London : कांग्रेस नेता राहुल गांधी और इंडिया ब्लॉक के नेताओं द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) से मिलने की मांग और सीजेआई द्वारा मिलने से इनकार किए जाने पर पूर्व सॉलिसिटर जनरल और जाने-माने वकील हरीश साल्वे ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। आईएएनएस से खास बातचीत में उन्होंने कहा कि सीजेआई से मिलने की मांग सरासर मूर्खता है और यह सुप्रीम कोर्ट को राजनीति का मोहरा बनाने की कोशिश है। पेश है बातचीत के प्रमुख अंशः

सवाल: भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) ने राहुल गांधी और इंडिया ब्लॉक के नेताओं से मिलने से इनकार कर दिया है। आप इसे किस तरह देखते हैं?

जवाब: सबसे पहले मुझे लगा कि नेताओं ने मिलने का समय मांगा है, यह खबर फर्जी है। लेकिन अब बेंच के लोगों ने एक्स पोस्ट पर बताया कि उन्होंने मिलने का समय मांगा था और मुख्य न्यायाधीश ने मिलने से इनकार कर दिया। उनकी पार्टी में इतने वरिष्ठ वकील हैं। क्या किसी ने उन्हें यह नहीं बताया कि मुख्य न्यायाधीश हर मामले की सुनवाई खुद नहीं करते? मुख्य न्यायाधीश जिस बेंच को मामला सौंपते हैं, वही बेंच उसकी सुनवाई करती है और फैसला देती है। हमारे देश में कुछ नया हो रहा है। मुझे समझ नहीं आ रहा कि आखिर हो क्या रहा है?
सवाल : इंडिया ब्लॉक का मार्च निकालने और इस तरह मिलने की कोशिश करने का फैसला क्या दबाव बनाने की रणनीति है?
जवाब: यह सरासर मूर्खता है। ऐसा लगता है जैसे वे मानकर चल रहे हैं कि उन्हें संविधान या किसी भी व्यवस्था पर भरोसा नहीं है और वे जो चाहेंगे, वही करेंगे। अगर आप संविधान के अनुसार चलना चाहते हैं और संविधान की लाल किताब की बात करते हैं, तो न्यायपालिका के सामने इस तरह की राजनीतिक मांग नहीं रखी जा सकती। इसकी कुछ सीमाएं हैं और अदालत में एक निर्धारित प्रक्रिया होती है, जिसका पालन करना पड़ता है। उन्होंने याचिका दायर की है। यह पहली बार नहीं है जब उन्हें ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा है। मुझे समझ नहीं आता कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं।
सवाल: क्या आपको लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को राजनीति का मोहरा बनाया जा रहा है?
जवाब: बिल्कुल। मेरी राय में, वे हर दिन सुप्रीम कोर्ट को राजनीति का मोहरा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वे मानवाधिकारों की बात करते हैं। लेकिन याचिकाकर्ता कौन है? पिछली सुनवाई में अदालत ने कहा था कि आप कह रहे हैं कि ऐसा हो जाएगा और वैसा नहीं होगा, लेकिन आप प्रदर्शनकारियों की ओर से अदालत में पेश नहीं हो रहे हैं। यह राजनीति है। न्यायाधीश अपना काम कर रहे हैं। यहां मानवाधिकारों, विरोध प्रदर्शन के अधिकार और अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मुद्दे हैं। न्यायाधीश इन सभी पहलुओं की जांच कर रहे हैं।
अदालत ने बहुत संतुलित आदेश दिया है। अदालत ने सिर्फ इतना कहा है कि कोई भी काम गैरकानूनी तरीके से नहीं होना चाहिए। यह कहना जरूरी था, क्योंकि इस तरह की याचिकाएं लगातार दायर की जा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि सरकार की प्रतिक्रिया भी परिस्थितियों के अनुपात में होनी चाहिए। मैं 45 साल से ज्यादा समय से वकालत कर रहा हूं। मैंने पहले कभी इस तरह की सोच नहीं देखी, जिसमें लोग इस तरीके से मुख्य न्यायाधीश से मिलने की मांग करते हों।
सवाल : सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई ने कथित तौर पर कहा है कि लोगों का न्यायपालिका से भरोसा उठ रहा है। आप इस बयान को किस तरह देखते हैं?
