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मछली जल की रानी है.. जीवन उसका पानी है हाथ लगाओ डर……

कोरोना काल के बाद एक बार फिर से शहर के सड़कों पर स्कूली बस-वैन और बच्चों से भरा ऑटो तो दौड़ने लगा है लेकिन साथ ही साथ कुछ ऐसी भी तस्वीर अब देखने को मिल रही है जो 70-80 का दशक याद दिला दे रही है।

Deoghar: कोरोना काल के बाद एक बार फिर से शहर के सड़कों पर स्कूली बस-वैन और बच्चों से भरा ऑटो तो दौड़ने लगा है लेकिन साथ ही साथ कुछ ऐसी भी तस्वीर अब देखने को मिल रही है जो 70-80 का दशक याद दिला दे रही है।

तब अक्सर पीठ पर बसता और रोते हुए किसी के हाथ में टंगे स्कूल की ओर जाते हुए बच्चे दिख जाते थे कुछ ऐसा ही नजारा एक बार फिर देखने को मिल रहा है। पूरा-पूरा मिले या ना मिले, लेकिन स्कूल जाने के नाम पर रोते बच्चे जरूर दिख रहे हैं।

दो दिन पहले का वाक्या है सरकार भवन के पास देवघर शहर का एक चर्चित स्कूल बस हर दिन की तरह वहां आकर खड़ा हुआ। मां और पिता दोनों एक बच्चे को लेकर स्कूल बस में बिठा दिए लेकिन अचानक बच्चा रोने लगा कि मेरी मां कहां है, कहां है मेरी मां और कह कर वह बस से नीचे उतर गया। अचानक इतना तेजी से यह सब कुछ हुआ कि कोई कुछ समझ नहीं पाया। हालांकि कोई दुर्घटना नहीं हुई लेकिन स्कूल जाने से नाम पर आनाकानी करने वाले ऐसे कई बच्चे इन दिनों दिख रहे हैं। लेकिन आंगनबाड़ी का रास्ता कोरोना काल में भूल चुके नीचे तबके के बच्चे को दोबारा आंगनबाड़ी तक लाने की नई पहल की गई है।

जी हां इन दिनों आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों को कॉपी-किताब के बदले गीतों के माध्यम से पढ़ाई लिखाई से जोड़ने का काम किया जा रहा है। बच्चों को मछली जल की रानी है जीवन उसका पानी है हाथ लगाओ डर जाएगी बाहर निकालो …..जैसे लुभावन गीतो को सिखाया जा रहा है। बच्चे पूरी तरह इन गीतों को  सुनकर झूम रहे हैं और हर दिन आंगनबाड़ी पहुंच रहे हैं।

आंगनबाड़ी केंद्रों की सेविकाओं की माने तो फिलहाल इस पहल का सकारात्मक पहलू है। परिणाम सामने दिख रहा है। बच्चे खुशी-खुशी आंगनबाड़ी केंद्र पहुंच रहे हैं। सेविकाओं को उम्मीद है धीरे धीरे बच्चों को पढ़ाई से विधिवत जोड़ दिया जाएगा। निश्चित तौर पर पहल एक दिन जरूर रंग लाएगी।

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