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भारतीय सेना में बंगालियों के हालत के लिए बंगाली ही जिम्मेदार, नहीं दिखती उम्मीद की कोई किरण: पूर्व कमांडर

Deoghar Airport का रन-वे बेहतर: DGCA

Kolkata: भारतीय सेना (Indian Army) में बंगालियों की भागीदारी काफी कम हो गयी है। इसके लिए सेवानिवृत्त सेना अधिकारी सब्यसाची बागची ने बंगालियों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने विशेष बातचीत में बताया कि उन्हें इस स्थिति में कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही। कई लोगों के मुताबिक, इस स्थिति को और सकारात्मक होने की जरूरत है। 1963 से 1990 तक, सब्यसाची बागची ने 27 वर्षों तक सेना में सेवा की। 1990 में वे स्वेच्छा से सेवानिवृत्त हुए।

उन्होंने बताया कि “कई अन्य क्षेत्रों की तरह, एक समय था जब बंगालियों का सेना में दबदबा था। स्वतंत्रता के समय सेना की बंगाल रेजिमेंट का पतन हो गया। राजपूत बटालियन में अभी भी दो बंगाली कंपनियां हैं। लेकिन पर्याप्त योग्य बंगाली आवेदक नहीं हैं। ब्रिटिश काल से बंगाल इंजीनियर्स, बॉम्बे इंजीनियर्स और मद्रास इंजीनियर्स नाम के तीन विभाग हैं। एएमसी (army medical corps) के 80 प्रतिशत बंगाली डॉक्टर थे। बंगाली प्रधान होने की वजह से विभाग को बीएमसी कहा जाता था। लेकिन अब सेना में बंगाली नहीं दिखाई देते।

ऐसा हाल क्यों है?

इस पर सब्यसाची बागची ने कहा कि बंगाली का सहज आचरण, बिना कठिनाई के आसानी से प्राप्त करने की अपेक्षा, सबको साथ लेकर चलने की कोशिश का अभाव, आपस में एकता की कमी, अभिमान, जोखिम न लेने की प्रवृत्ति – यह सब एक स्थिति है। इसके लिए कोई और नहीं, हम बंगाली जिम्मेदार हैं।

क्या इसका कोई समाधान है?

सब्यसाची ने जवाब दिया नहीं। मुझे कोई उम्मीद की किरण नजर नहीं दिखाई देती। बंगाली अब नकारात्मक राजनीति में डूबे हुए हैं। सेना का आदर्श देश प्रथम होता है, देश अंतिम होता है। बंगाली आमतौर पर ऐसा नहीं सोचते हैं। प्रोफेशनलिज्म के रास्ते पर नहीं चलना चाहते। वह हर मामले में राजनीति करते हैं।

Input: HS

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