जवाब: पहले कुछ अलिखित नियम हुआ करते थे, जिनका हम अनुशासन के तौर पर पालन करते थे। जब हम कनिष्ठ वकील थे, तब श्री पालकीवाला के समय से हमें सिखाया जाता था कि जिस मामले की आप अदालत में पैरवी कर रहे हैं, उस पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। ऐसा इसलिए ताकि फैसला आपके पक्ष में आए या खिलाफ, आप उसे व्यक्तिगत टिप्पणी का विषय न बनाएं। अब ऐसा लगता है कि इन परंपराओं का पालन नहीं किया जा रहा, क्योंकि ये सभी मामले राजनीतिक बन गए हैं। वकील राजनीतिक नेता हैं और वे अदालत में मामले लेकर आते हैं। जब उन्हें मनचाहा आदेश नहीं मिलता, तो वे कहते हैं कि उनका न्यायपालिका से भरोसा उठ गया है।
यह भारत के भविष्य के लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। आप यह नहीं कह सकते कि अगर अदालत ने आपकी पसंद का फैसला नहीं दिया, तो आपका न्यायपालिका से भरोसा उठ जाएगा। अगर सरकार के खिलाफ कोई फैसला आता और प्रधानमंत्री कहते कि उनका न्यायपालिका से भरोसा उठ गया है, तो सभी कहते कि वे संविधान और देश को खतरे में डाल रहे हैं। लेकिन जब विपक्ष ऐसा कहता है, तो सवाल उठता है कि न्यायपालिका के प्रति भरोसे का क्या हुआ। मुझे समझ नहीं आता कि हमारे देश में क्या हो रहा है।
सवाल: अगर कपिल सिब्बल का न्यायपालिका से भरोसा उठ गया है, तो क्या उन्हें सुप्रीम कोर्ट में वकालत जारी रखनी चाहिए?
जवाब: कपिल सिब्बल एक वरिष्ठ वकील हैं। अगर उनका न्यायपालिका से भरोसा उठ गया है, तो उन्हें अपने मुवक्किलों को उसी हिसाब से सलाह देनी चाहिए। अगर मेरा न्यायपालिका पर भरोसा न हो, तो मैं खुद अदालत में पेश नहीं होऊंगा। आप अदालत में पेश होते हैं, न्यायाधीश से फैसला मांगते हैं और जब न्यायाधीश आपकी बात से सहमत नहीं होते, तो आप कहते हैं कि आपका भरोसा उठ गया। हमें सिखाया गया था कि ऐसी टिप्पणियां नहीं करनी चाहिए।
न्यायपालिका पर भरोसा और किसी फैसले की शुद्धता दो अलग-अलग बातें हैं। आप कह सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आपको निराशाजनक लगा या आपके अनुसार वह गलत है। आप अपने तर्क दे सकते हैं। मतभेद हो सकते हैं और न्यायाधीशों से भी गलतियां हो सकती हैं।
एक प्रसिद्ध कहावत है, “वे सही होने के कारण अंतिम नहीं हैं, बल्कि अंतिम होने के कारण सही हैं।” सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम होता है, भले ही किसी को वह गलत लगे। लेकिन यह कहना कि न्यायपालिका से भरोसा उठ गया है, अलग अर्थ रखता है। इससे यह संकेत मिलता है कि न्यायपालिका जानबूझकर गलत फैसले दे रही है। अगर किसी का ऐसा मतलब नहीं है, तो उसे स्पष्ट करना चाहिए कि वह सिर्फ किसी खास फैसले से निराश है।
सवाल: आप देश के सॉलिसिटर जनरल रह चुके हैं। क्या कोई राजनीतिक व्यक्ति सीजेआई को ज्ञापन देकर मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग कर सकता है?
