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महंगाई पर अंकुश देश और देशवासियों दोनों के हित में आवश्यक …..

स्पष्ट है कि महंगाई रूपी डकैत ने समाज के विभिन्न वर्गों को एक ही साथ कई रूपों में लूटने का काम किया है।

(Written by: प्रोफेसर (डाॅ) नागेश्वर शर्मा)

देवघर के पेट्रोल पम्प पर भी पेट्रोल 100 रूपये लीटर से उपर बिकना शुरू हो गया। आम आदमी बेलगाम बढ़ती कीमतों के बोझ तले कराह रहा है। दवाइयाँ भी महंगाई का अपवाद नहीं है।

विगत एक साल में दवाई की कीमतों में वृद्धि ने क्रोनिक पेसेंट (chronic patient) के नाक दम भर रखा है। समान्यतः प्रयोग में आने वाली दवाइयां जैसे- पैन -40 , विटामीन ए-जड, पैरासिटामाॅल ,एन्टीबायोटिक्स आदि की कीमतों में इजाफा होने के कारण लोगों की परेशानी बढी है। स्पष्ट है कि महंगाई रूपी डकैत ने समाज के विभिन्न वर्गों को एक ही साथ कई रूपों में लूटने का काम किया है।

महंगाई पर विरोधाभासी खबरें :

थोक मूल्य आधारित महंगाई अगस्त (2021) में मामूली रूप से बढ़ कर 11. 39 प्रतिशत हो गयी। थोक मूल्य आधारित महंगाई अगस्त में बढ़ी और लगातार पांचवें महीने दोहरे अंकों मे रही। अगस्त (2020) में यह 0.41प्रतिशत थी। थोक महंगाई में एक वर्ष में करीब 11 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी। वाणिज्य और उद्धोग मंत्रालय के अनुसार अगस्त 2021 में थोक महंगाई दर के वढ़ने की वजह मुख्य रूप से पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले गैर- खाद्ध वस्तुओं , खनिज तेलों , कच्चे पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस,खाद्ध उत्पादों; वस्त्रों आदि की कीमतों में हुई वृद्धि है। खाद्ध पदार्थों की महंगाई लगातार चौथे महीने कम हुई। जुलाई में शून्य के मुकाबले अगस्त में यह – 1.29 प्रतिशत थी।

एक दूसरी खबर 13 अक्टूबर ,2021 की है। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी खबर ।माध्यम है- एजेंसियां, नयी दिल्ली । शीर्षक है, खुदरा महंगाई पांच माह के नीचले स्तर पर घट कर 4 .35 पर पहुंची। 13 अक्टूबर को जारी आधिकारिक आंकडों के अनुसार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक( सीपीआइ)आधारित महंगाई अगस्त (2021)में 5.3 प्रतिशत तथा सितम्बर ,2020 में 7. 27 %थी । इससे पहले खुदरा महंगाई अप्रैल2021 में4.23 प्रतिशत थी । राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एन एस ओ) के आंकडो के अनुसार, खाद्ध वस्तुओं की महंगाई दर इस साल सितम्बर में नरम होकर 0.68% रही। यह पिछले महीने 3.11%के मुकाबले काफी कम है।

आंकडे बताते हैं कि खुदरा महंगाई लगातार तीसरे महीने भारतीय रिजर्व बैंक के द्वारा तय आदर्श सीमा दो से छह प्रतिशत के दायरे में रही। मैं एक मामूली जानकारी वाला अर्थशास्त्री हूं। जो थोडी बहुत अर्थशास्त्र की गुत्थी समझता हूं ,उस आधार पर यह तो कह सकता हूं कि दोनों प्रतीवेदन एक दूसरे से मेल नहीं खाते हैं । थोक मूल्य सूचकांक में खाद्ध और गैर-खाद्ध दोनों वस्तुएँ सम्मिलित होती हैं और विगत एक साल में शायद ही आम जनों के उपभोग में आने वाली किन्हीं वस्तुओं की कमतें घटी हो, तब खुदरा महंगाई दर में कमी कैसे आ गयी ।

