
Deoghar: दशहरे पर पूरे देश में जगह-जगह पर रावण और कुंभकर्ण के पुतले जलाए जा रहे हैं, लेकिन झारखंड की धार्मिक-आध्यात्मिक राजधानी देवघर यानी बाबाधाम में ऐसे आयोजन को निषिद्ध माना जाता है। यहां रावण के पुतले नहीं जलाए जाने के पीछे एक खास मान्यता है।

देवघर में भगवान शंकर के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक कामना महादेव स्थापित हैं, जिनकी ख्याति रावणेश्वर महादेव के रूप में भी है। मान्यता है कि लंकाधिपति रावण इस ज्योतिर्लिंग को लंका ले जा रहे थे, लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनी कि इसकी स्थापना देवघर में ही हो गई। ऐसे में इस नगर के लोग रावण के प्रति ‘कृतज्ञता’ का भाव रखते हुए विजयादशमी पर उसके पुतले नहीं जलाते।

बाबा मंदिर के तीर्थ पुरोहित बताते हैं कि रावण एक महान शिवभक्त था। वह जब कैलाश से बैद्यनाथ के ज्योतिर्लिंग को लेकर आ रहा था तो भगवान विष्णु की रची गई माया के चलते उसे ज्योतिर्लिंग को देवघर की धरती पर रखना पड़ा और वे यहीं स्थापित हो गए। तब से यह स्थान बाबा नगरी के रूप में विख्यात है। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि इस नगर में रावण को बुराई का प्रतीक नहीं माना जाता, लेकिन हमारी संस्कृति में कृतघ्नता की परंपरा नहीं रही है। अगर किसी शत्रु ने भी जाने-अनजाने हम पर उपकार किया हो तो हम उसकी उस अच्छाई के प्रति आदर भाव रखते हैं। रावण यहां ज्योतिर्लिंग की स्थापना का निमित्त बना, इसलिए यहां उसके पुतले जलाने की परंपरा नहीं है।


