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कौन हैं झारखंड के ये दलबदलु प्रदेश अध्यक्ष

By: रवि प्रकाश

रांची।

सुखदेव भगत झारखंड कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे। लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने विपक्षी पार्टियों का महागठबंधन बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। इस दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री रघुवर दास और भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ दर्जनों जनसभाएं की। उन पर तरह-तरह के आरोप लगाए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जुमलेबाजी का ठिकरा फोड़ा। अब उन्होंने बीजेपी ज्वाइन कर ली है और लोहरदगा विधानसभा सीट पर कांग्रेस के मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष डा रामेश्वर उरांव के खिलाफ पार्टी प्रत्याशी हैं। भाजपा में शामिल होते वक्त उन्होंने कहा था कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कथित राष्ट्रवादी नीतियों से प्रभावित हैं, इसलिए बीजेपी की प्राथमिक सदस्यता ले रहे हैं। उल्लेख्य है कि लोकसभा चुनावों के दौरान उन्होंने नरेंद्र मोदी के इसी कथित राष्ट्रवाद के खिलाफ प्रचार किया था। दरअसल, वे अकेले ऐसे नेता नहीं हैं, जो एक पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष रहने के बावजूद पूरी तरह विपरित विचारधारा वाली पार्टी ज्वाइन कर ली। झारखंड में सियासी निर्लज्जता के ऐसे कई उदाहरण हैं।

पूर्व आइपीएस डा0 अजय कुमार भी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे। लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने ही यह तय कराया था कि विधानसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन विपक्षी महागठबंधन के सीएम कैंडिडेट होंगे। अब वे अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) में शामिल हो चुके हैं और बीजेपी के साथ-साथ कांग्रेस के खिलाफ भी बोल रहे हैं। उन्होंने अपनी जिंदगी का पहला और एकमात्र चुनाव बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) से जीता था। तब वे जमशेदपुर सीट से लोकसभा के लिए चुने गए थे। आप उनके सियासी जीवन की तीसरी पार्टी है।

कांग्रेस के ही एक और पूर्व अध्यक्ष और पार्टी के कद्दावर नेता रहे प्रदीप कुमार बालमुचु भी आजसू पार्टी में शामिल होकर घाटशिला से चुनाव लड़ रहे हैं। यहां उनका मुकाबला बीजेपी के साथ ही महागठबंधन के उम्मीदवार से भी है। उन्होंने टिकट नहीं मिलने के कारण कांग्रेस पार्टी छोड़ दी।
 
अन्नपूर्णा देवी लालू यादव की करीबी नेता थीं। वे कई बार राजद की झारखंड प्रदेश अध्यक्ष रहीं। इसी पार्टी की बदौलत व मंत्री और विधायक भी रहीं। पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान जब विपक्षी पार्टियों का महागठबंधन बनाया जा रहा था, तभी उन्होंने फोन बंद करना शुरू कर दिया। उनके गायब होने के रहस्य का खुलासा तब अखबारों ने किया और बताया कि वे भाजपा में शामिल होने वाली हैं। तब उन्होंने इन खबरों का खंडन भी किया। एक दिन अचानक वे भाजपा के दिल्ली स्थित राष्ट्रीय कार्यालय में अवतरित हुईं और बीजेपी में शामिल होने की घोषणा कर दी। इसके बाद बीजेपी ने उन्हें कोडरमा लोकसभा सीट से प्रत्याशी बनाया। उन्होंने वह चुनाव जीता और अब संसद में हैं। भगवा रंग में रंग चुकीं अन्नपूर्णा देवी ने लंबे समय तक हरे रंग का चोला पहना और उन्हें लालू यादव के लिए खाने का टिफिन लेकर रिम्स में जाते देखना लोगों की आदत बन चुकी थी।

इसी पार्टी के एक और प्रदेश अध्यक्ष और एक राजघराने से ताल्लुक रखने वाले गिरिनाथ सिंह भी राजद छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए। हालांकि, उन्हें विधानसभा चुनाव में पार्टी टिकट नहीं मिल सका और अगर वे कोई और सियासी निर्णय ले लें, तो लोगों को आश्चर्य नहीं होगा।

लंबे वक्त तक जनता दल यूनाइटेड के प्रदेश अध्यक्ष रहे जलेश्वर महतो भी कुछ महीने पहले जद यू छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए और इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर चुनावी मैदान में हैं। अब वे बीजेपी और नीतीश कुमार के खिलाफ भाषण दे रहे हैं।
 
भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ताला मरांडी भी लंबे वक्त से पार्टी से नाराज चल रहे हैं। सीटिंग एमएलए होने के बावजूद भाजपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया। अब उन्होंने हेमंत सोरेन से बात की है। बहुत संभव है कि वे अगले कुछ दिनो में झारखंड मुक्ति मोर्चा में शामिल हो जाएं और इस पार्टी के टिकट पर विधानसभा का रास्ता तय करें। वे बीजेपी के उन नेताओं में शामिल रहे हैं, जिन्होंने पार्टी में रहने के बावजूद मुख्यमंत्री रघुवर दास के कई निर्णयों की आलोचना की और कहा कि पार्टी से आदिवासियों का मोहभंग हो रहा है। इसी वजह से पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया। अब वे औपचारिक तौर पर भाजपा छोड़ने वाले हैं।
 
आखिर क्यों 

पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके इन नेताओं की निष्ठा क्यों बदल गई। यह दरअसल निष्ठाओं लिंचिंग का मामला है। राजनीति में विचारधारा की बजाय स्वहित हावी हो चुका है। झारखंड इसका नायाब उदाहरण है। लोगों को सोचना चाहिए कि इन नेताओं की बातों पर कितना भरोसा किया जाए। क्योंकि, इतनी तेजी से अपनी निष्ठा और अराध्य बदलने वाले ऐसे नेता लोभ में कहीं जनभावनाओं का ही सौदा न कर लें।
 
झारखंड में नेताओं की बदलती निष्ठा ने उनकी विचारधारा के आवरण को हटाकर उन्हें बेपर्दा कर दिया है। अब यह वक्त बताएगा कि जनता उन्हें क्या जवाब देती है।

(रवि प्रकाश झारखण्ड के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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