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बैंक कर्मचारियों की दो दिवसीय राष्ट्रव्यापी हड़ताल भी खत्म हो गई, सरकार के कानों पर जूं भी नही रेंगी!

साफ दिख रहा है कि सरकारी बैंकों से पहले लाखो करोड़ रुपये प्राइवेट सेक्टर को दिलवाए जाते है और जब वह पैसे डूब जाते हैं तो बंदूक की नोक पर उसका सेटलमेंट करवाया जाता है और फिर इस घाटे का इल्जाम भी उन्हीं पर डाल दिया जाता है

By Girish Malviya

इतनी बड़ी हड़ताल थी लेकिन न्यूज़ चैनलों ने इस हड़ताल को बिल्कुल भी तरजीह नही दी. क्योकि अगर वह हड़ताल की बात करते तो उन्हें यह भी बताना पड़ता कि इन सरकारी बैंकों ने 13 प्राइवेट कम्पनियो के बकाया चार लाख 86,800 करोड़ रुपये को मात्र एक लाख 61,820 करोड़ रुपये में सेटल किया गया है जिसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक बैंकों को दो लाख 84,980 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.

आखिर सरकारी बैंक किन्ही प्राइवेट कंपनी के बकाया को क्यो सेटल कर रहे हैं?

साफ दिख रहा है कि सरकारी बैंकों से पहले लाखो करोड़ रुपये प्राइवेट सेक्टर को दिलवाए जाते है और जब वह पैसे डूब जाते हैं तो बंदूक की नोक पर उसका सेटलमेंट करवाया जाता है और फिर इस घाटे का इल्जाम भी उन्हीं पर डाल दिया जाता है, बैंक कर्मचारियों को नकारा बताया जाता है. जबकि पूरा खेल ऊपर से तय होता है.

UFBU के संयोजक बी रामबाबू कहते हैं कि ‘सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का इस्तेमाल निजी क्षेत्र के संकटग्रस्त बैंकों जैसे ग्लोबल ट्रस्ट बैंक, यूनाइटेड वेस्टर्न बैंक, बैंक ऑफ कराड, आदि को राहत देने के लिए किया गया है. हाल के दिनों में, यस बैंक को सरकारी बैंक एसबीआई (SBI) ने संकट से निकाला। इसी तरह निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी NBFC (गैर बैंकिंग वित्त कंपनी), आईएलएंडएफएस को सार्वजनिक क्षेत्र के एसबीआई और एलआईसी ने संकट से निकाला।”

बी रामबाबू आगे कहते हैं कि ‘सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक जन धन, बेरोजगार युवाओं के लिए मुद्रा, रेहड़ी-पटरी वालों के लिए स्वधन, प्रधानमंत्री आवास योजना और प्रधानमंत्री जीवन ज्योति योजना जैसे अधिकांश सरकारी कार्यक्रमों और योजनाओं में भाग लेते हैं।

वे पूछते हैं कि बताइये कौन से निजी बैंक जनता को यह सारी सुविधाएं देते हैं ?

एक समय देश मे कुल 27 सरकारी बैंक हुआ करते थे. इस समय कुल केवल 12 सरकारी बैंक बचे हैं। सरकार इन्हें कम कर 8 पर लाना चाहती है।
एक समय कहा जाता था कि बैंक ब्रांच ओर बढ़ाने की आवश्यकता है लेकिन अब मर्जर के कारण ब्रांचेज बन्द की जा रही है.

निजीकरण की नीति पर चलते हुए मोदी सरकार सब कुछ अडानी अम्बानी जैसे बड़े उद्योगपतियों को सौपने जा रही है बैंकों में सुरक्षित आपकी हमारी रकम पर भी अब इन्ही का कब्जा होने जा रहा है

(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी है. इसमें शामिल तथ्य/विचार n7india के नहीं है और n7india इसकी कोई जिम्मेवारी नहीं लेती है.)

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