Written by: एन. के. सिंह 
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहले 14 साल तक चांसलर रह कर पश्चिम जर्मनी को आर्थिक-सामरिक शक्ति बनाने वाले कोनराड अडेन्यूर का एक प्रसिद्द कथन है “मानव तैयार करने में ईश्वर ने एक घटिया समझौता किया. अगर वह मनुष्य को थोड़ा और बुद्धिमान बना देता तो वह उचित आचार-व्यवहार करने लगता लेकिन अगर उसे थोड़ा कम बुद्धि देता तो उसे शासित करना मुश्किल होता”. उनका तात्पर्य था— मनुष्य पर शासन की अपरिहार्यता बनी रहेगी.
कोरोना जैसे संक्रामक महामारी ने पूरी दुनिया को हिला दिया है. इसका शिकार कौन है ?

जवाब — व्यक्ति.
इसे असावधानी के कारण या स्वछंदता की ललक में संक्रमित व्यक्ति द्वारा फ़ैलाने से कौन शिकार होगा?

जवाब –उसके संपर्क में आने वाला याने सबसे पहले परिवार फिर मुहल्ला या कार्य-स्थल पर उसके साथी?
किसी भी कारगार दवा या वैक्सीन के अभाव में इसका सबसे सहज निदान क्या है?
जवाब –दो गज की दूरी और मास्क.
ये सब करने से कौन बच सकता था ?
जवाब –स्वयं व्यक्ति.
लेकिन, भारत के गृह-मंत्रालय ने 68 दिनों के चार लॉकडाउन में “कौन क्या करें, क्या न करें” के कुल 94 आदेश दिए याने हर रोज 1.3 आदेश की दर से.
आखिर क्यों किसी पुलिस वाले को 24 घंटे सड़क पर खड़े रहना पड़ता है लाठी लेकर कि आप घर से बाहर न निकालें बगैर वैध पास के?
आखिर क्यों प्रधानमंत्री की ताज़ा “मन की बात” में लॉकडाउन के 68 दिनों बाद भी बताना पड़ता है “कोरोना अभी भी उतना हीं बड़ा ख़तरा है लिहाज़ा सावधानी बरतें”. क्या प्रधानमंत्री सन्देश, गृहमंत्रालय का आदेश और पुलिस का डंडा हमें हर रोज यह बताने के लिए कि “आप अपने और समाज के हित में मास्क पहने, दूरी बनाये रखें” जरूरी है?
जब यह महामारी अपनी चरम की ओर जबरदस्त तेजी से बढ़ रही हो, 68 दिनों की चार लॉकडाउन वाली “जन-तपस्या” को “अनलॉक” में बदलना कहीं महंगा न पड़े. हर आम-ओ-ख़ास को इसका अहसास है. लेकिन जीवन की कुछ और भी शर्तें होतीं हैं. कोरोना से मृत्यु-दर भले हीं कम हो लेकिन इतिहास गवाह है कि आर्थिक गतिविधि लम्बे समय तक रुकने के अपरिहार्य परिणाम में भूख से मौत का दर सौ-फीसदी होता है. देश को इससे भी बचना था. लिहाज़ा यह मान कर कि समाज कोरोना से भी लड़े और भूखमरी से भी बचे, दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत सरकार ने भी एक समझौता किया. उसे यह भी समझ में आ गया है कि कोरोना जाने वाला नहीं है और दूसरी ओर सर्वमान्य दवा की फिलहाल संभावनाएं बेहद क्षीण हैं. लिहाज़ा आर्थिक गतिविधि शुरू करना तात्कालिक मजबूरी है. फिर इस महामारी में चूंकि इलाज़ की भूमिका भी नगण्य है और वायरस अधिकांश मामलों में जानलेवा नहीं है लिहाज़ा सरकार और स्वास्थ्य तंत्र केवल उन्हीं मामलों में ज्यादा चिंतित है जिनमें संस्थागत स्वास्थ्य हस्तक्षेप की जरूरत हो. कुछ हद तक यह सोच सही भी है क्योंकि अस्पताल में औसत कोरोना मरीज को जो दवाएं दी जा रहीं हैं उनकी सार्थकता पर अभी भी विश्व वैज्ञानिक समुदाय एकमत नहीं है.
हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन (एचसीक्यू) इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है जिसे भारत दवा के रूप में इस्तेमाल कर रहा है जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन इसके प्रयोग के खिलाफ है और अमरीकी राष्ट्रपति इसकी पुरजोर वकालत कर रहे हैं. रेम्डेसिविर के प्रभाव को लेकर भी अभी भ्रम बना हुआ है. वैक्सीन की खोज और फिर उसका वाणिज्यिक उत्पादन तो अभी दूर की कौड़ी है.
