
Kolkata : जब किसी राज्य की पहचान उसकी संस्कृति, शिक्षा या राजनीति नहीं, बल्कि महिलाओं के प्रति अपराधों से होने लगे—तो यह केवल सामाजिक नहीं, बल्कि संस्थागत असफलता का प्रमाण होता है। पश्चिम बंगाल, जो कभी जागरूकता और क्रांति की भूमि रहा है, आज दुष्कर्म और महिलाओं के खिलाफ अपराधों की खबरों से बार-बार सुर्खियों में आ रहा है।

वर्ष 2024 के मध्य तक पश्चिम बंगाल में 48 हजार 600 से अधिक बलात्कार और पोक्सो से संबंधित मामले लंबित थे। इन मामलों की सुनवाई के लिए बनाए गए 17 विशेष फास्ट-ट्रैक कोर्टों में से केवल छह ही सक्रिय हैं। यह आंकड़े न सिर्फ अदालतों की धीमी प्रक्रिया को उजागर करते हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि न्याय व्यवस्था किस कदर बोझिल और असंवेदनशील हो चुकी है।

हालिया घटनाएं जैसे कि कोलकाता लॉ कॉलेज सामूहिक दुष्कर्म ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षा संस्थान भी अब महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं बचे। जिस गार्ड रूम में छात्रा के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ, वहां न सिर्फ कॉलेज के पूर्व छात्र बल्कि सुरक्षा गार्ड भी आरोपित हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मुख्य आरोपित पहले से ही कई आपराधिक मामलों में शामिल रहा, फिर भी उसे कोई रोक नहीं पाया।
इसके पहले, आरजी कर मेडिकल कॉलेज में एक डॉक्टर की हत्या और दुष्कर्म ने स्वास्थ्य संस्थानों की भी पोल खोल दी थी। और संदेशखाली की घटनाएं यह दिखाने के लिए काफी हैं कि जब सत्ता संरक्षण अपराधियों को प्राप्त होता है, तो पीड़िता का संघर्ष अधिक लम्बा और दर्दनाक हो जाता है।
हर बार जब कोई दुष्कर्म की घटना सामने आती है, तो राजनीतिक दल उसे वोट बैंक और प्रचार का विषय बना देते हैं। पश्चिम बंगाल सरकार की प्रतिक्रिया कई बार आरोपित को बचाने या मुद्दे को दबाने की दिशा में देखी गई है। विपक्ष के सवालों को राजनीतिक षड्यंत्र कह कर खारिज कर देना समस्या को और भी गंभीर बनाता है।
नेताओं और छात्र संघों से जुड़े अपराधियों पर कार्रवाई में देर या बचाव की कोशिश यह संदेश देती है कि राजनीति अपराध से बड़ी है और पीड़िता की चीखें वोट की गणना में गुम हो जाती हैं। जब कोई महिला कॉलेज परिसर में, अस्पताल में या पुलिस स्टेशन में असुरक्षित महसूस करती है, तब समझ लेना चाहिए कि समाज ने अपनी चेतना खो दी है। दुष्कर्म के मामलों में सबसे अधिक पीड़ा तब होती है जब पीड़िता से पहले उसका चरित्र ‘जांच’ का विषय बनता है, और न्याय प्रणाली वर्षों तक लटकती रहती है।
पश्चिम बंगाल को अगर फिर से न्यायप्रिय, संवेदनशील और प्रगतिशील राज्य बनना है, तो केवल नीति निर्माण से नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति, पारदर्शिता और समाज की चेतना से बदलाव लाना होगा। दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराधों पर चुप्पी, देरी और राजनीतिक रंग अब और बर्दाश्त नहीं किए जा सकते। (HS)


