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कपड़े के कारोबार पर कोरोना वायरस का कहर

Edited By: Nidhi Jaiswal

नई दिल्ली।

देश में त्योहारों का सीजन शुरू हो गया है, लेकिन कपड़ों  की दुकानों पर त्योहारी सीजन जैसी रौनक नहीं है। कपड़ों की सुस्त मांग और मजदूरों व कारीगरों की कमी के चलते गार्मेट का करोबार यानि Textile Business अभी भी पटरी पर नहीं लौटा है। कारोबारियों के मुताबिक कोरोना काल में घर लौटे 50 फीसदी मजदूर व कारीगर अब तक वापस नहीं आए हैं।

देश की राजधानी दिल्ली स्थित गांधीनगर एशिया का सबसे बड़ा रेडीमेड गार्मेंट का होलसेल मार्केट है, जहां की चहल-पहल कोरोना काल में गायब हो चुकी है।

कारोबारी बताते हैं कि त्योहारी सीजन शुरू होने से पहले ही देशभर से ऑर्डर मिलने लगते थे, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो रहा है। वहीं, मजदूरों और कारीगरों की कमी के चलते गांधीनगर की गार्मेट फैक्टरियों में कपड़े भी कम बन रहे हैं।

कारोबारियों ने बताया कि कोरोना काल में गांव लौटे मजदूर आवागमन की सुविधा नहीं होने के कारण लौट नहीं पा रहे हैं. मजदूरों और कारीगरों के अभाव में कपड़े नहीं बन रहे हैं. गांवों से वापस आने के लिए कारीगर पैसे मांग रहे हैं, लेकिन पैसे भेजने पर भी समय से उनके आने की उम्मीद नहीं है।

कुछ ऐसा ही आलम पंजाब के लुधियाना के गार्मेट उद्योग का भी है। कपड़ा कारोबारी मजदूर और कारीगरों की कमी के चलते सर्दी के सीजन की तैयारी नहीं कर पा रहे हैं।

कारोबारी बताते हैं कि गर्मी के सीजन के कपड़ों की मांग तो कोरोना की भेंट चढ़ गई, अब बाजार खुल गए हैं और आगामी सर्दी के सीजन की मांग को देखते हुए उसकी तैयारी शुरू करनी है। मगर, मजदूरों व कारीगरों की कमी के चलते काम जोर नहीं पकड़ रहा है.

रेडीमेड गार्मेट कारोबारी बताते हैं कि इस समय लोग बहुत जरूरी कपड़े जैसे अंडर गार्मेट, लोअर आदि ही खरीद रहे हैं। कारोबारी बताते हैं कि शादी-पार्टी आदि का आयोजन नहीं होने से कपड़ों की मांग सुस्त है।

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