अर्थशास्त्रियों द्वारा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में आखिर कौन सी वस्तुएँ सम्मिलित की गयी, और किस वर्ष को आधार वर्ष एवं सूचकांक वर्ष के रूप में चुना गया कि खुदरा महंगाई दर मे उन्हें कमी दिखने लगी ।अर्थशास्त्री ऐनक दिखाने वाला होता है । अत:उन्हें अपना ऐनक धुमिल न रख कर साफ रखना चाहिए ताकि तस्वीर साफ आए और उचित नीति बनाई जा सके।

स्फिती रूपी डकैत के लूट का दुष्प्रभाव :

अब स्फिती के दुष्परिणामों की चर्चा करेंगे ।स्फिती के परिणाम अर्थव्यवस्था की गतिविधियों से जुड़े होते हैं। स्फिती की स्थिति के अनुसार ही रिजर्व बैंक ऑफ इन्डिया मौद्रिक नीति तय करती है। रेपो रेट एवं रिवर्स रेपो दर मे कमी या वृद्धि स्फिति (महंगाई) की स्थिति पर तय होती है। यदि महंगाई तय सीमा से उपर है और इसे कम करना आवश्यक है तो रिजर्व बैंक ऑफ इन्डिया अपनी त्रैमासिक समीक्षा मे रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट को पूर्ववत बनाए रखता है। यदि साख विस्तार करना आवश्यक होता है तो दोनों दरों मे कटौती की जाती है ताकि सस्ते ॠण पर अधिक विनियोग हो सके। लेकिन पिछले कई तिमाही से ऐसा नही हो पा रहा है । इसका मतलब है कि महंगाई अनुकूलतम सीमा से अधिक है और सस्ते ॠण पर नये निवेश में वृद्धि फिलहाल जरूरी नही है। विकास की दर में वृद्धि और महंगाई दर में वृद्धि समानुपातिक होने पर महंगाई की मार झेलना बहुत कठिन नहीं होता है। लेकिन अभी महंगाई ने लोगों के घरेलू बजट को बुरी तरह झकझोर दिया है ।

महंगाई जो सुरसा की तरह निरंतर बढ रही है के दौरान नाॅमिनल ग्रोथ में भले ही वृद्धि होता दिखाया जाता है , लेकिन एक्चुवल ग्रोथ रेट मे वस्तुतः कमी हुई है। और इस कमी का असर जन सामान्य की आय पर पड़ा है और उनके रहन-सहन पर ऋणात्मक असर पड़ा है। उनकी बचत करने की क्षमता में काफी कमी आई है। यहां तक कि कर्ज का बोझ बढ़ गया है। उनकी खाने की थाली से प्रोटिन , कार्वोहाइड्रेड एवं विटामिन युक्त पदार्थों की मात्रा मे कमी आई है। असमान्य महंगाई ने कुपोषण की समस्या पैदा की है ।इस समस्या के शिकार बच्चे एवं बुजुर्ग दोनों हुए हैं।

सामाजिक समस्याएं : महंगाई ने जहाँ एक ओर आर्थिक संकटों को जन्म दिया है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक समस्याएँ भी उत्पन्न हुई हैं। नैतिकता में ह्रास, भ्रष्टाचार में ईजाफा,युवकों की गैर कानूनी धंधों में संलिप्तता साइबर अपराध में वृद्धि ,आत्महत्याएं छिनतई आदि कुछ हद तक महंगाई से जुड़ी हुई हैं ।बेरोजगारी भी इन समस्याओं के जड़ मे हैं ।

अतः महंगाई पर अंकुश आवश्यक है। नियंत्रित महंगाई देश तथा देशवासियों दोनों के हित में आवश्यक है ।

By: प्रोफेसर (डाॅ) नागेश्वर शर्मा, संयुक्त सचिव ,भारतीय आर्थिक परिषद।

(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। इसमें शामिल तथ्य तथा विचार/विश्लेषण ‘N7India’ के नहीं हैं और ‘N7India’ इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)

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