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“गलवान पोस्ट” से 58 साल पहले चीनी सैनिकों को खदेड़ने वाले कर्नल ‘नाना’ नहीं रहे

सात महीने तक चीन के 'युद्ध बंदी' रहे लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत सीताराम हसबनीस 90 वर्ष की उम्र में जिन्दगी की जंग हार गए। 1962 में भारत-चीन युद्ध से कुछ महीने पहले उनके नेतृत्व में ही भारतीय सैनिकों ने गलवान पोस्ट से चीनी सैनिकों को खदेड़ा था।

New Delhi: सात महीने तक चीन के ‘युद्ध बंदी’ रहे लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत सीताराम हसबनीस 90 वर्ष की उम्र में जिन्दगी की जंग हार गए। 1962 में भारत-चीन युद्ध से कुछ महीने पहले उनके नेतृत्व में ही भारतीय सैनिकों ने गलवान पोस्ट से चीनी सैनिकों को खदेड़ा था। चीन से रिहा होने के बाद स्वदेश लौटने पर उन्होंने उत्तरी सीमा के उच्च ऊंचाई इलाकों में तैनात पहाड़ी सैनिकों की इकाइयों को राहत देने के लिए 5 जाट बटालियन का गठन किया था।

राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और रक्षा सेवा स्टाफ कॉलेज के पहले पाठ्यक्रम के छात्र रहे लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत सीताराम हसबनीस ने 25 वर्षों तक भारतीय सेना में सेवा की। कमांडिंग ऑफिसर ने उनकी कंपनी को गलवान घाटी ले जाकर तैनात किया था, जहां उनका पहला काम कट्टर शाकाहारी जाट सैनिकों को डिब्बाबंद मांसाहारी भोजन खाने के लिए तैयार करना था, क्योंकि दूरस्थ पोस्ट पर शाकाहारी भोजन बनाना संभव नहीं था। सेना में रहने के दौरान अधिकारी से लेकर सैनिक तक उन्हें प्यार से ‘नाना’ कहकर बुलाते थे। उसी समय उन्हें अलग से जाट बटालियन का गठन करने की जरूरत महसूस हुई।

भारत-चीन के बीच 1962 में युद्ध से कुछ महीने पहले भारतीय सेना की एक पलटन घिरी होने के बावजूद गलवान में एक चौकी पर डटी रही। उनके नेतृत्व में ही 58 साल पहले भारतीय सैनिकों ने गलवान पोस्ट तक पहुंचे चीनी सैनिकों को लगभग 200 मीटर पीछे तक खदेड़ दिया था। बाद में 1962 में भारत-चीन के बीच युद्ध हुआ, जिसमें चीन के सैनिकों ने लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत सीताराम हसबनीस को बंदी बना लिया था। 07 मई, 1963 को स्वदेश लौटने से पहले नाना सात महीने तक ‘युद्ध बंदी’ के रूप में चीन में रहे। इसके बाद उन्होंने जाट बटालियन की स्थापना की। लेफ्टिनेंट कर्नल हसबनीस की जाट बटालियन लद्दाख में शामिल होने वाली पहली मैदानी सेना इकाई थी।

जाट बटालियन को विशेष रूप से उच्च ऊंचाई वाली उत्तरी सीमा पर तैनात पहाड़ी सैनिकों की इकाइयों को राहत देने के लिए लगाया गया था। सेवाकाल के दौरान कई सफल ऑपरेशनों के लिए ‘नाना’ को विशिष्ट सेवा पदक (वीएसएम) से सम्मानित किया गया।बांग्लादेश की मुक्ति के लिए पाकिस्तान के साथ हुए 1971 के युद्ध में ‘नाना’ ने एक बार फिर से अपने सैनिकों का नेतृत्व किया। इसके बाद उन्होंने 1977 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। सेना से रिटायर होने के बाद भी युद्ध नायक 90 वर्षीय लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत सीताराम हसबनीस सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहे। जीवन के आखिरी दिनों में उनकाे दिल और फेफड़ों का संक्रमण हुआ, जिससे उनका पुणे में निधन हो गया।

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