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कोरोना की देन: लोग पस्त-पर्यावरण मस्त

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Written By: आशा विभाकर

पटना (बिहार)

क्या कारण है कि जिस बीमारी को WHO ने महामारी घोषित किया और जिसने इटली, जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों में बर्बादी और तबाही मचा दी, वह महामारी पर्यावरण के लिए बहुद हद तक वरदान साबित होती दिख रही है। 

प्रकृति की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह अपनी उत्पादों या अवयवों का इस्तेमाल स्वयं नहीं करती है, बल्कि उसका लाभ मानवजाति या फिर दूसरे जीव उठाते हैं। जैसे, वृक्ष अपना फल स्वयं नहीं खाते, नदियां और झीलें अपना पानी स्वयं नहीं ग्रहण करती, सुंदर तथा सुगंधित फूल अपने आपको नहीं बल्कि पूरे वातावरण को खुशनुमा बनाते हैं। मगर हम बड़े निर्दयी हैं. हम प्रकृति उत्पादों का इस्तेमाल करने के साथ-साथ प्रकृति से खिलवाड़ करने लगे हैं. नतीजा है कि प्रकृति कुपित होकर हम से बदले लेने पर उतारू हो गई है – 'कोरोना' उसी का नतीजा मात्र है जिसने सम्पूर्ण मानवजाति को एक लंबे समय के लिए घरों में बंद रहने के लिए विवश कर दिया है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस महामारी ने हजारों लोगों की जानें ली और बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान भी हुआ लेकिन जब हम इसके सकारात्मक पहलु को देखें तो पाते हैं कि यह पर्यावरण के लिए एक तरह से वरदान और इस धरा के लिए संजीवनी साबित हुई है।

पर्यावरण

जरा सोचिए! जो शहर कभी प्रदूषण से ग्रस्त हुआ करता था अब वहां के लोगों को अपने घर की छतों से हिमालय की श्रृंखला दिखने लगी है। आसमान इतना साफ और नीला हो गया कि लोगों को ध्रुवतारे नज़र आने लगे। कई शहरों की सड़कों पर जंगली जानवर स्वच्छंद विचरण करते दिख रहे हैं। खूबसूरत मोर सड़कों पर पंख फैला कर नाचते दिखाई दिए तो वहीं गंगा-यमुना जैसी नदियों में मछलियां उन्मुकत होकर तैरती और अठखेलियां करती दिखाई दी। इनके जल शुद्धता की नई ऊचाई छू कर मानव मन को हर्षित कर रही है. कई ऐसे पक्षी जो विलुप्त हो गए थे, उन्मुक्त आकाश में अठखेलियां करते दिखाई दे रहे हैं। कई लोगों ने अपनी जुगाड़ से उनकी तस्वीर कैद कर अपने को खुशकिस्मत मान बैठे हैं. कल तक दुर्लभ समझे गए अधिकांश जीव सुलभ की श्रेणी में अब दर्शनार्थ हमारे-आपके सामने उपस्थित है. हम यह सब देखकर अंचम्भित हैं.

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि हम भारतीयों के लिए पर्यावरण संरक्षण, प्रकृति तथा वन्यजीवों का संरक्षण उनके सतत विकास प्रक्रिया को बनाए रखने की कहानी है. लेकिन अब सालों से चली आ रही मानवीय भूलों से सीखने और सबक लेने की जरूरत है. दूसरे शब्दों में, प्रकृति और विकास में संतुलन आवश्यक है।

आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश में वायु प्रदूषण से प्रत्येक वर्ष लगभग 12 लाख लोगों की मौत होती है और भारत में ही कई शहर ऐसे हैं जहां लोगों का सांस लेना मुश्किल हो जाता है। कुछ खास समय में तो दिल्ली जैसे शहर में लोगों को शुद्ध आक्सीजन के लिए कृत्रिम व्यवस्था करनी पड़ती है. जाहिर है, यह आम लोगों के लिए संभव नहीं है. सभी जानते हैं कि इसका मुख्य कारण जीवाश्म ईंधन जैसे – कोयला, पेट्रोल और डीजल का बढ़ता इस्तेमाल है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि वायु प्रदूषण से बचने के लिए ऐसे उर्जा स्त्रोतों पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी। कोरोना का फैलता जाल इन्हीं गलतियों का दुष्परिणाम है। 

हालांकि हम सबने इस महामारी से बाहर निकालने की प्रक्रिया शुरू कर दी है और पूरा देश अब अनलॉक हो चुका है. परन्तु जिस तरह से सरकार ने कोरोना से बचने के लिए लॉक डाउन जैसा कदम उठाया और सख्ती से पेश आई, उसी तरह से यदि प्रदूषण को रोकने के लिए सरकार कदम उठाए तो काफी हद तक पर्यावरण संरक्षण में हम सफल हो सकते हैं। हम मौत के मुहाने पर खड़े हैं. प्रदूषण के खिलाफ इस लड़ाई में सरकार की सख्ती के साथ-साथ हर बंदे को इस मुहिम में शामिल होना होगा, तभी यह जंग जीती जा सकती है.

कोरोना काल में उठाए गए एतिहातन फैसलों को आगे भी जीवन में लागू करना हमारी खुद की प्राथमिकता में शामिल करना होगा. मसलन, यदि हफ़्ते में दो बार वर्क फ्रॉम होम कर दिया जाए तो काम भी समय पर होंगे और प्रदूषण से भी लोगों को राहत मिलेगी। इससे हवाई सफर करने वाले लोगों में कमी आयेगी और कम से कम हवाई जहाज़ उड़ान भरेंगे। परिणामस्वरूप धरती को गर्म करने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड गैस में भी कमी आयेगी और पूरे देश को विशेषकर मेट्रो शहर को बहुत बड़ी राहत मिलेगी।

कोरोना संकट ने पूरे विश्व को एक संदेश तो अवश्य दिया है कि यदि साल में 350 दिन प्रकृति मनुष्यों को झेलती या उनका पालन-पोषण करती है तो पूरे वर्ष में 15 दिन क्यों नहीं प्रकृति आज़ाद रहे और मनुष्य घरों में कैद रहें। कहने का तात्पर्य है कि हर वर्ष पूरा विश्व समुदाय यदि स्वेच्छा से कुछ दिनों के लिए लॉक डॉउन का पालन करें और ऐसा कोई फॉर्मूला विश्वभर की सरकारें लेकर आए ताकि हमें ऑक्सीजन और आहार देने वाली प्रकृति कुछ क्षण स्वयं खुलकर सांस ले सके, खुद का पुनर्निर्माण कर सके और सालों साल पूरी मानवजाति की अग्रतर देखभाल सुखद तरीके से कर सके.

लेखिका आशा विभाकर स्वतंत्र लेखन कार्य करती हैं। ये लेखिका के निजी विचार हैं। 

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