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डीजल कि बढ़ी कीमत का असर अब आपके किचन बजट पर, ट्रांसपोर्टर्स ने बढ़ाया माल भाड़ा

डीजल की कीमत में लगातार हो रही बढ़ोतरी के कारण देशभर के ट्रांसपोर्टर माल भाड़े में बढ़ोतरी करके डीजल की कीमत में हुई बढ़ोतरी का सारा भार उपभोक्ताओं पर डालने लगे हैं।

नई दिल्ली: पेट्रोल और डीजल की कीमत में हुई बढ़ोतरी के कारण आम लोगों के लिए स्कूटर और कार जैसी गाड़ी चलाना तो महंगा हो ही गया है, इसकी वजह से किचन का बजट भी बिगड़ने लगा है। डीजल की कीमत में लगातार हो रही बढ़ोतरी के कारण देशभर के ट्रांसपोर्टर माल भाड़े में बढ़ोतरी करके डीजल की कीमत में हुई बढ़ोतरी का सारा भार उपभोक्ताओं पर डालने लगे हैं। 

सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियां इस साल अभी तक 58 बार पेट्रोल और डीजल की कीमत में बढ़ोतरी कर चुकी हैं। जिसके कारण राजधानी दिल्ली में 2021 में अभी तक पेट्रोल में प्रति लीटर 14.84 रुपये की और डीजल में प्रति लीटर 15.06 रुपये की बढ़ोतरी हो चुकी है। सिर्फ 4 मई से लेकर आज तक के 57 दिनों में ही पेट्रोल की कीमत में राजधानी दिल्ली में 8.51 रुपये प्रति लीटर की और डीजल में 8.35 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हो चुकी है। 

कीमत में हुई इस बढ़ोतरी के कारण आम लोगों के लिए अपने टू व्हीलर या फोर व्हीलर में पेट्रोल या डीजल भरवाना तो महंगा हो ही गया है, ट्रांसपोर्ट की लागत भी इसकी वजह से काफी बढ़ गई है। देश के कई हिस्सों में डीजल प्रति लीटर 100 रुपये के करीब पहुंच गया है, तो राजस्थान के श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ में डीजल की कीमत 102 रुपये प्रति लीटर के स्तर को भी पार कर गई है। देश में सबसे महंगा डीजल अभी श्रीगंगानगर में बिक रहा है, जहां इसकी कीमत प्रति लीटर 102.66 रुपये है। 

ऐसी स्थिति में देश के सामान्य उपभोक्ताओं कि परेशानी इसलिए भी बढ़ गई है, क्योंकि देशभर के ट्रांसपोर्टर्स में माल भाड़े में 15 से 20 फीसदी तक की बढ़ोतरी कर दी है। माल भाड़े में पिछले एक साल के अंदर चौथी बार बढ़ोतरी की गई है। इसकी वजह से दूसरे शहरों से आने वाले सामान की कुल लागत भी तुलनात्मक तौर पर बढ़ गई है। इसकी वजह से आम उपभोक्ताओं को हर चीज पहले की तुलना में अधिक कीमत पर खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। 

जानकारों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल जिस गति से छलांग लगा रहा है, उसकी वजह से भारत में अभी पेट्रोल और डीजल की कीमत में तत्काल राहत मिलने की कोई उम्मीद नहीं है। अगर जुलाई के महीने में तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक और उसके सहयोगी देश कच्चे तेल के उत्पादन में कटौती करना बंद करके वैश्विक जरूरत के मुताबिक उत्पादन शुरू करते हैं, तभी कच्चे तेल की कीमत में कमी आने की उम्मीद की जा सकती है। इसके साथ ही कच्चे तेल की कीमत में यदि कमी आई तभी भारतीय उपभोक्ताओं को भी कुछ राहत मिल सकती है। 

जब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल में तेजी का रुख बना रहेगा, तब तक भारत में न तो सरकारी ऑयल कंपनियां पेट्रोल और डीजल की कीमत में राहत देंगी और ना ही ट्रांसपोर्टर्स अपने माल भाड़े में किसी भी तरह की कटौती करेंगे। इसका परिणाम अंततः आम उपभोक्ताओं को महंगा सामान खरीद कर ही भुगतना पड़ेगा। 

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