जवाब: मैं यही तो कह रहा हूं कि हमारे देश में कुछ अजीब चीजें हो रही हैं। अखबार की एक रिपोर्ट के आधार पर इतना हंगामा खड़ा कर दिया गया है, जबकि करीब 10 दिन में अदालत में एक मामला आने वाला है। चुनाव आयोग अपना जवाब दाखिल करेगा और अपने रिकॉर्ड पेश करेगा। सुप्रीम कोर्ट यह जांच करेगा कि कोई गड़बड़ी हुई थी या नहीं और अगर हुई थी, तो उसका समाधान कैसे किया गया।
क्या हर दिन हंगामा खड़ा करना जरूरी है? क्या दिल्ली के लोगों को परेशान करना जरूरी है? त्योहारों का मौसम आने वाला है। दुकानदार चिंतित हैं कि प्रदर्शनों से उनके कारोबार पर असर पड़ सकता है। राजनीति करते समय हमें जनता की सुविधा और सहूलियत का भी ध्यान रखना चाहिए। इस मामले पर मेरी बहुत स्पष्ट राय है। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त से जवाब मांगा है और आगे अदालत अपने फैसले देगी।
अगर यह साबित होता है कि फैसले किसी व्यक्तिगत कारण से लिए गए थे या अदालत मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) के बारे में कोई टिप्पणी करती है, तो उपयुक्त संवैधानिक प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। जहां लागू हो, महाभियोग का प्रस्ताव भी विचार किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से नहीं हटा सकता। सीईसी के फैसलों और उनकी प्रक्रिया की वैधता को चुनौती दी गई है। इन सभी मुद्दों की जांच होगी। जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालने की जरूरत नहीं है। यह राजनीति है।
सवाल: कांग्रेस लगातार चुनाव आयोग और न्यायपालिका पर सवाल उठा रही है। क्या आपको लगता है कि राजनीति का स्तर गिर रहा है?
जवाब: मैं इन मामलों में पुरानी सोच वाला व्यक्ति हूं और इस स्थिति को लेकर बहुत चिंतित हूं। आज भारत में एक सरकार है और भविष्य में दूसरी सरकारें भी आएंगी। पहले कांग्रेस की सरकार थी और भविष्य में भी कांग्रेस की सरकार आ सकती है। कौन शासन करेगा, यह जनता चुनावों में तय करेगी। लेकिन हमें शासन की संस्थागत व्यवस्था को कमजोर नहीं करना चाहिए और न ही संस्थाओं से जनता का भरोसा उठने देना चाहिए। अगर आप चुनाव जीतकर किसी राज्य में सरकार बनाते हैं, तो आप भी नहीं चाहेंगे कि लोग सड़कों पर उतरकर कहें कि सरकार को संविधान के अनुसार काम नहीं करने दिया जा रहा है।
हमें अपनी संस्थाओं को कमजोर या निशाना नहीं बनाना चाहिए। संविधान ने न्यायपालिका, विधायिका, निर्वाचित कार्यपालिका और चुनाव आयोग जैसी अलग-अलग संस्थाएं बनाई हैं। सभी का अपना अधिकार क्षेत्र है और अदालतें नियंत्रण एवं संतुलन की व्यवस्था बनाए रखती हैं। अगर आप यह कहने लगें कि सिर्फ आपकी बात सही है और जो आपसे असहमत है, वह समझौता कर चुका है या राजनीतिक रूप से प्रेरित है, तो विचारों का वास्तविक आदान-प्रदान खत्म हो जाता है। यह उसी सोच जैसा है जिसमें कहा जाता है, “मेरा सच और तुम्हारा सच।” अगर आप मुझसे सहमत हैं, तो आप अच्छे हैं और अगर असहमत हैं, तो बुरे हैं। लोकतंत्र इस तरह नहीं चल सकता।
सवाल: सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को विशेष सुनवाई की और प्रदर्शनकारियों तथा आम लोगों को राहत दी। इसके बावजूद लोग नाराज क्यों हैं?
