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जन्माष्टमी: भादो की महकती निशा के प्रेमेश्वर 

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उमेश कुमार  By:उमेश कुमार

देवघर। 

भादो की तपन कुछ अलग होती है. सूरज की दहक देह में घुसती तो है, पर जेठ-अखार की तरह श्वेद-कण बाहर नहीं झरते. बेशक कोरे-श्यामल मेघ आसमां में तिरते हैं. उमड़ते-घुमड़ते और पूरी शिद्दत से बरसते हैं. फिर भी, अंदर का अंगार थमता नहीं. ऐसे में विचलित होकर जहां साधारण जन शीतलता के अधुना उपायों की शरण लेता है, वहीं रससिक्त कवि इसके स्फीत सौंदर्य की थाह लेने को तत्पर होता है. इस तप्त-दीप्त भाव में एक खास देव की छवि निहारता है. उन्हें अपनी रचनाओं में बांधता है. वह देव जो रोमानी रंगत में रंगे हैं. जो प्रेम के पीर में भी आश्वस्ति का संदेश देते हैं. मौसम की चुनौतियों और उसकी तमाम ऊष्णता के बीच प्रीत की संझा को मिलन-यामिनी में टांक देते हैं. तभी तो बैद्यनाथ मंदिर के सरदार पंडा रहे खांटी देशज मिजाज के कवि पं. भवप्रीतानंद ओझा (१८८६-१९७०ई.) शक्ति और शिव के साथ मुरली मनोहर श्रीकृष्ण की प्रेम-धारा से भी पुलकित हो उठते हैं. सूरज की तपिश के परों से उतरती संझा को इस भदवा लोकगीत में महकती रात के एहसास में बड़ी खूबसूरती से पिरो देते हैं. प्रेमेश्वर श्रीकृष्ण के वजूद को कवि ने कितनी उत्कटता से थाहा है। 

जरा देखिए तो सही-

'बिरहन नारी उमर किशोरी
       भादव रात अंधारी
निंदो नैआवै,मदन(कामदेव)सतावे
       तापर आफत भारी हो.
बाजे मोहन बांसुरिया,भींजी चुनरी
गोरी बरसे बदरिया,भींजी चुनरी
सुनके बांसुरी मति भयी बावरी
चित्त बस गए मुरारी हो
चलो वहीं बन(उपवन), जहां मनमोहन श्याम बांसुरियाधारी हो
मोहे न सूझे डगरिया
भीजी चुनरी…
नैना जैसे झरिया(बारिश)
गोरी बरसे बदरिया
भीजी चुनरी…
मलका(दामिनी/बिजली)मलके
बटिया (रास्ता)झलके
फिर तो वही अंधारी
चरण चले न,रहत बने न
त्रिशंकु दशा हमारी हो…'

प्रेम, लावण्य और 'रास' के मनोहर शिल्पांकन के साये में मचलती भदवा ऊष्मा के चतुर्दिक श्रीकृष्ण की स्तुति ही तो है. लिहाजा, इस लोकगीत के संबंध में अलग से कुछ अंकित करने की गुंजाइश नहीं दिखती. सब कुछ विलक्षण सहजता के साथ उपस्थित है. ऐसे में,श्रीकृष्ण और आत्मीय,और प्रीतिकर प्रतीत होते हैं. 

(दिवंगत संगीतकार स्व.पूरणशंकर फलाहारी की डायरी से प्राप्त 'भदवा लोकगीत' के आधार पर.)

लेखक उमेश कुमार , झारखण्ड शोध संस्थान देवघर के सचिव हैं।

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