
हिन्दी साहित्य में अध्यात्म परम्परा ………. क्रमशः

हिंदी के प्रथम कवि के रूप में प्रतिष्ठित सरहपा ने अपनी रचनाओं में परम्परागत भारतीय आध्यात्मिक दर्शन के कर्मकांडीय पक्ष, अन्धविश्वासपूर्ण पक्ष पर बड़ा प्रहार किया है। उस काल में उन्होंने अध्यात्म के बाह्य आडंबरों का खुलकर विरोध किया।

सरहपा पर साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन ने बड़ा शोध कार्य किया है। उनके अनुसार, सरहपा सबसे प्राचीन सिद्ध या सिद्धाचार्य थे तथा वे उड़िया, अंगिका और हिन्दी के ‘आदि कवि’ हैं। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार सरहपाद, हरिभद्र नामक बौद्ध दार्शनिक के शिष्य थे जो स्वयं शान्तरक्षित के शिष्य थे।
सरहपा द्वारा रचित दोहागीतिकोष हिन्दी सन्त साहित्य परम्परा का ‘आदि ग्रन्थ’ है । सरहपा की कुछ रचनाओं का अध्ययन कर उनके आध्यात्मिक-क्रांतिकारी तेवर को समझा जा सकता है। वह तत्कालीन सामाजिक-आध्यत्मिक व्यवस्था पर सीधा प्रहार करते हैं।
एव सरह भणइ खबणाअ मोक्ख महु किम्मि न भावइ।
तत्त रहिअ काया ण ताव पर केवल साहइ॥
अर्थ
सरहपा कहते हैं कि क्षपणकों (दिगंबर साधुओं) का मोक्ष मुझे अच्छा नहीं लगता। क्योंकि उनका शरीर तत्वरहित होता है और एक तत्वरहित शरीर कभी भी परमपद की साधना नहीं कर सकता।
जोवइ चित्तुण-याणइ बम्हहँ अवरु कों विज्जइ पुच्छइ अम्हहँ ।
णावँहिं सण्ण-असण्ण-पआरा पुणु परमत्थें एक्काआरा ।।
अर्थ
चित्त ब्रह्म को देख सकता है लेकिन अज्ञान के कारण वह उसे भीतर होते हुए भी पहचान नहीं पाता और बाहरी शरीर से पूछता है कि वह कौन है? नाम अलग-अलग रख लेने से भले ही संज्ञा और जड़ पृथक हो जाते हों लेकिन वास्तव में वह एक ही है।
परम्परागत साधना पद्धति का खंडन करते हुए सरहपा कहते हैं-
जिवँ लोणु विलिज्जइ पाणियहिं तिवँ जइ चित्तु विलाइ ।अप्पा दीसइ परहिं सवुँ तत्थ समाहिए काइँ ।। ४२ अर्थात
जैसे नमक पानी में विलीन होता है, वैसे चित्त विलीन हो जाता है । तब आत्मा, परमात्मा समान दिखती है, फिर समाधि क्यों करें ?
आगे सरहपा कहते हैं ग्रन्थ वाचन से बुद्ध बनना संभव नहीं। यहां वह ग्रन्थों के ज्ञान को अभ्यास में लाने का मन्त्र देते हैं।
पंडिअ सअल सत्थ बक्खाणइ।
देहहि बुध्द बसंत ण जाणइ॥
तरूफल दरिसणे णउ अग्घाइ।
पेज्ज देक्खि किं रोग पसाइ॥
अर्थ
पंडित सकल शास्त्रों की व्याख्या तो करता है, किंतु अपने ही शरीर में स्थित बुध्द (आत्मा) को नहीं पहचानता।
वृक्ष में लगा हुआ फल देखना उसकी गंध लेना नहीं है। वैद्य को देखने मात्र से क्या रोग दूर हो जाता है?”
सिद्ध साहित्य परम्परा को नाथ सम्प्रदाय ने आगे बढ़ाया।
ध्यातव्य है कि जब एकमुखी भारतीय वैदिक आध्यात्मिक परम्परा का अभ्यास पक्ष, साहित्य पक्ष एक वर्ग में सिमट गया, तब समाज के दूसरे वर्ग में अध्यात्म की अनेक धारा बह चली। जैन की धारा, बुद्ध की धारा, सिद्ध परम्परा,काश्मीरी शैव परम्परा, कौल परम्परा, नाथ परम्परा, हठयोग आदि अनेक नामों से सामने आई। अपने विचारों, व्यवस्थाओं को लोगों तक पहुंचाने, उनको जागरूक करने के लिए आमभाषा हिंदी में साहित्य सृजन किया।
उस काल में साहित्य सृजन के दो-तीन विषय ही थे।
अध्यात्म प्रमुख था। स्वतंत्र कवि अध्यात्म या प्रेम पर को लिखते थे। प्राय: इनका प्रेम अध्यात्म आधारित ही होता था। राजकवि राजा की प्रशंसा लिखते थे। यह एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि लेखन के विषय चाहे जो रहे हों, हिंदी साहित्य रचनाकारों ने अध्यात्म को कभी नहीं छोड़ा। उसके अस्तित्व को हमेशा स्वीकार किया और हर प्रकार की रचना में उसे स्थान दिया।
सिद्ध परम्परा काल के अंत में शैव धर्म एक नये रूप में आरंभ हुआ। इस नए परम्परा का आगमन बौद्ध-सिद्धों की वाममार्गी परम्परा में स्त्रियों का भोग-प्रधान यौगिक प्रयोग के प्रतिक्रिया के रूप में हुआ।
इस परम्परा में स्त्री को योगिनी के रूप में शामिल किया गया। पूर्व के वाममार्गी आध्यात्मिक परम्परा में स्त्री सिर्फ शरीर स्तर पर साधना की सहयोगी होती थीं। जिससे वह आध्यात्मिक प्रगति में कहीं किनारे छूट जाती थीं। अब उन्हें अध्यात्म की गहराई, सिद्धि के लिए भी शिक्षित किया जाने लगा। यह मार्ग योगिनी कौल मार्ग’, ‘नाथ पंथ’ या ‘हठयोग’ कहलाया।
स्त्रोत
1. http://www.brandbharat.com
2.https://hi.m.wikipedia.org/wiki/सरह
लेखिका:डॉ. रीता सिंह, विभागाध्यक्ष, बी.एड.विभाग, ए.एन.कॉलेज,पटना (पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय)