जवाब: वे सरकार को शर्मिंदा करना चाहते थे। वे चाहते थे कि सुप्रीम कोर्ट सभी बैरिकेड हटा दे और लोगों को दिल्ली में घुसकर आगजनी करने की छूट दे दे। ऐसा होने वाला नहीं था और न ही हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने बहुत सोच-समझकर संतुलित आदेश दिया। अदालत ने कहा कि जहां जरूरत से ज्यादा पाबंदियां लगाई गई हैं, उन्हें हटाया जाए। बाकी मामला सरकार पर छोड़ दिया गया।
मुख्य बात यह है कि प्रदर्शन का अधिकार लागू पुलिस कानून के अधीन है। यह कानून से बाहर नहीं है। अगर पुलिस अनुमति देने से इनकार करती है, तो उस फैसले को उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत चुनौती दी जा सकती है। आप अदालत जा सकते हैं और आदेश मांग सकते हैं। लेकिन आप खुद यह तय नहीं कर सकते कि पुलिस का फैसला गलत है, फिर पाबंदियां तोड़कर आगे बढ़ जाएं और रोके जाने पर कहें कि आपके प्रदर्शन के अधिकार का उल्लंघन हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रदर्शन का अधिकार किसी को कानून से ऊपर नहीं बनाता।
सवाल: कांग्रेस के पास बड़ी कानूनी टीम और कई वरिष्ठ वकील हैं। इसके बावजूद इस तरह की रणनीति अपनाना कितना उचित है?
जवाब: यह सवाल कांग्रेस के नेताओं से पूछना चाहिए। कानूनी दृष्टि से मुझे हैरानी होती है कि इतनी बड़ी कानूनी क्षमता वाली पार्टी इस तरह का रास्ता क्यों अपना रही है। क्या वे अपने वकीलों की सलाह पर काम कर रहे हैं या उनकी सलाह के खिलाफ जा रहे हैं? इसका जवाब वही दे सकते हैं।
सवाल: इस समय भारत की कानूनी व्यवस्था किस दिशा में जा रही है?
जवाब: पहली बार सरकार ने स्पष्ट रूप से सख्त रुख अपनाया है कि वह ऐसी गतिविधियों को बिना रोकटोक जारी नहीं रहने देगी। सरकार की जिम्मेदारी भी है कि जब कोई संस्थाओं का अपमान करे या उन्हें कमजोर करने की कोशिश करे, तो उनकी रक्षा की जाए। लोग अपने संवैधानिक अधिकारों के तहत प्रदर्शन करने की बात करते हैं, लेकिन उसी संवैधानिक व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं जो उनके अधिकारों की रक्षा करती है। वे अधिकार चाहते हैं, लेकिन उनसे जुड़ी जिम्मेदारियां स्वीकार नहीं करना चाहते।
संविधान आपको प्रदर्शन का अधिकार देता है, लेकिन साथ ही संस्थाओं का सम्मान करने और कानून का पालन करने की जिम्मेदारी भी देता है। आप मुख्य चुनाव आयुक्त या संसद को अपशब्द नहीं कह सकते, लोगों से सड़कों पर उतरने की मांग नहीं कर सकते और फिर जब आपके प्रदर्शन पर पाबंदी लगे, तो सिर्फ अपने अधिकार की बात करने लगें। मुझे उनकी सोच समझ नहीं आती। मेरी राय में, यह व्यवस्था को अस्थिर करने की कोशिश करने वाला राजनीतिक आंदोलन है। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इसका मजबूती से सामना करे। मेरा मानना है कि उसे ऐसा करना जारी रखना चाहिए।
सवाल: क्या आपको लगता है कि प्रदर्शन के अधिकार के नाम पर भारत में नेपाल और बांग्लादेश जैसे हालात पैदा करने की कोशिश की जा रही है?
