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Good News: अब पहनिए गोबर से बनी चप्पल, रहिये रोगों से दूर

गोबर से बने विशेष चप्पलों को गोहार गम, आयुर्वेदिक जड़ी-बुटियां, चूना और गोबर पाउडर को मिक्स करके बनाया जा रहा है।

Raipur: छत्तीसगढ़ में 7202 गौठानों में से लगभग 2हजार ऐसे हैं जहां महिलाओं का एक बड़ा समूह गोबर से बने उत्पादों के उत्पादन में लगा हुआ है। जहां पर मूर्ति, दिए और साज-सज्जा के साथ गोबर से बने विशेष चप्पलों को गोठानों में तैयार किया जा रहा है।

इससे स्थानीय महिलाओं को न केवल रोजगार का साधन उपलब्ध हो रहा बल्कि गौठानों को काफी फायदा भी हो रहा है। माना यह जा रहा है कि चप्पल पहनने से बीपी और शुगर कंट्रोल करने में सकारात्मक लाभ मिल रहा है।

गोकुल नगर निवासी रितेश अग्रवाल प्लास्टिक या रबर की जगह गोबर से चप्पल बनाने का काम कर रहे हैं। रितेश अग्रवाल ने बताया की राज्य सरकार ने गौठान बनाकर सड़को पर लावारिस घूमने वाले गौवंश को संरक्षित कर रही है। साथ ही अब वैदिक पद्धति से गोबर से चप्पल बनाकर वो गोठान के लक्ष्य को एक नया रूप दे रहे हैं।

गोबर की चप्पल बनाने वाले पशुपालक रितेश अग्रवाल का मानना है कि देश में बड़ी संख्या में गाय प्लास्टिक के बुरे प्रभाव से बीमार हो जाती हैं. उनमें से कई प्लास्टिक के कारण मर भी जाते हैं। ऐसे में हर इंसान को कोशिश करनी चाहिए कि प्लास्टिक का उत्पादन कम किया जाए।

उन्होंने चप्पल बनाने के अलावा गोबर से चप्पल, दीये, ईंटें और भगवान की मूर्तियाँ भी बनाईं। इसमें भी 16 लोग कार्यरत हैं।यह चप्पलें कोई साधारण चप्पल नहीं बल्कि इसे पहनने वाले व्यक्ति को यह चप्पल कई बीमारियों से बचाती है।

गोबर से बने विशेष चप्पलों को गोहार गम, आयुर्वेदिक जड़ी-बुटियां, चूना और गोबर पाउडर को मिक्स करके बनाया जा रहा है।

पुरानी पद्धति से गोबर की चप्पल बना रहे हैं। गोबर के दीए हो या गोबर की ईंट या फिर भगवान की प्रतिमा इन सब काम से गौशाला में गौवंश के देखरेख के लिए 15 लोगों को रोजगार मिल रहा है। यहां महिलाएं 1 किलो गोबर से 10 चप्पलें बनाती हैं।

गोबर से बनी चप्पल को घर, बाहर या ऑफिस कहीं भी पहनकर जाया जा सकता है। ये चप्पल 3 से 4 घंटे भीगने पर भी खराब नहीं होती है यदि कुछ भीग जाए तो धूप दिखाने के बाद वापस से पहनने लायक हो जाती है।

इस चप्पल की कीमत 4सौ रुपये है और अभी तक लगभग एक दर्जन चप्पल बिक चुकी है। अभी एक हजार चप्पलों का ऑर्डर मिल चुका है।

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