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मिल्खा सिंह: एक महान जुनूनी धावक की कहानी

आखिर कौन जानता था कि महज एक गिलास दूध के लिए सेना की दौड़ में शामिल होने वाला नवयुवक एक दिन दुनिया का महान धावक बनेगा! लेकिन यह बात सच साबित हुई। मिल्खा सिंह ने इतिहास रच कर दिखाया।

नई दिल्ली: ‘मैं एक जुनूनी खिलाड़ी हूं।’ मिल्खा सिंह अक्सर यह बात दोहराते थे। अब उनका जुनून कहानियों के रूप में हमारे बीच रहेगा। मिल्खा की कहानियां हमें महान कार्य के लिए हमेशा प्रेरित करती रहेंगी। आखिर कौन जानता था कि महज एक गिलास दूध के लिए सेना की दौड़ में शामिल होने वाला नवयुवक एक दिन दुनिया का महान धावक बनेगा! लेकिन यह बात सच साबित हुई। मिल्खा सिंह ने इतिहास रच कर दिखाया।

मिल्खा की रफ्तार से दुनिया पहली बार कार्डिफ राष्ट्रमंडल खेलों में परिचित हुई। वहीं मिल्खा ने तत्कालीन विश्व रिकॉर्ड धारक मैल्कम स्पेंस को 440 गज की दौड़ में मात दी थी और स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया था। मिल्खा सिंह को ताउम्र वह दिन याद रहा।

एक जगह उन्होंने कहा था कि जान-बूझकर मैंने उस दिन अधिक नहीं खाया था, क्योंकि प्रदर्शन पर उसका कोई असर न पड़े। मिल्खा कड़ी प्रतिस्पर्धा में भी शांत बने रहते थे। स्वयं से शक्ति अर्जी कर रहे होते थे। लेकिन उस दिन साथियों को लगा कि मिल्खा तनाव में हैं। यही सोचकर उनके कोच डॉक्टर हावर्ड पास आकर बोले कि आज की दौड़ या तो तुम्हें कुछ बना देगी या बर्बाद कर देगी। अगर तुम मेरी टिप्स का पालन करोगे, तो तुम माल्कम स्पेंस को हरा दोगे। तुममें ऐसा कर पाने की क्षमता है।

उस दिन वही हुआ। मिल्खा सिंह ने इतिहास रचा। उनके साथियों ने मिल्खा को कंधे पर उठाकर पूरे स्टेडियम का चक्कर लगाया। वह किसी भारतीय के नाम राष्ट्रमंडल खेलों में पहला स्वर्ण पदक था। भारत का झंडा सबसे ऊपर लहरा रहा था। एक इंटरव्यू में मिल्खा सिंह ने कहा था कि उस जीत के बाद मुझसे कहा गया था कि मैं इनाम में क्या लेना चाहूंगा? तब मेरी समझ में कुछ नहीं आया। मुंह से यह बात निकली कि इस जीत की खुशी में पूरे भारत में छुट्टी कर दी जाए। वही हुआ। मैं जिस दिन भारत पहुंचा तो पूरे देश में छुट्टी घोषित की गई।

मिल्खा सिंह 20 नवंबर,1929 को गोविंदपुरा में पैदा हुए थे, जो अब पाकिस्तान में है। वह दौर आजादी के संघर्ष का था। जैसे-जैसे मिल्खा बड़े हो रहे थे, आजादी की लड़ाई भी तेज होती जा रही थी। आखिरकार 1947 में देश आजाद हुआ तो विभाजन की अफरा-तफरी मच गई। चारो तरफ हिंसा फैल गई। उस हिंसा में मिल्खा ने अपने माता-पिता को खो दिया।  
इसके बाद के शरणार्थी जीवन ने मिल्खा को सख्त बना दिया। उन्होंने अपने जीवन में कुछ बेहतर कर गुजरने की ठानी और भारतीय सेना में शामिल हुए। वहीं अपने कौशल को निखारा और उनके प्रभावशाली करियर की नींव पड़ी। वे स्वभाव से सरल थे, लेकिन मैदान पर अपने प्रतिद्वंद्वियों को ध्वस्त कर देते थे। बतौर धावक मिल्खा सिंह ने कई रिकॉर्ड बनाये और पदक जीते।

एशियाई खेलों में चार स्वर्ण पदक और राष्ट्रमंडल खेलों में एक स्वर्ण पदक मिल्खा के नाम है। उनकी रफ्तार की दुनिया दीवानी थी। इसलिए वे ‘फ्लाइंग सिख’ के नाम से मशहूर हुए और दुनिया के हर कोने से प्यार और समर्थन प्राप्त किया।

हालांकि, एक बात मिल्खा सिंह को हमेशा परेशान करती रही। वो यह कि काश रोम ओलिंपिक में पीछे मुड़कर न देखा होता। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, “मेरी आदत थी कि मैं हर दौड़ में एक दफा पीछे मुड़कर देखता था। रोम ओलिंपिक में दौड़ बहुत नजदीकी था और मैंने जबरदस्त ढंग से शुरुआत की थी। हालांकि, मैंने एक दफा पीछे मुड़कर देखा और शायद यहीं मैं चूक गया। इस दौड़ में कांस्य पदक विजेता का समय 45.5 था और मिल्खा ने 45.6 सेकंड में दौड़ पूरी की थी।”

महान धावक मिल्खा सिंह पर एक फिल्म बनी है और उन्होंने एक किताब भी लिखी है। इस संबंध में मिल्खा ने स्वयं लिखा है कि मैं न तो कोई लेखक हूं और न ही रचयिता, बल्कि एक जुनूनी खिलाड़ी हूं, जिसने इस किताब में अपना दिल खोलकर रख दिया है। किताब का शीर्षक हैः भाग मिल्खा भाग।

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