जवाब: मेरा मानना है कि इन प्रयासों के लिए विदेशों से धन दिया जा रहा है और उन्हें बाहर से प्रेरित किया जा रहा है। यह मेरा आरोप है। कुछ विदेशी देश, खासकर अमेरिका, भारत से खुश नहीं हैं। हमारी वित्त मंत्री ने भी विभिन्न देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों पर बातचीत की, जिसमें कनाडा भी शामिल है। जब अमेरिका के बारे में पूछा गया, तो जवाब का आशय था कि भारत को ऐसे दबावों से निपटना सीखना चाहिए।
क्या इस बात में कोई संदेह है कि नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश में उथल-पुथल के पीछे कौन था? शेख हसीना को किसने हटाया और वहां नया प्रधानमंत्री कौन लेकर आया? मेरी राय में इन घटनाओं के पीछे बाहरी ताकतें थीं।
भारत में भी कुछ लोग विरोध प्रदर्शनों के नेता बनकर सामने आए हैं, जिनमें कुछ यूट्यूबर भी शामिल हैं। कुछ लोग जर्मनी और दूसरे देशों में रहते हैं। वे इन गतिविधियों के लिए पैसा कहां से ला रहे हैं? प्रदर्शन आयोजित करने के लिए धन की जरूरत होती है।
मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि पिछले छह से आठ महीनों में एक स्पष्ट पैटर्न दिखाई दिया है। जब मोदी सरकार होर्मुज संकट से निपटने, आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और भारत की सैटेलाइट क्षमताओं को बढ़ाने पर ध्यान दे रही है, तब ये समूह सरकार को आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश कर रहे हैं। मैंने पिछले छह से आठ महीनों में इस पैटर्न को देखा है। ऐसे आंदोलनों से निपटना सरकार की जिम्मेदारी है। मुझे नहीं लगता कि यह आंदोलन ज्यादा समय तक चलेगा, क्योंकि मेरी राय में यह जनता का वास्तविक आंदोलन नहीं है।
सवाल: जो लोग कथित तौर पर विदेशी फंडिंग लेकर देश में नैरेटिव चला रहे हैं, क्या सरकार को उनकी जांच कर कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए?
जवाब: मुझे पूरा भरोसा है कि ऐसी जांच शुरू होगी। हालांकि, मैं इसे जनता का आंदोलन नहीं मानता। मैं भारत में ज्यादा रहता नहीं हूं, हालांकि जो कुछ मैंने देखा है, उसके आधार पर मुझे व्यापक जनविद्रोह दिखाई नहीं देता। छात्र आंदोलन को ही देख लीजिए। जब परीक्षा के पेपर लीक हुए, तो लोगों ने समझा कि छात्र कितनी मेहनत से परीक्षा की तैयारी करते हैं और पेपर लीक होने से उनके साथ कितना अन्याय होता है। उन छात्रों को जनता का समर्थन मिला।
लेकिन जिस तरह का आंदोलन और पुलिस पर हमले देखने को मिले, वे जरूरी नहीं कि छात्रों के प्रति वास्तविक जनसमर्थन को दर्शाते हों। लोग समझते हैं कि क्या हो रहा है। आज यूट्यूब वीडियो, रील और एक लाइन वाले संदेशों के जरिए नैरेटिव फैलाए जा रहे हैं। बार-बार दावे किए जा रहे हैं, जिन्हें मैं झूठ मानता हूं। मैंने हाल ही में दिल्ली पुलिस की जनसंपर्क टीम का एक इंटरव्यू देखा, जिसमें इन दावों का जवाब दिया गया और मेरे विचार में यह दिखाया गया कि कुछ नैरेटिव किस तरह भ्रामक हो सकते हैं। (IANS)



