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इस वजह से आ रही मौसमी आपदा: जलवायु परिवर्तन ‘अल नीनो-ला नीना’ के प्रभाव को खींच रहा लंबा

निधि राजदान ने NDTV छोड़ा

New Delhi: कुछ वर्षों में भारत सहित दुनिया ने मौसम की चरम स्थितियों को देखा है। भीषण गर्मी हो, मूसलाधार बारिश हो या कड़ाके की ठंड- मौसम के मिजाज में खासा बदलाव आया है। उत्तर भारत में इन दिनों कड़ाके की ठंड का प्रकोप देखा जा रहा है। रात में कोहरे और दिन में सर्द हवाओं से लोग परेशान हैं। वहीं, मौसम विशेषज्ञ ने आने वाले दिनों में शीतलहर चलने की चेतावनी दी है। मौसम वैज्ञानिक नवदीप दहिया ने कहा है कि 14 से 19 जनवरी तक उत्तर भारत भीषण शीत लहर की चपेट में रहेगा। खासकर 16 से 18 जनवरी के बीच ठंड अपने चरम पर होगी और पारा माइनस 4 डिग्री सेल्सियस से गिरकर दो डिग्री पर आ सकता है।

मौसम के मिजाज में बदलाव 2022 में भी देखने को मिला था। साल के पहले महीने से लेकर दिसंबर तक मौसम का मिजाज पिछले सालों से बिल्कुल अलग रहा। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है।

जलवायु किसी स्थान का दीर्घकाल या कुछ वर्षों का औसत मौसम है और जब इन दशाओं में परिवर्तन होता है तो उसे जलवायु परिवर्तन कहते हैं। वर्तमान जलवायु परिवर्तन ग्लोबल वामिर्ंग और मौसम पैटर्न दोनों को प्रभावित कर रहा है। मानसून में भी अस्थिरता आई है, जिससे गर्मी के मौसम की अवधि बढ़ रही है और बारिश के मौसम की अवधि कम हो रही है।

दहिया ने मीडिया से कहा, मौसम में बड़े पैमाने पर बदलाव को देखें तो इसके पीछे का कारण ‘ला नीना’ है। इससे प्रशांत महासागर की सतह का तापमान काफी ठंडा हो जाता है। उन्होंने कहा कि ला नीना ने 2019 से अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है। इस वजह से यहां (उत्तर भारत) ठंड पड़ रही है।

2023 में भी यही पैटर्न काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि पहले मौसम स्थिर रहता था। एक निश्चित समय और मात्रा के लिए ठंड, गर्मी और बारिश होती थी। लेकिन पिछले 50 सालों से क्लाइमेट चेंज की वजह से ट्रेंड बदल रहा है। अल नीनो और ला नीना दोनों ने भी पिछले एक दशक में वामिर्ंग का अनुभव किया है।

एल नीनो और ला नीना शब्द प्रशांत महासागर के समुद्र की सतह के तापमान में आवधिक परिवर्तन का उल्लेख करते हैं, जिसका दुनिया भर के मौसम पर प्रभाव पड़ता है। अल नीनो के कारण मौसम गर्म और ला नीना के कारण ठंडा हो जाता है। दोनों आमतौर पर 9-12 महीने तक चलते हैं, लेकिन असाधारण मामलों में कई सालों तक चल सकते हैं। इन दोनों का असर भारत में देखा जा सकता है।

अल नीनो प्रभाव में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से बहुत अधिक हो जाता है। यह तापमान सामान्य से 4 से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक हो सकता है। अल नीनो जलवायु प्रणाली का एक हिस्सा है। इसका मौसम पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसके आने से पूरी दुनिया के मौसम पर असर पड़ रहा है।

ला नीना प्रभाव में समुद्र की सतह का तापमान काफी गिर जाता है। इसका सीधा असर दुनिया भर के तापमान पर पड़ता है और तापमान औसत से ज्यादा ठंडा हो जाता है। ला नीना आमतौर पर उत्तर पश्चिम में ठंडा मौसम और दक्षिण पूर्व में गर्म मौसम की ओर ले जाता है। भारत में इस अवधि के दौरान बहुत ठंड होती है और बारिश भी मध्यम होती है।

घरेलू उद्देश्यों, कारखानों और संचालन के लिए पिछले कुछ वर्षों में तेल, गैस और कोयले का मानव उपयोग बढ़ा है, जिसका जलवायु पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। पर्यावरण वैज्ञानिक चंदर वीर सिंह ने आईएएनएस को बताया, जब हम जीवाश्म ईंधन जलाते हैं, तो उनसे निकलने वाली अधिकांश ग्रीनहाउस गैस कार्बन डाइऑक्साइड होती है। इन गैसों की वातावरण में बढ़ती उपस्थिति के कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ने लगता है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 19वीं शताब्दी की तुलना में पृथ्वी के तापमान में लगभग 1.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है और वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में भी 40-50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण लगभग हर मौसम में असामान्य मौसम की स्थिति देखने को मिलती है। मानवीय गतिविधियों से होने वाले जलवायु परिवर्तन का प्रभाव गर्मियों में भीषण गर्मी और सर्दियों में भीषण ठंड के रूप में सामने आ रहा है।

पिछले कुछ वर्षों में मानसून प्रणालियों में भी बदलाव देखा गया है। गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र के कई हिस्सों में 2022 में अत्यधिक वर्षा दर्ज की गई थी। इसके उलट पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में बारिश नहीं हुई। अगस्त 2022 में बंगाल की खाड़ी में दो मानसून चक्र बने, एक के बाद एक पूरे मध्य भारत को प्रभावित किया।

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