ऐसे में 139 करोड़ लोग क्या करें?
यहाँ आत्म-संयम के साथ एक नए कार्य-संस्कृति की जरूरत है जो अगले कई दशकों तक बनाये रखना होगा. और उस संस्कृति का पहला चरण है – दो अनजान लोगों के बीच “दो गज” की शारीरिक दूरी को आम-व्यवहार में लाना. और इतना हीं जरूरी है मास्क पहनना.
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। 22 मई को कोरोना अनुश्रवण व क्रियान्वयन समूह के अध्यक्ष ने चार संस्थाओं द्वारा गणितीय माडलों के आधार पर बनाये गए आंकड़े देते हुए बताया कि 25 मई से लॉकडाउन की घोषणा से लाखों जाने बच गयीं. सरकार ने संस्थाओं को उधृत करते हुए बताया गया कि बोस्टन कंसल्टेंसी ग्रुप के अनुसार 1.2 लाख से 2.1 लाख जाने बची। लेकिन इससे अलग देश-विदेश के 600 अर्थ-शास्त्रियों, डॉक्टरों, वैज्ञानिकों, प्रबुद्ध नागरिकों और स्वयंसेवी संस्थाओं के समूह के अनुसार 15 मई तक 8000- 32000 जानें बच सकीं. एक तो सरकार ने इस गणितीय अनुमान की विधि और रोगियों और मौतों की संख्या किस आधार पर ली, यह नहीं बताया.
बहरहाल इन सबसे अधिक चिंतनीय यह है कि सरकार यह नहीं बता रही है कि लॉकडाउन में आने-जाने की बंदिश के कारण कितने गंभीर रोगियों ने दवा-इलाज़ के अभाव में दम तोड़ दिया और बच्चे टीकाकरण से वंचित रहे. इसके अलावा इस लॉकडाउन में अर्थशास्त्रियों के अनुसार करीब 16.80 लाख करोड़ रुपये के उत्पादन का नुकसान हुआ है और करीब 12.2 करोड़ लोग बेरोजगार हुए.
एक अध्ययन के अनुसार इस आर्थिक नुकसान के मात्र 2.1 फीसदी खर्च पर देशव्यापी लॉकडाउन के पहले हीं शहरों और संदिग्ध जगहों पर व्यापक और सस्ता सेरोलोजिकल जांच करा कर मात्र संक्रमित इलाकों/रोगियों को हीं अलग-थलग कर आसानी से रोग पर कम जन-धन हानि में काबू किया जा सकता था.
आत्ममुग्धता में केंद्र हीं नहीं, दिल्ली के मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से ऐलान किया कि कोरोना के लक्षण न हों तो टेस्ट की कोई जरूरत नहीं है. ध्यान रहे कि चीन के वुहान में एक व्यक्ति ने पूरी दुनिया को संक्रमण दिया है. लिहाज़ा लक्षण न होने पर भी एक रोगी चलता –फिरता कोरोना बम है. और इस सरकारी गफलत के सबसे ज्यादा शिकार बुजुर्ग होंगें. प्रवासी मजदूरों के संकट का एक और पहलू देखें. नौकरी गयी, किराये का मकान खाली करना पड़ा, अनिश्चित काल के लिए जीवन का संकट आया तो वह कुछ सामान, पिट्ठू, पांच और तीन साल के दो बच्चे और एक अदद पत्नी को लेकर 1700 किलोमीटर पैदल चलने के हौसले से चलने लगा.
मास्क या सामाजिक दूरी संस्कृति और व्यवहार बने
विश्व-विख्यात लांसेट संस्था ने दुनिया के तमाम देशों में हुई 44 रिपोर्टों को एक साथ में अध्ययन करके पाया कि सामाजिक दूरी बनाए रख कर और मास्क पहन कर काफी हद तक व्यक्ति इस रोग से बच सकता है. यही परिणाम पूर्व में सार्स और मार्स को लेकर हुए अध्ययनों में मिला. याने इन दोनों का प्रयोग करके रोग से ग्रस्त होने के संकट को चार से पांच गुना कम किया जा सकता है. सार्स, इबोला, मार्स, डेंगू और स्वाइन फ्लू आदि के नाम से हर दो साल पर कोई न कोई संक्रामक रोग हमारे अस्तित्व के लिए चुनौती बनता जा रहा है. ऐसे में कुछ अमरीकी राज्यों और यूरोपीय देशों में व्यक्तिगत स्वछंदता के नाम पर लॉकडाउन की बंदिशों, सामाजिक दूरी और मास्क की अनिवार्यता की अवहेलना करना सिर्फ यही बताता है कि हमें इतने विकास के बाद भी अपने को शासित करने के लिए कोई संस्था, राजदंड या सरकार की जरूरत है.



