
Written by: संतोष सिंह

लोजपा के पांच सांसद पशुपति कुमार पारस के नेतृत्व में लोजपा से बाहर हो गये हैं। कहा ये जा रहा है कि ये सारा खेल जदयू द्वारा खेला गया है और इसके पीछे ललन सिंह की बड़ी भूमिका रही है। मतलब नीतीश कुमार के खिलाफ बिहार विधानसभा चुनाव में लड़ने का फैसला लेने वाले चिराग अब अकेले रह गये हैं। इस टूट से दो बाते सामने आयी है एक बीजेपी अपने साथी का घर बचाये रखने में नाकामयाब रहा। दूसरी इस टूट के बाद नीतीश बीजेपी के दबाव से अब पूरी तरह मुक्त हो जायेगा।
बीजेपी पर भरोसा करना चिराग को मंहगा पड़ा

पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान जिस तरीके से चिराग पासवान नीतीश कुमार के खिलाफ काम कर रहे थे। उसको लेकर बीजेपी जो भी सफाई दे लेकिन सरेआम चर्चा है कि इसके पीछे बीजेपी खड़ी थी और यह सच्चाई भी है कि आज जदयू की विधानसभा में जो स्थिति है वो लोजपा की वजह से ही है । अगर विधानसभा चुनाव में तीनों साथ चुनाव लड़ता तो बिहार विधानसभा का चुनाव परिणाम कुछ और ही होता यह बात बिहार का रिक्शा चलाने वाला भी समझ रहा है ।और यही वजह रहा है जहां नीतीश के उम्मीदवार चुनावी मैदान में खड़े थे। वहां एनडीए का वोट लोजपा के साथ गया और नीतीश चुनाव हार गये। नीतीश ने इसका बदला ले लिया, क्योंकि चंदन सिंह जो सूरजभान के भाई है, उनको टिकट नीतीश के जिद्द की वजह से मिला था। क्योंकि सूरजभान की पत्नी आये दिन नीतीश कुमार के खिलाफ कुछ ना कुछ बयान दे देती थी ,दिनेश सिंह नीतीश कुमार के पूराने चाहने वालो में है। इनको मुजफ्फरपुर के सियासत से बाहर कुछ चाहिए नहीं । चौधरी महबूब आलम अली कैसर को तो नीतीश के कहने पर रामविलास पासवान टिकट दिये थे। वहां तो डां संजीव सिंह पर मामला तय हो गया था। हां.. प्रिंस का जाना थोड़ा असहज दिख रहा है क्योंकि दोनों भाई में बहुत ही गहरा रिश्ता था। पारस अंतिम पड़ाव में ही है इसलिए जाते जाते एक बार केन्द्र में मंत्री बन जाये इनकी इक्छा भी रही है। इसलिए इन सबों को तोड़ना नीतीश के लिए बहुत ही आसान रहा क्यों कि ये सारे सत्ता के खिलाफ एक दिन भी नहीं रह सकते हैं । अब इस नयी स्थिति में बीजेपी कुछ भी करने कि स्थिति में नहीं रह गया क्यों कि नीतीश के ना चाहते हुए भी चिराग केन्द्रीय मंत्रीमंडल में शामिल होने के प्रबंल दावेदार माने जाते थे और बीजेपी के ऐसे नेता जो नीतीश को पसंद नहीं करते थे। वो चिराग को मंत्री बनाने में जुटे थे। जो नीतीश को नागवार गुजर हालांकि बिना बीजेपी के सहमति के इस तरह का टूट सम्भव नहीं है। लेकिन अब लोजपा ही चिराग को छोड़ कर चला गया ऐसे में बीजेपी के सामने अब कोई विकल्प नहीं रह गया । अब देखना यह है कि इस टूट के बाद नीतीश पर हमला वर रहने वाले प्रदेश अध्यक्ष सहित बीजेपी के वैसे तमाम नेता जो नीतीश पर लगाम लगाने की तैयारी में जुटे थे। उनकी अब क्या रणनीति रहेगी यह देखना दिलचस्प होगा। वैसे इस टूट के साथ ही यह तय हो गया है संख्या बल में भले ही नीतीश कमजोर वो लेकिन अब बिहार में सही में बड़े भाई नीतीश ही है ये उन्होंने यह साबित कर दिया है ।
चिराग इस टूट से बाहर निकल गये तो बिहार को एक और युवा चेहरा मिल जायेगा
नीतीश और लालू प्रसाद के बीच गठबंधन नहीं बनता तो बिहार में किसी को भी पता नहीं चलता कि तेजस्वी औऱ तेज प्रताप का भविष्य कैसा रहेगा । यूँ कहे तो आज तेजस्वी घर से लेकर बाहर तक इसलिए मजबूत दिख रहे हैं क्यों कि इन्होंने नीतीश कुमार के साथ रहते हुए बिहार के युवा में यह अलख जगाने में कामयाब रहा है कि उनकी एक अपनी शैली है अच्छा बोलते है सभ्य दिखते हैं । इसी तरह लोजपा में आज जो टूट हुई है उस टूट के बाद चिराग अगर वापसी करने में कामयाब रहा तो बिहार की राजनीति को दूसरा ये युवा चेहरा मिल जायेगा जिस पर यूथ भरोसा कर सकता है। लेकिन तेजस्वी की तरह चिराग के लिए इतना आसान नहीं होने वाला क्यों कि रामविलास अब नहीं है दूसरी बात चिराग का बिहारी होना साबित करना होगा। दिल्ली छोड़ कर पटना बैठना होगा अपने समाज के बीच जाना होगा। जहां आज भी रामविलास पासवान को लेकर बड़ा जुनुन है।
वैसे लोजपा के सांसद और नेता भले ही चिराग को छोड़ दे लेकिन रामविलास पासवान के वोटर को चिराग के अलग करना बहुत मुश्किल होगा। वैसे ये सब कुछ उस बात पर निर्भर करता है कि इस झटका से चिराग बाहर कैसे आते हैं।
(लेखक संतोष सिंह जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये लेखक के निजी विचार हैं।)


