Written By: उमेश कुमार

देवघर: स्काटिश इतिहासकार विलियम डेलरिंपल कहते हैं कि विरासत को बिसरा कर किया गया ‘विकास’ एक भ्रम है। दुर्भाग्यवश धरम-करम की नगरी देवघर (Deoghar) इसी भ्रम को जी रही है। ‘विकास’ की सड़क पर सरपट दौड़ती-हांफती इस नगरी ने अपने आस-पास जमाने से खड़ी अतीत की मौन निशानियों की तरफ से शायद आंखें मूंद ली है।


एक तरफ स्थानीय इतिहास से अनजान वातानुकूलित चैंबरों में बैठ कर शहर की सूरत संवारने का पट्टा निकालने वाले अफसरान हैं तो दूसरी ओर एक तयशुदा वक्त में ‘प्रोजेक्ट’ पूरा करने के जबरदस्त तनाव से गुजरते पेशेवर ठीकेदार। बीच में ठहरा, ठिठका और ठगा सा इतिहास एवं इतिहास-बोध। ऐसे में मुद्दतों से मुश्किल परिस्थितियों के बीच दम साधे खामोश पड़ी विरासतों को धराशायी होने से भला कौन रोक सकता है!

इस क्रम में स्थानीय जलसार तट पर टिकी चाला शैली के मंदिर का मौजूदा सूरते-हाल किसी भी विरासत प्रेमी को आहत कर सकता है। बंगाल की प्रसिद्ध ‘चाला शैली’ के देवालयों की तर्ज पर चूने-सुर्खी से बनी इस विरासत के आजू-बाजू ‘पेबर्स’ और ‘रेलिंग’ लगाने के क्रम में ऐसी छेड़छाड़ की गई है कि गत दिनों इसका अगला हिस्सा भरभरा कर गिर पड़ा! नाथ साधुओं के समय की गवाही देने वाली यह विरासत एक सदी की मौसमी चुनौतियों को सह गई,लेकिन ‘विकास’ और ‘सौंदर्यीकरण’ के नाम पर अपनी देह में घुसी लोहे की खोखली सी निर्ममता को नहीं सह सकी।

‘प्रसाद योजना’ के तहत जलसार के तीरे-तीरे कराए जा रहे ‘डेवलपमेंट’ का यह एक नितांत त्रासद पहलू है। अभी कुछ बरस पहले (21 मई,2016 ई.) मलूटी स्थित चाला शैली के तमाम मंदिरों का जीर्णोद्धार कराने वाले ‘आई टी आर एच डी’ के राज्य प्रमुख एवं पुरातत्व विशेषज्ञ श्रीदेव सिंह जी इन पंक्तियों के लेखक के आग्रह पर जलसार पहुंचे थे। इस विरासत का बारीकी से निरीक्षण करते हुए उन्होंने बताया था कि मलूटी में तो अधिकतर ‘तीन चाला'(ढालुवां छत) के मंदिर हैं, लेकिन यह तो ‘चार चाला’ का एक अपेक्षाकृत छोटा,पर दुर्लभ देवालय है। उन्होंने यह भी जोड़ा था कि यह करीब 300 सौ साल पुरानी विरासत है जो प्राकृतिक मसालों और ‘लखौरी ईंटों’ से बनी है जिसमें शंक्वाकार छत के नीचे चार द्वार और चार आवरण हैं।
पुरातत्व के जानकार श्री देव सिंह जी ने इसे ‘मध्यकालीन विरासत’ के रूप में परिभाषित किया था। बहरहाल, समय का सितम झेलते-झेलते यह विरासत ऐसे भी दरकने ही लगी थी। लेकिन,इसकी बूढ़ी हड्डियों में अभी जान बाकी थी और भीत की रेखाओं की कलात्मकता भी बरकरार थी। अलबत्ता,इसके गर्भगृह में कोई विग्रह या प्रतीक मेरे देखने में नहीं आया था। पहले कभी कुछ रहा हो तो मुझे पता नहीं भाई।
मुझे बस इतना पता है कि जलसार की कुदरती आबोहवा में यह विरासत अपने दर्द और दरकन को परे रखकर आने-जाने वालों से हंसती-बतियाती रहती थी, लेकिन ‘विकास’ के बुडडोजर ने अब इसका मुंह ही तोड़ दिया है…
(लेखक: उमेश कुमार, सचिव, झारखण्ड शोध संस्थान, देवघर)



