों को झारखंडी होने का प्रमाण पत्र यानी डोमिसाइल सर्टिफिकेट जारी होगा, उन्हें राज्य सरकार की तृतीय और चतुर्थ वर्ग की नौकरियों में आरक्षण मिलेगा। राज्य की सरकार इन पदों पर नियुक्ति के लिए जो पॉलिसी बनायेगी, उसके लिए डोमिसाइल की शर्त जरूरी तौर पर लागू की जा सकती है या इसके आधार पर प्राथमिकता दी जा सकती है।

झारखंड की भौगोलिक सीमा में वर्षों-दशकों से रह रहे जिन लोगों को 1932 का कागज न होने पर झारखंडी होने का प्रमाण पत्र यानी डोमिसाइल सर्टिफिकेट नहीं मिलेगा। उनके लिए स्थानीय संस्थानों में दाखिले और तृतीय एवं चतुर्थ वर्ग की नौकरियों के लिए मौके बेहद सीमित होंगे। सरकारी योजनाओं में ठेकेदारी और कई तरह की अन्य सहूलियतों के लिए भी सरकार डोमिसाइल सर्टिफिकेट की शर्त लगा सकती है। भारत के संविधान के मूल अधिकारों के अनुसार किसी भी व्यक्ति के जीवन यापन, जमीन-मकान खरीदने, यहां बसने, व्यापार करने सहित किसी अन्य गतिविधि पर कोई रोक नहीं लगायी जा सकती।

एक बार फिर कोर्ट में खारिज हो सकती है पॉलिसी

उल्लेखनीय है कि झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के कार्यकाल में 2002 में भी 1932 के खतियान पर आधारित डोमिसाइल पॉलिसी लायी गयी थी। इसे झारखंड हाई कोर्ट में चुनौती दी गयी थी। तत्कालीन चीफ जस्टिस वीके गुप्ता की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने इसे असंवैधानिक बताते हुए निरस्त कर दिया था।

इस बार भी अगर इसे कोर्ट में चुनौती दी गयी तो हाई कोर्ट के 2002 के फैसले को नजीर मान कर इसे खारिज किया जा सकता है लेकिन झारखंड सरकार के कैबिनेट में पारित प्रस्ताव के अनुसार, इस पॉलिसी का बिल विधानसभा में पारित करने के बाद केंद्र के पास भेज कर इसे संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने का आग्रह किया जायेगा। नौवीं अनुसूची में जब कोई एक्ट शामिल हो जाता है, तो उसे न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। अब केंद्र सरकार पर निर्भर करेगा कि वह इसे नौवीं अनुसूची में शामिल करती है या नहीं।

1932 का खतियान लागू करने के फैसले का कानूनी आधार नहीं : आनंद प्रकाश

राज्य में 1932 का खतियान लागू करने के झारखंड कैबिनेट के फैसले के संबंध में रांची सिविल कोर्ट के अधिवक्ता आनंद प्रकाश ने कहा कि इस मामले का कानूनी स्टेटस नहीं है। अगर यह लागू हो जायेगा तब कोर्ट में जायेगा और वहां से सौ फीसदी निरस्त हो जायेगा।

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